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कुछ लोगों की लाजवाब पहलकदमी से आबाद है खुशियों का गणतंत्र

दुनिया में युद्ध, आपदा और विभीषिकाओं से भारी तबाही के दौर में देशभर में कुछ लोगों और संस्थाओं की लाजवाब पहलकदमी से बहुतों को सुख-चैन मयस्सर हो रहा.

मध्य प्रदेश में बिचारपुर गांव के फुटबॉलर. इस गांव से राष्ट्रीय स्तर के कई खिलाड़ी निकले
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अपडेटेड 2 फ़रवरी , 2024

खुशी की तलाश हमेशा सामूहिक आकांक्षा रही है. खुशी को हम जिस तरह देखते-समझते हैं, उसमें सभ्यतागत फर्क भले हों, पर आनंद, संतोष और खुशहाली के एहसास की ललक हमेशा ही सार्वभौमिक मामला है. फिर भी, जिस दौर में अभी हम महामारी के बाद की विश्व व्यवस्था से तालमेल बिठाने की कोशिशों में लगे ही हुए थे कि दो अवांछित युद्ध सिर पर आन पड़े—पूर्वी यूरोप में रूस और यूक्रेन के बीच और पश्चिम एशिया में फलस्तीन का युद्ध. दुख और पीड़ा के इस दौर का कोई अंत दिखाई नहीं देता.

अलबत्ता अप्रत्याशित अकाल मौतें और तबाही हमें एक बार फिर यह सोचने को मजबूर करती हैं कि क्या गलत है और इसका क्या हल है. यह एहसास उस प्राचीन भारतीय ज्ञान से निकलता है—'सर्वे भवंतु सुखिन अर्थात् सब सुखी हों’. इस दूरदृष्टि को अपना कर संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2011 में एक संकल्प के जरिए खुशी को 'बुनियादी मानवीय लक्ष्य’ घोषित किया. 2015 में संयुक्त राष्ट्र ने 17 सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) का ऐलान किया, जो गरीबी दूर करने, गैर-बराबरी घटाने और धरती की रक्षा के उद्देश्य को स्थापित करते हैं—यही वे तीन प्रमुख स्तंभ हैं जो हमारी खुशहाली और खुशी के लिए अनिवार्य हैं.

सामूहिक खुशी की हमारी तलाश अलबत्ता अक्सर छोटी-छोटी कोशिशों से शुरू होती है, जो बढ़ते-बढ़ते अंतत: कइयों की खुशहाली और खुशी तक पहुंच जाती है. 2016 से इंडिया टुडे उम्मीद जगाने और आनंद देने वाली दास्तानों को जुटाकर तैयार किए विशेषांक के जरिए ऐसी कोशिशों का जश्न मनाता रहा है. आगे के पन्नों में आप उन व्यक्तियों, पहलकदमियों और समूहों के बारे में पढ़ेंगे, जिन्होंने समाज में सकारात्मक फर्क लाने के लिए ऐसे रास्तों की खाक छानी जिन पर पहले कभी कोई न चला था.

वे आम परोपकारी या सुधारक नहीं हैं, बल्कि ऐसे लोग और संस्थाएं हैं जिन्होंने संपत्ति पैदा करने की संभावनाओं से भरी टिकाऊ, समावेशी और व्यावहारिक योजनाएं विकसित कीं. पश्चिम बंगाल के उन प्रशासनिक अधिकारी को ही लीजिए, जिन्होंने सरकारी योजना में थोड़ा-सा हेरफेर करके किसानों को विविध स्रोतों से आमदनी बढ़ाने में मदद की.

या ओडिशा की महिलाओं के स्व-सहायता समूह को लीजिए, जिसने राज्य के मिशन एसएचजी से जुड़कर आत्मनिर्भरता हासिल की. फिर हुनरमंद प्रवासी मजदूरों की कहानी भी है जो महामारी के दौरान काम-धंधे गंवाकर बिहार में गांव लौट गए. आज वे कपड़ा उद्यमी हैं, अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं और कइयों को रोजगार दे रहे हैं.

इन सभी कहानियों में एक साझा कड़ी है—खुशी की तलाश उनकी अपनी तरक्की तक सिमटी नहीं रही. ये सभी सामूहिक यात्रा पर निकले. ये ऐसे काम हैं जो हमारी दुनिया को बेहतर जगह बनाते हैं. पेश हैं भारतीय गणतंत्र की बेहतरी में लगे लोगों की कहानियां. 

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