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क्या अब AI की मदद से चुनाव भी जीता जा सकता है?

चुनाव में एआई के असर से इनकार नहीं किया जा सकता. यह रणनीतियों में बदलाव ला सकता है, मतदाता तक पहुंच को आसान बना सकता है और जनमत को भी प्रभावित कर सकता है

इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास
इलस्ट्रेशन: नीलांजन दास
अपडेटेड 29 जनवरी , 2024

भारत का जीवंत लोकतंत्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की बदौलत पूरी तरह बदलाव के मुकाम पर है. एआई से संचालित कई नए ऐप्लिकेशन तेजी से रोजमर्रा की जिंदगी में घुसपैठ कर रहे हैं और चुनाव भी इसका अपवाद नहीं.

मतदाताओं से एकदम निचले स्तर पर संपर्क करने से लेकर जनमत को प्रभावित करने तक एआई में समूचे चुनाव अभियान को नई शक्ल दे पाने की क्षमता है. यानी वह अवसर और चुनौती दोनों पेश कर रहा है. 

एआई का एक सबसे महत्वपूर्ण असर यह है कि वह एकदम सटीक ढंग से मतदाता को साधने में सक्षम है. इसके लिए विशाल डेटा भंडार का इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें डेमोग्राफी, सोशल मीडिया एक्टिविटीज और ऑनलाइन बिहेवियर शामिल हैं. इनके आधार पर किसी मतदाता का व्यापक प्रोफाइल बन सकता है. इन प्रोफाइल्स को फिर निजी स्तर पर ऐसी सामग्री, विज्ञापन और मैसेज दिए जा सकते हैं जो उनकी दिलचस्पी और सरोकारों से जुड़े हों.

घर-घर जाकर मिलने के पारंपरिक अभियान के उलट एआई संचालित माइक्रो टारगेटिंग से ऐसी माकूल रणनीतियां बनाई जा सकती हैं जो मतदाताओं का रुख सटीक ढंग से मोड़ सकें.

हम एआई संचालित विश्लेषकों के बहुत सारे ऐप्लिकेशन पहले ही देख चुके हैं. मसलन, एक राजनैतिक सलाहकार फर्म कैंब्रिज एनालिटिका ने फेसबुक के करोड़ों प्रोफाइल से डेटा लेकर मतदाताओं का विस्तृत मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल तैयार किया. उन्होंने इस सूचना का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत विज्ञापनों और संदेशों के रूप में मतदाताओं को लक्षित करने में किया. इस तरह 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में मतदाताओं के फैसले को संभावित रूप से प्रभावित करने में इनका उपयोग किया गया.

एआई सही आदमी को सही संदेश सौंपने तक ही सीमित नहीं है. वह यह भी तय कर सकता है कि संदेशों को किस तरह समझा जाए: डीपफेक यानी छेड़छाड़ कर बनाए गए पर असली लगते वीडियो का इस्तेमाल विरोधियों के खिलाफ झूठी कहानियां गढ़ने और गलत अभियान चलाने के लिए किया जा सकता है.

सोशल मीडिया बॉट्स संदेश को बढ़ा-चढ़ा कर फैला सकते हैं और नकली रुझान पैदा कर सकते हैं, जनमत को गलत तरीके से प्रभावित कर सकते हैं और असमंजस वाले मतदाताओं को बरगला सकते हैं. एआई संचालित प्रचार इतना तीक्ष्ण होता है कि झूठ से सच को अलग करना लगातार मुश्किल हो रहा है जो चुनाव के दौरान निर्णय प्रक्रिया के लिए भारी खतरा पैदा करता है.

मतदाताओं को फुसलाने के अलावा एआई दूसरे तरीके से अभियान की रणनीतियों में भी क्रांति ला सकता है. मनोभाव विश्लेषण टूल्स जनमत का अनुमान लगा सकते हैं और उभरने वाले मसलों की पहचान कर सकते हैं जिससे अभियान को अपने संदेश बनाने और मतदाताओं के लिए क्या महत्व रखता है, उस पर जोर देने की सुविधा मिल जाती है.

एआई संचालित चैटबॉट रोजमर्रा की पूछताछ को संभाल सकते हैं और मतदाताओं को 24 घंटे सूचना दे सकते हैं जिससे अधिक महत्वपूर्ण काम के लिए ज्यादा मानव संसाधन उपलब्ध हो सकते हैं. डेटा से संचालित मॉडल मतदान प्रतिशत का अनुमान लगा सकते हैं और संसाधन आवंटन को अधिकतम अनुकूल बना सकते हैं.

इन टूल्स को जोड़कर बड़े पैमाने पर लक्षित दुष्प्रचार अभियान चलाना, फेक न्यूज बनाना और खास आबादी या क्षेत्रों के लिए उनके ऑनलाइन व्यवहार और सोशल मीडिया गतिविधियों के आधार पर प्रचार करना संभव है. इससे मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए उम्मीदवारों और मसलों के बारे में झूठी कहानियां गढ़ी जा सकती हैं. डीपफेक, छेड़छाड़ वाले वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल उम्मीदवारों और घटनाओं के बारे में झूठे चित्रण के लिए किया जा सकता है.

