अहमदाबाद में 15वीं सदी की कांकरिया झील का किनारा 2018 में देश में पहला 'क्लीन स्ट्रीट फूड हब' बन गया, जिसे भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने प्रमाणित किया है. इस पूरे क्षेत्र में करीब 60 वेंडर हैं, जो सालाना करीब 1.2 करोड़ लोगों को बेहद साफ-सुथरे तरीके से पाव भाजी, समोसा, ढोकला, पानीपुरी, भेलपूरी, दाबेली, खिचू, आइसक्रीम, कॉफी आदि व्यंजन परोसते हैं. उनमें से कई त्योहारों और दिसंबर के आखिरी हफ्ते में कांकरिया कार्निवल के दौरान आते हैं.
'क्लीन स्ट्रीट फूड हब' का प्रमाणपत्र मिलने पर सकारात्मक प्रतिक्रिया को देखते हुए कांकरिया झील से ही प्रेरणा लेते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने केंद्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के साथ मिलकर पिछले साल सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को देशभर के 100 जिलों में ऐसी 100 फूड स्ट्रीट विकसित करने के लिए नाम मांगे. इन सड़कों की उचित तरीके से साफ-सफाई की जाएगी और सीवेज और कचरा निपटान व्यवस्था दुरुस्त की जाएगी.
इनमें से प्रत्येक फूड स्ट्रीट को विकसित करने के लिए प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश को एक करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता मिलेगी. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की तरफ से यह धनराशि इसी शर्त पर मिलेगी कि इन फूड हब में मानक आधार पर एफएसएसएआई के दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन किया जाएगा. सरकार ईट राइट इंडिया आंदोलन के तहत फेरीवालों को साफ-सफाई और खाद्य जोखिम से जुड़े दिशानिर्देशों के बारे में प्रशिक्षित करने, स्वतंत्र थर्ड पार्टी ऑडिट और विभिन्न फूड स्ट्रीट के प्रमाणन पर भी काम कर रही है.
स्ट्रीट फूड का असंगठित क्षेत्र न केवल आजीविका का एक बड़ा साधन है और लाखों लोगों को किफायती दामों पर खाना मुहैया कराता है, बल्कि हमारी समृद्ध पाककला की विरासत को भी आगे बढ़ा रहा है. स्ट्रीट फूड पर्यटकों को भी खूब लुभाता है. एक अनुमान के मुताबिक, भारत में रेहड़ी-पटरी वाले बाजार में करीब एक करोड़ विक्रेता शामिल हैं और इनमें से 20 फीसद स्ट्रीट फूड कारोबार से जुड़े हैं.
एफएसएसएआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) जी. कमल वर्धन राव कहते हैं, "इसमें कोई संदेह नहीं कि स्ट्रीट मार्केट भारत में खानपान, रोजगार और मन-बहलाने का एक प्रमुख साधन है लेकिन हम इसमें उस तरह निवेश करने में कामयाब नहीं रहे हैं जिस तरह विदेश में किया गया है."
शहरीकरण और बढ़ते प्रदूषण के बीच स्ट्रीट फूड अक्सर संक्रामक रोगों की भी वजह बनता जा रहा है. गुजरात के फूड ऐंड ड्रग कंट्रोल एडमिनिस्ट्रेशन खाद्य एवं औषधि नियंत्रण प्रशासन ने एफएसएसएआई और एक निजी फर्म के साथ मिलकर कांकरिया झील के आसपास शुरुआती प्री-ऑडिट किया था, जिसके पीछे उद्देश्य यह पता लगाना था कि कमियों को कैसे दूर किया जा सकता है.
इसके बाद फूड सेक्रटी अवेयरनेस ऐंड ट्रेनिंग ऑर्गेनाइजेशन की तरफ से स्ट्रीट फूड विक्रेताओं को प्रशिक्षित किया गया. फिर, अंतिम चरण की मूल्यांकन प्रक्रिया अपनाई गई ताकि यह साफ हो सके कि कचरा निष्पादन, व्यक्तिगत स्वच्छता की क्या स्थिति है, साथ ही इसका सीमांकन हो सके कि कहां खाना पकाना है और कहां नहीं. इसके अलावा स्ट्रीट लाइट, कीट-पतंगों पर नियंत्रण और व्यापक स्तर पर साफ-सफाई की व्यवस्था दुरुस्त रहे.
अहमदाबाद में खाने-पीने के सभी ठिकानों पर नजर रखने वाले नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है, "कांकरिया लेक फूड हब में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है. हम ऐसे पैकेज्ड फूड को तरजीह देते हैं, जिस पर मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपारी की स्पष्ट तारीख हो." यह विभाग हर आउटलेट से चार महीने पर परीक्षण के लिए सैंपल लेता है.
इस क्षेत्र की नियमित निगरानी होती है और वेंडरों को सेंसिटाइज किया जाता है. उस अधिकारी का कहना है, "साल में दो बार 'क्लीन स्ट्रीट फूड हब' सर्टिफिकेट को रिन्यू किया जाता है. कांकरिया को हालिया सर्टिफिकेट एक पखवाड़े पहले ही मिला है."
ऐसा ही हब दिल्ली के चांदनी चौक में परांठे वाली गली में विकसित किया जा रहा है. राव का कहना है, "फूड बाजार की दशा सुधारकर हम न केवल स्वस्थ भविष्य बल्कि पर्यटन और रोजगार सर्जन में भी निवेश कर रहे हैं."
—साथ में जुमाना शाह

