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डार्क मोड

आजादी के अर्थ की तलाश में

यह किताब भारत के विचार को राजनीतिक सिद्धांतों, बॉम्बे सिनेमा और उर्दू की प्रगतिशील कविता में खोजने की कोशिश है जहां पाठक जान पाता है कि हम क्या पा चुके हैं और क्या बाकी है

लैंग्वेजेज़ ऑफ फ्रीडम, लेखक : नीरा चंडोक
अपडेटेड 13 सितंबर , 2026

‘‘देख ज़िदां के परे रंग-ए-चमन, जोश-ए-बहार,
रक़्स करना हो तो पांव की ज़ंजीर न देख ’’
                                                     — मजरूह सुल्तानपुरी

प्रगतिशील लेखकों के हाथों में कविता कभी उन लोगों को दिलासा देने के लिए नहीं रही जो आजाद नहीं थे. उसका काम उन्हें यह याद दिलाना था कि शरीर भले कैद हो पर मन जेल की कोठरी से बाहर निकल सकता है. द पोएट्री ऑफ फ्रीडम अध्याय के मध्य आया यह शेर नीरा चंडोक की किताब लैंग्वेजेज़ ऑफ फ्रीडम  का मूल स्वर-सा जान पड़ता है.

पांच निबंधों की यह किताब बार-बार तगादा करती है कि आखिर जनता के लिए आजाद होने का अर्थ क्या है और आजादी के इतने वर्षों बाद भी वह अर्थ हमारी उंगलियों के बीच से फिसलता क्यों जाता है?

राजनीतिक सिद्धांत की दुनिया में लंबे समय से सक्रिय चंडोक इन निबंधों में आजादी को दार्शनिक अमूर्तन बनाकर नहीं छोड़तीं. वे उसे उन जगहों पर तलाशती हैं जहां राजनीतिक सिद्धांत अक्सर गंभीरता से नहीं जाता.

बंबई के सिनेमा में, मुशायरों में पढ़ी जाने वाली नज्मों में और बंगाल के उन बौद्धिक विमर्शों में, जहां कभी यह सवाल उठा था कि स्वतंत्रता और स्वराज आखिर एक ही चीज हैं भी या नहीं. किताब की यही पद्धति अपने आप में एक तर्क है. किसी राष्ट्र की राजनीतिक कल्पना जितनी उसके संविधान में रहती है उतनी ही उसके गीतों, पटकथाओं में भी सांस लेती है.

पहला निबंध स्वराज ऐज़ फ्रीडम  गांधी की उस धारणा से गुजरता है जिसमें स्वराज केवल अंग्रेजों से सत्ता लेकर भारतीयों को सौंप देना नहीं था. वह भीतर की एक कठिन साधना थी. पहले अपने ऊपर शासन करना, फिर आगे की बात करना.

चंडोक इसे रूसो और हॉब्स की स्वतंत्रता की अवधारणाओं के साथ रखती हैं और के.सी. भट्टाचार्य के 1928 के निबंध स्वराज इन आइडियाज़ की ओर भी लौटती हैं. भट्टाचार्य का सवाल आज भी बेचैन करता है कि उपनिवेश बनाने वाला चला जाए, तब भी क्या उपनिवेशित मन गुलाम रह सकता है? किताब बार-बार ध्यान दिलाती है कि विचार की स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता एक खोखली विरासत है.

दूसरा निबंध थिंकिंग फ्रीडम  सत्ता और खासकर बहुसंख्यकवादी सत्ता के उस भय की पड़ताल करता है, जो उसे सोचने और सवाल करने वाले नागरिक से होता है.

लेकिन तीसरे और चौथे निबंध किताब में जीवन की गर्मी भर देते हैं. द पोएट्री ऑफ फ्रीडम 1936 के लखनऊ में बने प्रगतिशील लेखक संघ और उसके असाधारण संसार में ले जाता है. फैज, साहिर, जोश, इस्मत चुगताई और मजाज़. ये वे लेखक थे जो मानते थे कि साहित्य का काम इंसाफ के लिए पुकार बनना है, समाज को नींद में ले जाना नहीं.

यही सोच फिल्म्स ऐज़ क्रिटिक्स ऑफ अनफ्रीडम अध्याय पर्दे पर दिखाता है. राज कपूर की बेचैनी, गुरु दत्त की उदासी, वी. शांताराम का सुधारवादी आग्रह और बिमल रॉय का शांत लेकिन भीतर-भीतर हिलोरे उठाने जाने वाला सृजन. इन फिल्मों में एक नए आजाद गणराज्य से असुविधाजनक सवाल पूछने का साहस था. फिर सेंसरशिप और बाजार की होड़ ने धीरे-धीरे उस धार को कुंद कर दिया.

अंतिम निबंध राइटिंग इंडियन पॉलिटिकल थ्योरी  किताब को आत्ममंथन की ओर मोड़ देता है. पढ़ने वाला सोचता है कि क्या भारतीय अपने ही मुहावरे में स्वतंत्रता का सिद्धांत गढ़ सकते हैं या आजादी को समझने के लिए अब भी अपने पूर्व शासकों से उधार ली गई शब्दावली पर निर्भर हैं.

लैंग्वेजेज़ ऑफ फ्रीडम आजादी का कोई अंतिम उत्तर नहीं देती क्योंकि यह स्वतंत्रता को मंजिल नहीं, प्रक्रिया मानती है. चंडोक के शब्दों में 'एक यात्रा', ठहराव नहीं. आज जब भारत कई तरह के भय और बहुसंख्यकवादी बादलों से घिरा दिखाई देता है तब बहुतेरे ऐसे विचार और सवाल हैं जो जरूरी हैं.

शायद इसीलिए मजरूह का वह कैदी इस किताब के अंत तक हमारे साथ बना रहता है, जंजीरें हैं लेकिन नजर उनके पार है. बहार सामने है और आजादी शायद यही है कि मनुष्य, बंधा हुआ होने के बावजूद, रक्स करना न भूले.

लैंग्वेजेज़ ऑफ फ्रीडम
लेखक: नीरा चंडोक
स्पीकिंग टाइगर
मूल्य: 699 रुपए

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