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अलास्का : जहां पृथ्वी अपनी आदिम लय में सांस लेती है

बादलों से ढके पहाड़, समुद्र में टूटकर गिरता ग्लेशियर और अचानक पानी से उभरती एक विराट देह. अलास्का में प्रकृति दृश्य नहीं, एक ऐसी अनुभूति है जहां से लौटकर भी लौटना संभव नहीं. पढ़िए समुद्र के बीच घटे अद्भुत अनुभवों का वृत्तांत

एयालिक ग्लेशियर (फोटो: सुषमा गुप्ता)
अपडेटेड 20 अगस्त , 2026

सुषमा गुप्ता

अलास्का मेरे लिए केवल एक भौगोलिक नाम भर नहीं रहा. यह धरती के उस हिस्से का नाम है जहां गर्मियों में कई जगहों पर सूरज डूबना भूल जाता है और सर्दियों में अंधेरा महीनों तक ठहरा रहता है. जहां विशाल ग्लेशियर हैं, बर्फ से ढके पहाड़ हैं, व्हेल हैं, भालू हैं और जंगल इतने विस्तृत कि उनके सामने मनुष्य की उपस्थिति बहुत छोटी लगने लगे. बरसों से मन में बसे इसी अलास्का को देखने की इच्छा थी, जो इस साल जुलाई के महीने में पूरी हुई.

हमारी अलास्का यात्रा का पहला दिन एंकरेज के नाम था. लगभग ढाई लाख की आबादी वाला एंकरेज अलास्का का सबसे बड़ा शहर है. यही इस विशाल और रोमांचक प्रदेश का प्रमुख प्रवेश द्वार भी है, जहां से अधिकांश यात्राएं शुरू होती हैं. लेकिन एंकरेज से यात्रा शुरू होते ही समझ में आने लगा कि इस जगह की पहचान केवल उसकी बर्फ या उसकी विराटता नहीं है. इसके कई चेहरे हैं जो धीरे-धीरे खुलते हैं.

हम जिस रास्ते पर थे, वह सीवार्ड हाईवे था. दुनिया की सबसे खूबसूरत सड़कों में इसका नाम लिया जाता है. एक ओर टर्नअगेन आर्म का समुद्र, दूसरी ओर चूगाच पर्वतमाला की ऊंची ढलानें और बीच से गुजरती सड़क. रास्ता कहीं समुद्र के बिल्कुल पास चला जाता, तो कहीं पहाड़ अचानक इतने निकट आ जाते कि लगता, अभी हाथ बढ़ाकर उनकी चट्टानों को छू सकते हैं.

सीवार्ड हाईवे से दिखती चूगाच पर्वतमाला

लेकिन उस दिन इस पूरे दृश्य पर सबसे ज्यादा जो हावी था, वह थी बारिश. मैंने रास्ते में कई बार सोचा कि अगर आज धूप होती तो दृश्य कितना अलग होता. फिर लगा कि शायद धूप में यह रास्ता इतना रहस्यमयी नहीं लगता. इन बादलों ने ही तो इसे यह रूप दिया है.

रास्ते में रुकते, प्रकृति का आनंद लेते, करीब ढाई घंटे बाद हम सीवार्ड पहुंचे. यह कोई बड़ा शहर नहीं है बल्कि पहली नजर में तो एक शांत-सा समुद्री कस्बा लगता है. चारों ओर से ऊंचे पर्वतों से घिरा हुआ, सामने समुद्र, पीछे घने जंगल और बीच में छोटी-सी आबादी. इसी कारण इसे अलास्का के सबसे सुंदर नगरों में गिना जाता है.

सीवार्ड जिन बर्फ से ढके पहाड़ों के कारण पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है, वे उस दिन हमें दिखाई ही नहीं दिए. घने, काले बादलों ने उन्हें पूरी तरह अपने भीतर छिपा लिया था. बीच-बीच में लगता कि शायद अब बादल हटेंगे लेकिन वे फिर और नीचे उतर आते.

अपनी ऊंची लहरों के लिए ख्यात टर्नअगेन आर्म

रात को भी यहां पर्याप्त उजाला था. अलास्का की यही बात इसे सबसे विलक्षण भी बनाती है लेकिन रात को जब सब शांत हो गया, तब इस जगह की असली आवाजें सुनाई देने लगीं. बारिश हमारे लकड़ी के कॉटेज की छत पर गिर रही थी. कहीं दूर किसी पक्षी की आवाज आती, फिर कुछ देर बिल्कुल सन्नाटा. फिर हवा पेड़ों से टकराती. भीगी हुई लकड़ी और जंगल की मिली-जुली गंध अंदर तक चली आती.

मैं बहुत देर तक सोई नहीं. अगले दिन के लिए खासी उत्सुक थी. छह घंटे की बोट यात्रा. केनाई फियोर्ड्स नेशनल पार्क. ग्लेशियर. व्हेल. समुद्र. सब कुछ अगले दिन था.

सीवार्ड की उस सुबह बारिश ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा. आसमान धूसर था और समुद्र पर धुंधलका फैला हुआ था. इस समुद्री यात्रा के लिए हमने एक बोट बुक की. वहां दुनिया के अलग-अलग देशों से आए लोग थे. ऐसे लोग, जिन्हें सिर्फ सांसें गिनते हुए जीवन नहीं बिताना बल्कि हर अनुभव को पूरी तीव्रता से जीना आता है. रोमांच उनके लिए शौक नहीं, जीवन जीने का तरीका था.

