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एआई के लिए बनने वाले कानूनों में इसके फायदों और नुकसान के बीच संतुलन बनाना है जरूरी

भारत में एआई के रेगुलेशन को लेकर ऐसे कानून बनने चाहिए जिससे कि इसके फायदों और नुकसान के बीच संतुलन बनाया जा सके

एआई के फायदे और नुकसान के बीच संतुलन बनाने वाला कानून है जरूरी
एआई के फायदे और नुकसान के बीच संतुलन बनाने वाला कानून है जरूरी
अपडेटेड 24 जनवरी , 2024

अमूमन सेलेब्रिटियों से जुड़े अश्लील और अवमाननपूर्ण डीपफेक को लेकर ये सवाल गूंजते रहे हैं कि ये 'असली हैं या नकली?' चैटजीपीटी पहले ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को डिनर टेबल पर बातचीत का विषय बना चुका है. 'एआई हेरफेर"'(एआई हेलुसिनेशन) के जरिए फर्जी, अवमानना या मनगढ़ंत मामलों के कॉपीराइट और चरित्रहनन के दावों के कारण जेनरेटिव एआई डेवलपरों के खिलाफ कई मामले दर्ज हुए हैं.

एआई दुरुपयोग के मामले सुर्खियों में चढ़े तो कोई आश्चर्य नहीं कि दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त कानून-कायदों की मांग उठी. इस शोर में एआई के सकारात्मक उपयोग का मामला खो जाने का डर है. इसलिए कानून में अपराधों या उल्लंघनों से निबटने के साथ इनोवेशन, विकास और आर्थिक लाभों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा. 

यूरोपीय यूनियन का एआई कानून इस क्षेत्र पर बने पहले कानूनों में शामिल है जिसे तैयार होने में दो साल लगे और यह दिसंबर 2023 में आया. इसे एआई पर व्यापक कानून कहा जाता है और यह अस्वीकार्य जोखिम मॉडल के रूप में सूचीबद्ध मामलों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने और भारी जोखिम वाली कैटेगरी को नियंत्रित करता है. कम जोखिम वाले मामलों को इसमें स्व-नियमन के लिए छोड़ा गया है.

अमेरिका डीपफेक्स अकाउंटेबिलिटी ऐक्ट और प्रोटेक्ट ऐक्ट के साथ डीपफेक और दुष्प्रचार अभियानों से निबटने के लिए दो संघीय कानूनों का मूल्यांकन कर रहा है. सिंगापुर का प्रोटेक्शन फ्रॉम ऑनलाइन फाल्सहुड्स ऐंड मेनिपुलेशन ऐक्ट 2019 राष्ट्रहित को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से फर्जी खबरों और दुष्प्रचार अभियानों पर लगाम कसता है.

अमेरिका में कई राज्य कानूनों और साथ ही उपरोक्त सिंगापुर कानून का फोकस खासकर चुनावों को प्रभावित करने वाले दुष्प्रचार अभियानों पर है. चीन के कानून में फर्जी या भ्रामक जानकारी, तथ्यों में हेराफेरी, या समाज में गंभीर नुक्सान पहुंचाने के लिए जानबूझकर अफवाहें फैलाना दंडनीय अपराध है.

दक्षिण कोरिया में सार्वजनिक हित को नुकसान पहुंचाने वाले डीपफेक से जुड़े अपराध दंडनीय हैं. एस्टोनिया के इनफॉर्मेशन सिस्टम्स ऐंड कम्युनिकेशंस मार्केट ऐक्ट में नफरत फैलाने, फर्जी खबरें फैलाने या दूसरे को नुकसान पहुंचाने के इरादे से डीपफेक तैयार करना दंडनीय अपराध है.

विभिन्न देशों में एआई कानूनों की उपरोक्त मिसाल तो ऊंट के मुंह में जीरा जैसा है और एआई से जुड़े दुरुपयोग के सिर्फ कुछ पहलुओं पर ही गौर करते हैं. चाहे 2018 का एरिजोना में हुआ उबर सेल्फ ड्राइविंग कार हादसा हो जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी या टेस्ला कार की दुर्घटना हो, दोनों घटनाओं ने ऑटोनॉमस कारों में बतौर सेफ्टी बैकअप ड्राइवर मनुष्य की निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया है.

साथ ही, कार में ऑटोपाइलट मोड पर वीडियो गेम खेलने जैसे काम ड्राइवर की लापरवाही माने जाएंगे. जर्मनी जैसे देशों में कानून ऑटोनॉमस कारों के साथ भेदभाव नहीं करता. ब्रिटेन ने ऑटोनॉमस वाहनों के लिए बीमा अनिवार्य कर दिया है. विश्व आर्थिक मंच के दस्तावेज ऑटोनॉमस वाहनों के मामले में नीति-निर्माताओं को 'वर्चुअल ड्राइविंग लाइसेंस' का ढांचा मुहैया कराते हैं जो कानून बनाने में मदद करेगा.

