एआई से लगभग सभी वाकिफ तो हो चले हैं लेकिन यह आज की सबसे अबूझ पहेली बना हुआ है. हम सभी जाने-बूझे या अनजाने में एआइ का इस्तेमाल कर रहे हैं—चाहे गूगल सर्च से सबसे जल्दी पहुंचने का रास्ता हो या नेफ्लिक्स आपको ऐसी फिल्मों की पेशकश कर रहा हो, जैसी आपने हाल में देखी हैं और आपको पसंद हैं. लेकिन पिछले चार वर्षों में एआई एल्गोरिद्म का बेमिसाल क्लास विकसित हुआ है, जिसे जेनरेटिव एआई कहा जाता है और जो अब मानव बुद्धि की ही तरह टेक्स्ट को पढ़ और उसकी व्याख्या कर रहा है.
यह ऐसा टेक्नोलॉजी प्रेत है जो हमारे जीवन के लगभग हर पहलू को बदल सकता है. मसलन, काम और रोजगार से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक, चुनावी राजनीति से लेकर न्याय व्यवस्था तक, रक्षा प्रौद्योगिकी से लेकर पुलिसिया और निगरानी तंत्र तक, कला और मनोरंजन से लेकर हमारे अंतरंग जीवन और निजी जानकारियों तक, सभी के तरीके बदल सकता है.
सपने और दुस्वप्न, फंतासी और हकीकत में जिस तकनीकी कल्पना को हम साकार कर बैठे हैं, वह भारी उत्तेजना और उत्साह भी जगा रहा है तो चिंता और भय भी पैदा कर रहा है. क्या एआई हमारा भावनात्मक साथी भी बन जाएगा? क्या यह हमारी निजता और सचाई और हकीकत पर भी असर डालेगा?
क्या यह किसी भी तरह से रोका न जा सकने वाला इंजन है, जो इंसान की रचनात्मकता को खत्म कर रहा है? अंदेशा है कि यह परिवर्तनकारी टेक्नोलॉजी तेज बदलाव की दहलीज पर खड़ी है—स्वयंभू आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस की 'सिंगुलरिटी’—और यह आला वैश्विक संकटों के समय हो रहा है, जब बड़े सशस्त्र संघर्ष, लोकतंत्रों में राजनैतिक ध्रुवीकरण, नई आकार लेती विश्व व्यवस्था, विस्थापितों के बड़े आंदोलन और निश्चित रूप से, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का दौर है. इसने जीवन को व्यापक ढंग से बेहतर बनाने या उसका तिया-पांचा करने की ताकत में लोगों की दिलचस्पी जगाई है.
भारत के लिए, एआई अब टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में लंबी छलांग की उम्मीद जगाती है. जैसा कि दूरसंचार क्रांति के साथ हुआ: साधारण पुराने टेलीफोन से लेकर हम फटाफट स्मार्ट फोन तक पहुंचे और अब विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेज कदम बढ़ाने के लिए इसकी क्षमताओं को टटोल रहे हैं. धुंध से उम्मीद और फंतासी से हकीकत को उजागर करने के लिए हमने देश और दुनिया के संबंधित प्रमुख पक्षों को जुटाया है.
ये सूचना-प्रौद्योगिकी के विशाल कॉर्पोरेट के प्रमुख, नीति-निर्माता, वैज्ञानिक, समाजविज्ञानी, कलाकार और मनोरंजन जगत के लोग हैं, जो बता रहे हैं कि एआई हमारे जीवन को कैसे बदल सकता है. उनकी राय, जैसा कि आप देखेंगे, आश्वस्त करने वाली और बहुत ही मानवीय है.
यह उत्साह भी जगाती है और निराशा भी. लेकिन एक बात पर आम सहमति है कि एआई (चाहे कुछ भी हो) आ रहा है और हमें इसमें मौजूद अपार संभावनाओं का दोहन करना चाहिए, इसे सावधानी और ध्यान से इस्तेमाल में लाना चाहिए. तो अब पढ़िए और समझिए.
भारत के लिहाज से एआई अपार संभावनाएं समेटे है. टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नई छलांग के साथ इसमें विकास की गति को और अधिक रफ्तार देने की क्षमता है. एआई से जुड़े तमाम पहलुओं को समझने के लिए पेश हैं इससे जुड़ी दूसरी स्टोरीज़:
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