छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से एक घंटे से कुछ ज्यादा की ड्राइव पर तिल्दा-नेवरा रेलवे स्टेशन से कुछ किलोमीटर पहले तुलसी गांव आएगा. मध्य छत्तीसगढ़ के इस गांव में करीब 4,000 लोग रहते हैं.
यहां संकरी गलियों और खुली जगहों से गुजरते हुए अगर आपको स्थानीय लोगों के झुंड नृत्य प्रदर्शन या हास्य नाटिकाएं या यहां तक कि डीआइवाइ (डू इट योरसेल्फ) वीडियो शूट करते दिखाई दें तो हैरान न हों.
स्मार्टफोन या डिजिटल कैमरा ही नहीं, उनके पास पूरा तामझाम हो सकता है. यानी माइक्रोफोन, लाइट्स, रेफ्लेक्टर, बहुत-से कैमरे वगैरह. यहां के 1,000 के आसपास ग्रामीण—स्थानीय लोगों के दावे के मुताबिक, हर घर से कम से कम एक—वीडियो कंटेट बनाने में लगा है. यूट्यूब पर तुलसी के करीब 40 सक्रिय चैनल हैं, जिन पर 1,000 से ज्यादा वीडियो हैं. इनमें छत्तीसगढ़ी का पहला कॉमेडी यूट्यूब चैनल बीइंग छत्तीसगढ़िया भी है, जिसके पास 250 से ज्यादा वीडियो की लाइब्रेरी और 1,20,000 से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं. इसके सहसंस्थापक जय वर्मा कहते हैं, "हास्य हमारे चैनल के मूल में है, पर संदेश हम छत्तीसगढ़ी पर्व-त्योहारों और संस्कृति की रक्षा करने का देते हैं."
तो यह शुरू कैसे हुआ? 2016 की बात है. तुलसी गांव में रहने वाले जय और उनके दोस्त ज्ञानेंद्र शुक्ला ने यूट्यूब चैनल बनाना तय किया. ज्ञानेंद्र बताते हैं, "मैं नेटवर्क इंजीनियर का काम करता था और जय शिक्षक था. हमने मजे के लिए कंटेट बनाकर यूट्यूब चैनल पर पोस्ट करने का सोचा. पर हमें वीडियो एडिट करना नहीं आता था, और हम कॉपीराइट के कई झमेलों में पड़ गए." कई वीडियो हटा दिए जाने के बाद उन्हें इससे जुड़े तकनीकी मसले समझ आए, और 2018 में बीइंग छत्तीसगढ़िया का जन्म हुआ.
देखते ही देखते चैनल लोकप्रिय हो गया और इसके निर्माताओं को अच्छी कमाई भी होने लगी. इससे गांव के दूसरे लोगों को भी व्यापार की बहती गंगा मे हाथ धोने की प्रेरणा मिली. हालांकि एक संहिता का पालन वे सब करते हैं. केवल 'परिवार के अनुकूल' कंटेट ही बनाएंगे. संस्कृति में अपनी जड़ें जमाए ज्यादातर वीडियो समकालीन हैं. लिहाजा छत्तीसगढ़ के चुनावी मौसम ने हाल के महीनों में तुलसी के कंटेट क्रिएटर्स को प्रेरित किया, तो आजकल दूसरी थीमों के अलावा जनवरी में पड़ने वाले फसल कटाई के पर्व 'छेरछेरा' पर वीडियो शूट किए जा रहे हैं. ज्ञानेंद्र कहते हैं, "इरादा अपनी स्थानीय संस्कृति को बचाने का है. जब तक हम बुजर्गों से बात नहीं करते कि अतीत में पर्व-त्योहार कैसे मनाए जाते थे, नौजवान परंपरा को आगे कैसे बढ़ा पाएंगे?"
गांव के कुल 40 चैनलों में से आदित्य बघेल के बैक बेंचर्स क्रिएशन (24,800 से ज्यादा सब्सक्राइबर), निगमा छत्तीसगढ़िया (9,200 से ज्यादा सब्सक्राइबर), संगीत चैनल गोल्ड सीजी04 (6,400 से ज्यादा सब्सक्राइबर) और फन टपरी (3,000 से ज्यादा सब्सक्राइबर) ने राज्य की मध्य पट्टी में लोकप्रियता हासिल कर ली है. ज्यादातर कंटेट निर्माता साथ मिलकर और फिर भी विकेंद्रित तरीके से काम करते हैं. किसी को कोई विचार सूझा तो वह दूसरों से बात करता है. हर पहलू पर सुझाव लेता है, चाहे स्क्रिप्ट हो या ऐक्टिंग या कैमरा वर्क. स्क्रिप्ट तैयार होते ही भूमिकाओं के लिए सबसे उपयुक्त अभिनेताओं की पहचान की जाती है.
शुरुआत में जिन्हें चुना गया, उनमें से ज्यादतर रामलीला मंडलियों के थे, जो गांव में काफी सक्रिय रही हैं. मगर अब गांव में अदाकारों की एक नई पीढ़ी उभर आई है, जिनमें से कुछ इतने मशहूर हो गए हैं कि गांव की सरहदों के पार भी काम कर रहे हैं. मसलन, सोशल मीडिया से आगे बढ़ीं परफॉर्मर पिंकी साहू अब छत्तीसगढ़िया फिल्मों में काम कर रही हैं.
ज्यादातर चैनल महीने में 20,000-40,000 रुपए कमाते हैं, जो यूट्यूब उनके व्यूज के हिसाब से देता है. कुछ यूट्यूबर्स ने छोटे पैमाने की ऐड फिल्में शूट करने के करार किए हैं, जबकि दूसरे अपने वीडियो में उत्पादों का विज्ञापन करके भी पैसे कमाते हैं. मगर स्थानीय लोगों के लिए इसका महत्व पैसों से बढ़कर है. उनके मुताबिक, ज्यादा अहम बात यह है कि इन यूट्यूब चैनलों ने गांव के नौजवानों को बुराइयों से दूर सकारात्मक दिशा में ले जाने में मदद की है.

