वन का एक नया अमृत यानी 'जीवामृत’ गुजरात में नौ लाख किसानों का जीवन बदल रहा है. दरअसल, यह गाय के गोबर, दलहन, गुड़ और केंचुओं को संसाधित करके बनाए जाने वाली खाद है, जिसमें खर्च न के बराबर आता है. इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाला कोई और नहीं बल्कि गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत हैं. आचार्य ने न सिर्फ यह प्रक्रिया विकसित की बल्कि आठ साल से वे अपने मूल निवास कुरुक्षेत्र में स्थित अपने 180 एकड़ के खेतों में इसे इस्तेमाल भी कर रहे हैं.
यह खेती का प्राकृतिक तरीका है जो रासायनिक खेती यहां तक कि जैविक खेती से भी पूरी तरह भिन्न है. यह एक तरह से 'शून्य-बजट खेती’ है जो कच्छ से नवसारी और सौराष्ट्र तक राज्य की करीब 752,000 एकड़ जमीन पर हो रही है.
राज्यपाल देवव्रत ने इंडिया टुडे के साथ बातचीत में प्राकृतिक खेती पर अपने अनुभव साझा किए. वे कहते हैं, "दशकों तक कीटनाशकों के इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुंचा है." उन्होंने यह भी कहा, "कार्बनिक यौगिक की मात्रा 0.5 फीसद से कम होने पर कोई भी मिट्टी बंजर हो जाती है. 'हरित क्रांति’ से पहले हमारी मिट्टी में कार्बनिक यौगिक की मात्रा 2 से 2.5 फीसद थी. लेकिन अब यह घटकर सिर्फ 0.2 से 0.3 फीसद रह गई है. हमारी धरती बंजर से भी ज्यादा खराब हो चुकी है. हमारी खाद्य फसलें मिट्टी से बहुत कम पोषक तत्व ले रही हैं और पूरी तरह उर्वरकों पर निर्भर हैं."
इसका मतलब है कि किसान तेजी से निजी कंपनियों या सरकारी सब्सिडी की दया पर निर्भर होते जा रहे हैं. मौजूदा समय में भारत सरकार यूरिया और डीएपी सब्सिडी पर सालाना 1.25 लाख करोड़ रुपए खर्च करती है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारत के करीब 83 फीसद किसान छोटे और सीमांत हैं, जो उत्पादन की अतिरिक्त लागत को वहन करने की स्थिति में नहीं हैं.
प्राकृतिक खेती की अवधारणा देवव्रत को खासी पसंद रही है. उन्होंने 2019 में गुजरात में राज्यपाल पद संभालने के तुरंत बाद ही इसे आगे बढ़ाया और राज्य सरकार भी साथ देने में पीछे नहीं रही. 2020 के राज्य बजट में गुजरात आत्मनिर्भर पैकेज के तहत प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए विशेष वित्तीय सहायता की घोषणा की गई.
इसके तहत प्रत्येक किसान को जीवामृत तैयार करने के लिए आर्थिक सहायता मुहैया कराई जाती है. प्राकृतिक कृषि किट खरीदने के लिए जहां उन्हें 1,248 रुपए का भुगतान किया जाता है, वहीं गाय पालन के लिए वे हर माह 900 रुपए की सब्सिडी पाने के हकदार हैं. प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए गुजरात प्राकृतिक कृषि विकास बोर्ड का भी गठन किया गया और 2022 के बजट में इसके लिए 100 करोड़ रुपए आवंटित किए गए.
पहले प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण के लिए लोगों को नजदीकी कृषि विश्वविद्यालय जाना पड़ता था. लेकिन मई 2023 से गांव के 'सखी मंडल’ के एक सदस्य, एक किसान और विश्वविद्यालय के एक कृषि विशेषज्ञ की टीम इस तरह के प्रशिक्षण के लिए गांवों का दौरा करने लगी है. बीते आठ महीने में 23 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया जा चुका है. सरकार ने पंचमहल जिले के हलोल में पहली बार प्राकृतिक खेती विज्ञान विश्वविद्यालय को भी मंजूरी दे दी है.

