मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के एक साधारण से गांव बिचारपुर में ठंड के मौसम में सुबह आठ बजे हर तरफ कोहरा छाया है. लेकिन ऐसे मौसम में भी चार से 18 वर्ष तक की उम्र के करीब 70 बच्चे फुटबॉल सीखने की ललक के साथ मैदान में डटे हैं.
फुटबॉल ने बिचारपुर को अलग पहचान दी है. इस खेल के प्रति गांव के लोगों के उत्साह की वजह से ही इसे 'मिनी ब्राजील' तक कहा जाता है. कभी अवैध शराब बनाने के लिए सुर्खियों में रहने वाले बिचारपुर को मिनी ब्राजील बनाने में कई लोगों ने अहम भूमिका निभाई लेकिन असल श्रेय 65 वर्षीय सुरेश कुंडे को जाता है, जिन्होंने इसकी शुरुआत की.
वंचित तबके में शुमार, अनुसूचित जाति के एक परिवार में जन्मे कुंडे एक युवा खिलाड़ी के तौर पर शहडोल शहर के रेलवे मैदान में फुटबॉल खेलते थे. कुंडे ने धीरे-धीरे बिचारपुर के युवाओं को इस खेल के लिए प्रोत्साहित करना शुरू किया. 57 वर्षीय मजदूर केतराम सिंह गोंड इस पहल में उनका साथ देने सबसे पहले आगे आए. केतराम शौकिया फुटबॉल खेलते थे. कुंडे और केतराम दोनों ने अपने परिवारों को इस खेल से जोड़ा. अब करीब दो दशक बाद स्थिति यह है कि कुंडे परिवार के 15 सदस्य राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल खेल चुके हैं. वहीं, केतराम सिंह के परिवार के 10 सदस्य राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर स्कूल और अंतर-विश्वविद्यालय टूर्नामेंट में हिस्सा ले चुके हैं. कुंडे के बेटे नीलेंद्र को भारतीय टीम में खेलने के लिए बुलाया गया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई 2023 में मन की बात के एपिसोड में इसका उल्लेख किया.
पूर्व सरपंच शीतल सिंह टेकाम बताते हैं, ''सुरेश कुंडे बिचारपुर के पहले कोच थे. उन्होंने फुटबॉल खेलने के लिए बच्चों को प्रेरित किया.'' बहरहाल, कभी सिर्फ फुटबॉल के लिए जीने वाला यह व्यक्ति अब शारीरिक रूप से अक्षम हो चुका है और बिस्तर पर पड़े रहने को बाध्य है. उनके कमरे की दीवारें प्रमाणपत्रों और तस्वीरों से भरी हैं. उनमें से एक में कुंडे अपनी युवावस्था में चोटी वाले एक खिलाड़ी के तौर पर नजर आ रहे हैं.
हालांकि, इस खेल को बढ़ावा देने को अपने जीवन का मिशन बना चुके गांव के इन लोगों के लिए 1990 के दशक के शुरुआती दिन कम चुनौतीपूर्ण नहीं थे. किसी भी खिलाड़ी के पास न तो किट थी और न ही खेलने के लिए कोई ठीक मैदान था. करीब 15 वर्ष पूर्व एक स्थानीय निवासी सफदर हुसैन ने मैदान के लिए अपनी जमीन दे दी. खुद भी फुटबॉलर रहे हुसैन बताते हैं, ''मेरी एकमात्र शर्त थी कि अगर यहां किसी दिन क्रिकेट की स्टंप नजर आ गई तो मैं जमीन वापस ले लूंगा.'' बहरहाल, बाद में सरकार ने भी फुटबॉल मैदान के लिए जमीन आवंटित की और कॉर्पोरेट कंपनियां, खासकर अल्ट्राटेक, किट और अन्य सुविधाओं को प्रायोजित करने के लिए आगे आईं.
आज बिचारपुर में फुटबॉल केवल पुरुषों का खेल नहीं रह गया है. डॉज, ड्रिबल, टैकल और फ्री-किक में लड़कियां अक्सर लड़कों को पीछे छोड़ते नजर आती हैं. राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके अनिल सिंह कहते हैं, ''मेरे पिता केतराम सिंह एक बार मेरी बहन रजनी को खेल के मैदान पर ले गए. उस समय सबने उसका मजाक बनाया. लेकिन बाद में रजनी 14 राष्ट्रीय टूर्नामेंटों में खेली.'' अनिल बताते हैं कि परिवार की तीसरी पीढ़ी भी फुटबॉल खेलने के लिए तैयार हो रही है. छह साल के अनिदेव, 15 वर्षीय हर्ष और आठ साल के विनय भी फुटबॉल खेलते हैं और जुलाई 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले थे. टेकाम सिंह का दावा है, ''बिचारपुर में करीब 150 परिवारों में से हर एक में कोई न कोई फुटबॉल खेलता है.'' सरकार की 'फुटबॉल क्रांति' पहल के तहत शहडोल में करीब 1,200 क्लब बनाए गए हैं.
सितंबर में राज्य स्तरीय एमपी यूथ गेम्स में शहडोल संभाग की लड़कियों की फुटबॉल टीम ने जबलपुर संभाग को 24-0 से हराया और टूर्नामेंट जीत लिया. शहडोल टीम की 18 लड़कियों में से नौ बिचारपुर की हैं. बिचारपुर के सात खिलाड़ियों वाली रीवा यूनिवर्सिटी की लड़कियों की टीम लगातार तीन वर्षों तक अंतर-विश्वविद्यालय टूर्नामेंट जीतती रही है.
अगस्त 2023 में भारतीय खेल प्राधिकरण ने बिचारपुर में एक फीडर सेंटर खोला और एक स्थानीय खिलाड़ी लक्ष्मी सहीस को कोच के तौर पर नियुक्त किया. प्रतिभा खोज के बाद 20 लड़कों और 20 लड़कियों को चुना गया है. अभ्यास के दौरान अनिदेव रोनाल्डो के नाम वाली जर्सी पहनते हैं, जबकि विनय मेसी के नाम के साथ अर्जेंटीना की जर्सी पहनते हैं. गोल पोस्ट की तरफ निशाना साधकर गोल करने के बाद अनिदेव ने कहा, ''मेरे हीरो रोनाल्डो हैं लेकिन मैं भारत के लिए खेलना चाहता हूं.'' छोटे से गांव बिचारपुर के बच्चे बड़े-बड़े सपने देखते हैं.

