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एआई : स्वागत कीजिए मगर जरा होशियारी से!

21वीं सदी की तमाम तकनीकी प्रगति की तरह, एआई सिद्धांत रूप में बहुत ही रोमांचक लग सकता है लेकिन वास्तव में यह बहुत अराजक साबित हो सकता है

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास/ एआई
इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास/ एआई
अपडेटेड 19 जनवरी , 2024

समित बसु, (उपन्यासकार और फिल्म निर्माता)

मैं विज्ञान कथा लेखक के रूप में हमेशा 'टेक्नोजॉय' के प्रति बहुत ज्यादा संवेदनशील रहता हूं. रोबोट मित्रो! अंतरिक्ष! यूटोपियन महानगर! दुर्भाग्य से, आज की दुनिया में, विशेषकर भारत में रहने वाले इंसान के तौर पर वास्तविकता 'टेक्नोफियर' और 'टेक्नोफटीग' के लिए बहुत मौके मुहैया कराती है. कोई नहीं जानता कि 2050 में भारत कैसा दिखेगा. कोई नहीं जानता कि अगले महीने भारत कैसा दिखेगा—बहुत कुछ वैसा ही रहेगा, कुछ चीजें बदतर होंगी, कुछ बेहतर.

विज्ञान कथा अक्सर भविष्यवाणी करने के लिए बहुत सारा श्रेय लेती है, लेकिन जो भी विज्ञान कथा है, उसमें लिखते वक्त व्यक्तिगत और सामाजिक आशाओं और डर की झलकी होती है. कभी-कभी अच्छे शोध और रुझान की पहचान की बदौलत भविष्यवाणियां वास्तविकता से मेल खाती हैं. अक्सर वे मेल नहीं खातीं हैं, और वैसे भी यह उनका मकसद नहीं होता.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक सपना है जो मनुष्य प्राचीन काल से देखता आया है. यही वजह है कि ज्यादातर प्राचीन संस्कृतियों के मिथकों में ऑटोमेटा (स्वत: चलने वाले), मेकैनिकल प्राणी और बुद्धिमान वस्तुएं हैं. इसे आसानी से समझाया जा सकता है—मानव इतिहास के हर चरण में, लोगों को दूसरे लोग परेशान करने वाले, अक्षम और बहस-मुबाहिसा करने वाले लगे हैं, और वे चाहते थे कि किसी तरह दूसरे लोगों के बिना ही काम कर लिया जाए. हम, बेहतर और बदतर की खातिर एआई विकास के एक नए चरण में हैं. इसमें मशीन लर्निंग और उन्नत एल्गोरिद्म ने विशिष्ट डोमेन में एआई को प्रेरित किया है.

एआई के अगले चरण में उसे अपने वजूद का एहसास होगा, और जो खुद तर्क और बातचीत करने में सक्षम होगा. और फिर आपके पास वह एआई है जो मानव बुद्धि के करीब पहुंचकर तेजी से उससे आगे निकल जाती है, जहां ज्यादातर विज्ञान कथाएं एआई का आनंद लेती हैं. सौभाग्य से, हममें से कोई भी अपने जीवनकाल में यह नहीं देख पाएगा क्योंकि जो बायोटेक फर्म आपको अमरता बेचने की कोशिश कर रही है, वह भी आपसे झूठ बोल रही है. 

21वीं सदी की सभी तकनीकी प्रगति की तरह, एआई के साथ बात यह है कि सिद्धांत रूप में यह बहुत रोमांचक लग सकता है लेकिन वास्तव में यह बेहद अराजक हो सकता है, या कम से कम इसका विस्तार बहुत असमान हो सकता है. हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहां यूटोपिया और डिस्टोपिया दोनों मौजूद हैं, और उनके बीच की दूरियां बढ़ती जा रही हैं. लिहाजा, भारत जैसे देशों में सवाल यह नहीं है कि तकनीक क्या है या यह कितनी सक्षम है. यह समझना बहुत जरूरी है कि इसका उपयोग कैसे किया जाएगा, यह समाज के विभिन्न स्तरों पर कैसे असर डालता है, और हमारे राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संकटों के अविश्वसनीय मिश्रण को कैसे प्रभावित करता है. विशेषाधिकार के प्रत्येक स्तर पर क्या वादा किया जा रहा है? और बदले में क्या मांगा जा रहा है?

जिस तरह सुरक्षा के वादे पर निगरानी बेची जाती है और फिर सामाजिक नियंत्रण और डेटा हड़प लिया जाता है, उसी तरह एआई को भी कुछ वादों पर बेचा जा रहा है. इसके साथ ही यह अन्य चीजें भी मुहैया कराएगा. एआई टूल्स के साथ आपका अनुभव इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या आप उस तरह के व्यक्ति हैं जो यह पता लगाने के लिए कि वे किस सेलिब्रिटी की तरह दिखते हैं, अपने चेहरे का डेटा अपनी मर्जी से दे देते हैं. बेशक एआई-संवर्धित तकनीक कुछ लोगों के जीवन में दक्षता लाएगी और उसे बेहतर बनाएगी. लेकिन किसके जीवन में?