एआई बायस (डेटा की गलतियां) इसके इस्तेमाल के दौरान भारी नुकसान कर सकते हैं, जिसमें जांच के दौरान प्रिडिक्टिव पुलिसिंग और कोर्ट द्वारा प्रिडिक्टिव सेंटेंसिंग (जैसे कि अमेरिकी अदालतों में कंपास एआई प्रणाली) यानी फैसला सुनाना शामिल है.

कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसे केस जिसमें सोशल इंजीनियरिंग और जोड़तोड़ के मकसद से "सोशल मीडिया पर मौजूद मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए डेटा एनालिटिक्स का इस्तेमाल" दूसरे खतरे हैं जो पहले से ही पहचाने गए हैं और जिन पर कानूनी लगाम लगाने की जरूरत है. 

भारत और एआई कानून-कायदे

टेक्नोलॉजी विकसित होने के साथ ही उसके गलत इस्तेमाल के खतरे भी बढ़ते हैं. चिंता यह रहती है कि टेक्नोलॉजी की तेज गति से कानून का तालमेल बनाए रखना मुश्किल होगा. हालांकि इससे हकीकत का पता नहीं लग सकता है. भारत में मौजूदा कानून सख्त या व्याख्या आधारित हैं, वे उभरते परिदृश्यों पर लागू किए जा सकते हैं.

मसलन, अब भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 का रूप लेने वाली 1860 की भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में लोगों की गरिमा या गोपनीयता को नुकसान पहुंचाने वाले डीपफेक से निबटने के लिए कई प्रावधान हैं. मौजूदा सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000 में भी संशोधन और उसके तहत बनाए गए नियम, खासकर 2021 की गाइडलाइंस में डीपफेक या हेरफेर या जाली इमेजरी और गलत सूचना के लिए धारा 66 सी (पहचान की चोरी), 66डी (रूप बदलकर धोखाधड़ी), 67 (अश्लील सामग्री), 67ए (यौन संबंधित सामग्री) और 67 बी (चाइल्ड पोर्न) से जुड़े प्रावधान हैं जो केस के हिसाब से लागू होंगे.

आईपीसी या नए बीएनएस के तहत पीड़ितों को धमकाने, जबरन वसूली या ब्लैकमेलिंग के लिए इस्तेमाल की जाने वाली डीपफेक या फर्जी इमेजरी दंडनीय अपराध होंगे. लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने वाली सोशल इंजीनियरिंग गंभीर चिंता का विषय रही है और उस पर नकेल कुछ हद तक जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 और उसके तहत जारी आचार संहिता कसती है. 

दुर्घटनाओं के लिए अमेरिकी अदालतों में वाहन में बैठे आदमी को जिम्मेदार ठहराया जाता है—हादसा भले एआई त्रुटि के कारण हो, क्योंकि अदालतों ने माना कि चालक ही अंतत: उत्तरदायी था और वह अपनी जिम्मेदारी किसी मशीन पर नहीं डाल सकता.

इसी तरह, कंपास के उपयोग में अदालतों ने मानवीय दखल को अभी भी अनिवार्य माना है. ये और अन्य विकसित एआई कानून उन मामलों का निर्णय लेने में भारतीय अदालतों का मार्गदर्शन करते हैं जो उसके अधिकार क्षेत्र के भीतर हैं.

एआई संबंधित कानून का एक और पहलू बौद्धिक संपदा अधिकार के दावे हैं. एआई-जेनरेटेड सोर्स कोड के मुद्दे पर कैलिफोर्निया की एक अदालत में जॉन डो और अन्य बनाम गिटहब इंक और अन्य का क्लास ऐक्शन सूट एआई से बनाई सामग्री की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है.

इस मामले में एआई मॉडल को ट्रेन करने के लिए ओपन सोर्स कोड का उपयोग करने की खातिर माइक्रोसॉफ्ट, गिटहब और ओपनएआई के अधिकार को चुनौती दी गई है. दावा है कि एआई के माध्यम से बने कोड, लाइसेंसिंग की शर्तों का उल्लंघन करते हैं.  

सुप्रीम कोर्ट ने 18.2.2015 के प्रज्वाला पत्र के जरिए अपराधों से निबटने के लिए एआई की मदद का आदेश जारी किया था. 2017 में हिंसक वीडियो और उकसावे के मामले में अदालत ने महिलाओं और बच्चों के खिलाफ सामग्री की पहचान करने के लिए एआई-संचालित उपकरण विकसित करने का सर्वसम्मत फैसला सुनाया, जिससे ऐसी सामग्री को व्यापक प्रसार से रोका जा सके. आज की तारीख में विकसित टेक्नोलॉजी ने इसे हकीकत बना दिया है.

इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि एआई बना रहेगा और विभिन्न मामलों में समाज को लाभान्वित करेगा. अध्ययन पत्र में समय के साथ एआई के जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने पर बहुत जोर दिया गया है और राष्ट्रीय हितों, निजी अधिकारों या कारोबारी हितों को चोट पहुंचाए बिना इस्तेमाल किया जाना जरूरी है. 

- एन.एस. नप्पिनाई (सुप्रीम कोर्ट में वकील और साइबर साथी फाउंडेशन की संस्थापक)

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