साहित्य-कला

मासूम हिंद गूंजती सदा
गजा में हिंसा का शिकार एक नन्हीं जान की असल आवाज को केंद्र में रख कौसर बेन हानिया ने रची हमारी अंतरात्मा को हिला देने वाली 'द वॉएस ऑफ हिंद रजब'.

समृद्ध इतिहास की पुनर्खोज
भारत की सांस्कृतिक धरोहरों की अनछुई पर्यटन क्षमता और इस क्षेत्र में दूसरे देशों से आगे बढ़ने पर आर्किटेक्ट आभा नारायण लांबा ने क्या कुछ कहा इंडिया टुडे हिंदी पर पढ़िए

तीजन बाई : पंडवानी से दुनिया जीतने वाली विद्रोही आवाज
तीजन बाई के पहले पंडवानी में पुरुषों का वर्चस्व था लेकिन उनके आने के बाद वे इस कला का दूसरा नाम बन गईं

हॉकी के लिए उम्मीद की किरण
मिडफील्डर हार्दिक सिंह को आगामी विश्वकप और एशियाई खेलों में भारतीय हॉकी टीम के बहुत अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद.

राग और रागिनियों का उत्सवधर्मी मन
संगीत का अनुरागी, जब संगीत का साहित्य रचने लगे तो वह साहित्यकार नहीं रह जाता, स्वयं राग, लय, छंद बन जाता है. यतीन्द्र सिर्फ संगीत के अनुरागी नहीं, संगीत के गहन जानकार हैं.

एक दरवेश, एक तहजीब और कई यादें
'अ सेलिब्रेशन ऑफ मेमोरीज' में विभाजन का दर्द इतिहास की तारीख नहीं बनता बल्कि किसी बूढ़े आदमी की कांपती हुई उंगलियों में उतर आता है.

तख्त के साए में शब्दों का उजेरा
'हुमा का पंख' उपन्यास की लेखिका ने प्रस्तावना में लिखा है कि उन्होंने रहीम के जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व को जानने-समझने में काफी पसीना बहाया है. यही वजह है कि घटनाओं के क्रम, उनके कालखंड और पात्र काफी हद तक विश्वसनीय लगे हैं.

द्वैत और दुविधा के अक्स
अर्धनारीश्वर. एक ही देह में स्त्री और पुरुष? कुफ्र और ईमान? चाहत और विवेक? गहरे फलसफे वाली एक प्रस्तुति 30 साल बाद फिर से लौटी मंच पर.

समय की कोख में दबे स्त्री-स्वर
मुकुल कुमार एक प्रशासनिक अधिकारी हैं जो अपनी पुुस्तक 'विमेन इन द वूम्ब ऑफ टाइम' में स्त्री-अस्तित्व, नारीवाद और पितृसत्ता की जटिल परंपराओं की खोज करते हैं

जिसने दिल्ली का चराग जलाए रखा
रज़ीउद्दीन अकील की पुस्तक हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया अपने शुरूआती पन्ने से स्मरण कराती है कि भारतीय उपमहाद्वीप की मध्यकालीन सूफी परंपरा की आत्मा ठीक इसके विपरीत थी.

दुनिया को क्लिक करती औरतें
कैमरे वालियां पुस्तक की सबसे खास बात यह है कि पुस्तक प्रत्यक्ष तर्कों से नहीं बल्कि जीवन प्रसंगों के जरिए बताती है कि फोटोग्राफर और फोटो पत्रकार में क्या अंतर है?

राजकमल चौधरी : लेखक जिसे जीते जी हम पहचान न सके!
मृत्यु के समय राजकमल चौधरी की आयु अड़तीस के करीब थी लेकिन भीतर वही बच्चा था जो प्यार के लिए तड़पता रहा
