मुंबई से करीब 250 किमी दक्षिण में स्थित सतारा के गन्ने के खेतों के बीच एक बेजोड़ गुरुकुल है. शिष्य सुबह 6 बजे जाग जाते हैं, प्रार्थना करते हैं, और घंटे भर बाद मैदान में इकट्ठे हो जाते हैं, जहां वे तीर-धनुष चलाते हुए 50 से 70 मीटर दूर स्थित लक्ष्य पर निशाना लगाना शुरू कर देते हैं.
परिसर शायद समतल न हों, बगीचे भी वैसे तराशे न हों जैसे विदेशों में देखे जाते हैं, और तीखी धूप व मौसमी बारिश मजा खराब कर सकती है. मगर कोई भी चीज इन युवा तीरअंदाजों को अपने लक्ष्य से डिगा नहीं पाती. दृष्टि आर्चरी एकेडमी के संचालक 32 वर्षीय प्रवीण सावंत ने हमेशा यही सपना देखा—एक ऐसी जगह जहां शिष्य खाएं, प्रार्थना करें और तीरअंदाजी से प्यार करें.
पेशे से वार्ड बॉय रहे प्रवीण ने 2008 के ओलंपिक के दौरान टीवी पर संयोग से तीरअंदाजी देखने के बाद इस खेल को अपना लिया. सतारा में कोई केंद्र तो था नहीं. सो, वे अस्पताल में रात की पाली का अपना काम खत्म करते और सीखने के लिए 35 किमी दूर वाई (शहर) के लिए निकल जाते. प्रवीण बताते हैं, "पहले तो मैंने नौकरी हासिल करने के लिए यह खेल अपनाया. फिर एहसास हुआ कि इसमें और भी बहुत कुछ है. आर्चरी सुकून देता है." 2010 में कंपाउंड आर्चरी के राष्ट्रीय स्कूल खेल चैंपियन प्रवीण को पुलिस कॉन्स्टेबल की नौकरी जरूर मिल गई, पर आर्थिक परेशानियों के चलते बड़े मंच पर इस कामयाबी को दोहराना मुश्किल रहा. उन्होंने कोचिंग में हाथ आजमाने पर विचार किया और 2017 में दृष्टि आर्चरी एकेडमी शुरू कर दी.
दृष्टि के अध्यक्ष और मलखंभ के उस्ताद सुजीत शरद शेडगे याद करते हैं कि लोग कैसे इसे प्राचीन विद्या की तरह ज्यादा देखते थे. स्थायी ठिकाना खोजना भी मुश्किल था. तभी अस्पताल के दिनों से प्रवीण के परिचित महेंद्र कदम आगे आए. उन्होंने 2021 में अपने खेत से एक एकड़ जमीन गुरुकुल के लिए दे दी. शेडगे कहते हैं, "यह गढ़ है. हमें खेल को आगे ले जाना है. फिलहाल इसे हम नो-प्रॉफिट नो-लॉस के मॉडल पर चला रहे हैं."
दृष्टि के हॉस्टल में 20 शिष्य रह सकते हैं, पर 2023 की इसकी उपलब्धियों को देखते हुए दिलचस्पी बढ़ रही है. पिछले साल 21 वर्षीय ओजस प्रवीण देवताले और 17 बरस की अदिति स्वामी ने मिलकर एशियाई खेलों में चार पदक और विश्व चैंपियनशिप में तीन पदक जीते; दोनों को हाल में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया. शेडगे कहते हैं, "लोगों के यहां आने की बड़ी वजह यह है कि हम गुरु-शिष्य परंपरा का पालन करते हैं और प्रवीण यहीं रहकर शिष्यों पर ध्यान देते हैं."
बीते दो साल में इसने न केवल महाराष्ट्र बल्कि हरियाणा और चंडीगढ़ के आकांक्षियों को ठौर दिया है. कोल्हापुर की 18 वर्षीया नेत्रा मनीष सहारा ऐसी ही शिष्या हैं, जो ओलंपिक खेलों में भारत की नुमाइंदगी करने का सपना लेकर 12वीं कक्षा के बाद गुरुकुल आ गईं. वे कहती हैं, "दो महीनों में ही काफी कुछ घर जैसा लगने लगा." शिष्य को ठहरने के 1,500 रुपए के अलावा मासिक प्रशिक्षण फीस के तौर पर 1,000 रुपए प्रति माह देने होते हैं.
दृष्टि में बहुत बड़ा पैमाना और भव्यता भले न हो, पर उसकी कमी शिष्यों का उत्साह और जोशो-खरोश पूरी कर देता है. इसमें सबसे छोटी शिष्या प्रवीण की पांच बरस की बेटी हैं, जिनका नाम एकेडमी के नाम पर रखा गया है. तीरअंदाजी महंगा खेल है—कंपाउंड और रिकर्व सेट की लागत 1.5-3 लाख रुपए बैठती है. मगर स्विट्जरलैंड का एक प्रशिक्षण केंद्र देखने के बाद प्रवीण को एहसास हुआ कि किस कदर बहुत कम साधनों में उन्होंने कितना ज्यादा हासिल किया है.
वे कहते हैं, "दो अर्जुन अवार्ड विजेता (देने) के बाद सतारा अंतरराष्ट्रीय स्तर के ग्राउंड का हकदार है." सतारा ने भारत को अपना पहला व्यक्तिगत ओलंपिक पदक विजेता भी दिया - पहलवान खाशाबा जाधव, जिन्होंने 1952 में कांस्य पदक जीता था.
प्रवीण उस तालिका में और पदक जोड़ना चाहते हैं, खासकर जब उन्होंने रिकर्व का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया है, जो कंपाउंड के विपरीत ओलंपिक खेल है. वे कहते हैं, "हमारा काम नहीं रुकेगा. मैं 52 सेकंड के गौरव (जब पोडियम सेरेमनी के दौरान राष्ट्रीय धुन बजती है) का अनुभव नहीं कर सका, पर मेरे शिष्य इसे अनुभव कर रहे हैं."