एआई के साथ सबसे जरूरी मुद्दा यह है कि कारोबार फिलहाल लागत में कटौती की खातिर आदिम एआई को अपनाने की ओर ले जाता है. एआई/रोबोट के बारे में सबसे पहला तकनीकी डर यह है कि वे समाज में इंसानों की जगह ले लेंगे. यह आज की समस्या नहीं है, लेकिन हमारे पास पहले से ही बेरोजगारी का संकट है, और एआई टूल के साथ लागत-बचत की संभावना इस संकट को और विकट बना देंगे. मैंने देखा है कि कई लेखक और कलाकार जबरदस्त सॉफ्टवेयर आने से अपनी आमदनी गंवा रहे हैं, क्योंकि कारोबार में क्वालिटी की नहीं बल्कि लागत की परवाह की जाती है (और सॉफ्टवेयर की क्वालिटी में और सुधार होगा) और उपभोक्ताओं को भी कोई परवाह नहीं है. और वृहद स्तर पर वे गलत नहीं हैं—उपभोक्ताओं को परवाह न करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है.

इस बीच, अन्य रचनाकार जिनके स्वयं के करियर टेक्नोलॉजी से सुरक्षित हैं, बताते हैं कि एआई कभी भी मानव कला की गुणवत्ता तक नहीं पहुंच सकता, या कैसे इंसान और मशीनें अधिक प्रतिभा पैदा करने के लिए सहयोग कर सकती हैं. यह भी सही है. लेकिन इसका मतलब सिर्फ यह है कि केवल विशेषाधिकार प्राप्त लोग ही रचना कर सकते हैं, जो मानव इतिहास में अक्सर हुआ है, लेकिन यह भी सच है कि कला को लोकतांत्रिक बनाने के लिए नई तकनीक के वादे झूठ थे. यह एआई को शक्तिशाली लोगों के हाथों में एक और भयावह औजार बना देता है.

एआई का उपयोग उन प्रणालियों को ठीक करने के लिए क्यों किया जा रहा है जो त्रुटिपूर्ण हैं लेकिन काम कर रही हैं? एआई चित्रकारों की जगह क्यों ले रहा है, सत्ता में बैठे खराब लोगों को दुरुस्त क्यों नहीं कर रहा है? एआई उबाऊ काम क्यों नहीं कर रहा है, सिर्फ दिलचस्प कामों की लागत में कटौती क्यों कर रहा है? दुनिया में समस्याओं या संकटों की कोई कमी नहीं है जहां बेहतर तकनीक मदद कर सकती है, या ऐसे काम जो बहुत खतरनाक, या थकाऊ, या अपमानजनक हों, उनके लिए एआई समाधान कहां हैं? एआई केवल उस दुनिया में एक अद्भुत उपकरण है जहां मानवीय प्रणाली पहले से ही मौलिक रूप से काम करती है, एक यूटोपिया जहां मनुष्य कला बनाते हैं और उसका आनंद लेते हैं, जबकि मशीनें नीरस काम करती हैं. ऐसा केवल विज्ञान कथा में ही क्यों होता है?

फिक्शन के संदर्भ में एआई अभी एक अवधारणा के रूप में स्टार ट्रेक का वादा कर रहा है. लेकिन तकनीक के माहिर वास्तव में ब्लैक मिरर बनाने की कोशिश कर रहे हैं. वैसे, वे फिलहाल खोसला का घोसला बना रहे हैं, जो बदल जाएगा. लेकिन निकट भविष्य में एआई के बारे में कुछ भी अच्छा नहीं दिखता—तकनीक से धनाढ्य हुआ वर्ग चमकदार नए खिलौने पेश करेगा जो चरमराती, त्रुटिपूर्ण प्रणालियों और उनमें काम करने वाले लोगों को अप्रासंगिक बना देंगे, और फिर यह पता चलेगा कि खिलौने भी किसी काम के नहीं हैं. यह सिर्फ निराशावाद या बदलाव का डर नहीं है, बल्कि यह तय है कि दुनिया को चलाने वाले कुछ लोग अरबों अन्य मनुष्यों से होने वाली असुविधा के बिना एक सुंदर, व्यवस्थित ग्रह का आनंद लेंगे.

जब हम दुनिया पर नजर डालते हैं तो देख सकते हैं कि मानव जीवन कितना सस्ता है, और कैसे अधिकांश समृद्ध देश अंतरराष्ट्रीय कानून या मानवाधिकारों की परवाह करने की बजाए दीवारें बनाने और संसाधनों को हथियाने को लेकर अधिक चिंतित हैं. यह आसान नहीं होने वाला है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन हालात को बदतर बना देता है और माइग्रेशन और खाद्य संकट मानवता को जंगली बना देते हैं. यह उस तकनीक से उत्साहित होने का समय नहीं है जो अधिक लोगों को अप्रासंगिक बना देती है.

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