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भारत की राजनीति में कई बार ऐसा हुआ है कि किसी विधेयक को उसके घोषित उद्देश्य से नहीं बल्कि उसके दूरगामी असर से याद रखा गया. मंडल आयोग केवल आरक्षण की बहस नहीं था, वह सामाजिक सत्ता-संतुलन का पुनर्विन्यास था. जीएसटी केवल कर सुधार नहीं था, उसने संघीय वित्तीय ढांचे को नए सिरे से परिभाषित किया.
और अब संभव है कि महिला आरक्षण से जुड़ा यह परिसीमन पैकेज भी आने वाले वर्षों में केवल लैंगिक प्रतिनिधित्व के कानून के रूप में नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के भूगोल को बदल देने वाली कोशिश के रूप में याद किया जाए. दरअसल संसद में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की इस संवैधानिक योजना के भीतर एक और बड़ी कहानी छिपी है. कहानी सत्ता, प्रतिनिधित्व और उत्तर-दक्षिण संतुलन के पुनर्लेखन की.