इसके अलावा एआई संचालित बोट्स का उपयोग ऐसे फेक अकाउंट्स के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भरने में किया जा सकता है जो खास संदेशों को बहुप्रचारित करते हैं, कृत्रिम रुझान पैदा करते हैं और जनमत को नियंत्रित करते हैं. इससे कतिपय उम्मीदवारों या मसलों के प्रति व्यापक समर्थन का आभास हो सकता है भले ही वह सही न हो.

मनोभाव विश्लेषण टूल्स का इस्तेमाल युवा मतदाताओं या हाशिए वाले समूहों जैसी संवेदनशील आबादी की पहचान और उन्हें लक्ष्य करने में किया जा सकता है, उनकी चिंताओं या पूर्वाग्रह का दोहन करने के लिए दुष्प्रचार तैयार किया जा सकता है. एआई का उपयोग उम्मीदवारों, मतदाताओं और रणनीति अधिकारियों के निजी आंकड़ों को हैक करने और संवेदनशील सूचनाओं को उजागर करने के अलावा ब्लैकमेलिंग या अन्य किसी गलत उद्देश्य के लिए भी किया जा सकता है. 

खतरे इससे भी बड़े हो सकते हैं. अब एआई संचालित सोशल मीडिया अभियानों के जरिए विदेशी तत्व लोकतांत्रिक समाजों को प्रभावित कर सकते हैं. ये विदेशी तत्व मतदान मशीनों और मतदाता डेटाबेस जैसे चुनावी ढांचे पर साइबर हमले करने के लिए एआई का उपयोग कर सकते हैं और इस तरह मतदान प्रक्रिया में बाधा डाल सकते हैं या वोटों को प्रभावित कर सकते हैं.

एआई टूल्स के लगातार आधुनिक होते जाने से उन्हें पकड़ पाना और गड़बड़ गतिविधियों के लिए विदेशी तत्वों को दबोचना या जिम्मेदार ठहरा पाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. इससे भविष्य में उनका दखल रोकने और उनको जिम्मेदार ठहराने के प्रयासों में बाधा आ सकती है. 

माना जाता है कि विदेशी तत्वों ने अमेरिका के 2016 और 2020 के राष्ट्रपति चुनावों में दखल दिया. उन्होंने फिलीपींस के मध्यावधि चुनाव में भी ऐसा ही किया. विदेशी सरकारों और उनसे जुड़े ट्रोल संगठनों ने जनमत को प्रभावित करने के मकसद से गुमराह करने वाली सामग्री और फेक अकाउंट्स के नेटवर्क के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को एआई संचालित बॉट्स से भर दिया. इन बॉट्स ने कुछ संदेशों को बहुत ज्यादा प्रसारित किया, खास उम्मीदवारों के प्रति व्यापक समर्थन का भ्रम पैदा किया और विरोधी उम्मीदवारों के खिलाफ साजिशें और नुक्सानदेह कहानियां फैलाईं.

हमारे चुनाव में भी इसके असर के अंदेशों को देखते हुए यह अहम है कि कई उपायों पर तुरंत काम किया जाए. सबसे पहले चुनावी ढांचे और मतदाताओं को साइबर हमले से सुरक्षित करने के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा उपाय जरूरी हैं. दूसरा, मतदाताओं को अपनी मीडिया साक्षरता विकसित करनी होगी जिससे उन्हें गलत सूचना और दुष्प्रचार की पहचान करने और उसे रोकने में मदद मिले. तीसरा, चुनाव में विदेशी दखल से निबटने को हमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग और लोकतांत्रिक देशों के बीच सूचना साझेदारी मजबूत बनानी होगी. 

लब्बोलुबाब यह कि हमें राजनैतिक अभियानों में एआई के उपयोग के लिए नियमन और नैतिक दिशा-निर्देश बनाने चाहिए जिनसे दुरुपयोग का जोखिम रोकने और पारदर्शिता पक्की करने में मदद मिले. इसमें डेटा संग्रह और उनके इस्तेमाल पर नियमन के साथ-साथ स्वतंत्र ऑडिट की व्यवस्था और ऑनलाइन सामग्री की फैक्ट चेकिंग शामिल है. सभी चुनाव सामग्रियों पर स्पष्ट रूप से अधिकृत राजनैतिक दलों, उम्मीदवारों और पंजीकृत मीडिया की छाप होनी चाहिए. मतदाता तभी सत्यापित सामग्री और संभावित दुष्प्रचार के बीच भेद कर सकेंगे.

चुनाव में एआई के असर से इनकार नहीं किया जा सकता. यह रणनीतियों में आमूल बदलाव ला सकता है, मतदाता तक पहुंच को निजी बना सकता है और जनमत को प्रभावित कर सकता है. एआई मतदाताओं को अपने उम्मीदवारों और विभिन्न राजनीतिक दलों के बारे में लक्षित सूचना दे सकता है. लेकिन संभावित लाभ के हमेशा गंभीर जोखिम भी होते हैं जिनसे निबटने की जरूरत है. भारत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने में अगुआ रहा है. पारदर्शिता, डिजिटल साक्षरता और नियमन अपना कर हम यह पक्का कर सकते हैं कि एआई हमारे भले के लिए ताकत बने.

जयंत सिन्हा (अध्यक्ष, वित्तीय मामलों पर संसद की स्थायी समिति, और लोकसभा सांसद)

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