जिस बोट से हमें यात्रा करनी थी, उसमें लगभग सौ यात्रियों के बैठने की व्यवस्था थी. बोट मुख्य रूप से दो ढके हुए डेकों में विभाजित थी. दोनों ही वातानुकूलित थे और आरामदायक सीटों से सुसज्जित. दोनों डेक के चारों ओर खुला बाहरी हिस्सा भी बना हुआ था, जहां खड़े होकर समुद्र को बिल्कुल करीब से महसूस किया जा सकता था.

इसके अलावा सबसे ऊपर एक तीसरा, पूरी तरह खुला (अनकवर्ड) ऑब्ज़र्वेशन डेक भी था. वहां कोई छत नहीं थी. जो यात्री हवा के तेज झोंकों और चारों ओर फैले समुद्र का निर्बाध अनुभव लेना चाहते थे, उनके लिए यही सबसे उपयुक्त स्थान था. पर यात्रा शुरू होने के समय बारिश इतनी तेज थी कि ज्यादातर लोग भीतर चले गए पर मैं ऊपरी डेक के खुले हिस्से में रुकी रही, अपना रेनकोट चढ़ाए. भीगते हुए समुद्र को महसूस करना मुझे कांच के पीछे से देखने की तुलना में अधिक सच्चा अनुभव लगा.

अलास्का की समुद्री यात्रा के लिए बोट का संसार

नाव धीरे-धीरे रिसरेक्शन बे से आगे बढ़ी. दोनों ओर पहाड़ थे, जिनकी चोटियां बादलों में कहीं खो गई थीं. पानी पहली नजर में शांत दिखाई देता था लेकिन समुद्र की अपनी एक लय होती है. कुछ देर बाद नाव हल्के-हल्के उठने और गिरने लगी और धीरे-धीरे ये हिचकोले बहुत उग्र होते गए. इतने कि कैप्टन ने चेतावनी दी कि डेक की रेलिंग से दूर रहें.

मैं थोड़ा पीछे हटी पर अंदर नहीं आई. बारिश चेहरे पर पड़ रही थी और हवा इतनी ठंडी थी कि कोट की जेब में भी उंगलियां सुन्न होने लगी थीं.

बोट धीरे-धीरे रिसरेक्शन बे से निकल रही थी. सामने धुंध में लिपटे पहाड़ थे. समुद्र गहरे स्लेटी रंग का था. हवा में नमक था और बारिश की बहुत महीन बूंदें चेहरे पर पड़ रही थीं. रास्ते भर समंदर का हिस्सा बने द्वीपों पर जगह-जगह अद्भुत जलप्रपात दिखाई देते रहे. कोई इतना चौड़ा कि मानो पूरी पहाड़ी ही जल की चादर ओढ़े खड़ी हो तो कोई पतली, दूधिया धारा की तरह ऊंचाइयों से प्रचंड वेग के साथ नीचे उतरता हुआ सीधे समुद्र में समा जाता. प्रकृति का यह दृश्य सम्मोहित कर देने वाला था.

बोट भी मौसम के स्वभाव के साथ अपनी चाल बदलती रहती. कभी हल्के-हल्के हिचकोले लेती, कभी लहरों को चीरती हुई, बहुत ऊपर तक उछलती तेजी से आगे बढ़ जाती. यात्री भी मौसम के साथ अपना ठिकाना बदलते रहते. कभी सब बाहर डेक पर आ जाते, कभी भीगने से बचने के लिए भीतर लौट जाते. लेकिन मैंने बाहर ही अपना एक कोना चुन लिया था. मन किसी भी कीमत पर उस दृश्य से दूर नहीं होना चाहता था.

पर वह प्रकृति ही क्या जो इंसान की हठ न तोड़ दे. धीरे-धीरे बारिश इतनी उग्र हो गई और हवा इतनी बेकाबू कि लगने लगा, मानो रेनकोट भी अब किसी काम का नहीं रहेगा. हवा के थपेड़े शरीर को डगमगा रहे थे. अपना संतुलन बनाए रखना भी कठिन होता जा रहा था. अंततः मन मारकर मुझे भी भीतर आना पड़ा.

हालांकि भीतर केवल शरीर आया था, मन अब भी उसी खुले डेक पर, बारिश और समुद्र के बीच खड़ा था. कांच की दीवार के पीछे बैठकर भला समुद्र, पहाड़ और बारिश को कहां महसूस किया जा सकता है? उन्हें केवल देखा जा सकता है. उन्हें सचमुच जीना हो तो उस तूफान को चेहरे पर, उस बारिश को मस्तक पर और उस नमकीन हवा को अपनी सांसों में महसूस करना पड़ता है. वह अनुभव किसी भी सुरक्षित खिड़की के पीछे बैठकर संभव नहीं.

यात्रा अभी शेष थी और उसे पूरा करने के लिए स्वयं को सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक था. जैसे ही बारिश थोड़ी कम हुई, मैं फिर ऊपर चली गई. यही सिलसिला पूरे छह घंटे चलता रहा. बारिश तेज होती तो मजबूरी में नीचे आना पड़ता, थोड़ी कम होती तो फिर डेक पर. आज सोचती हूं तो लगता है, शायद वह जिद नहीं थी. वह उस जगह को पूरी तरह जी लेने की अदम्य इच्छा थी.

ग्लेशियर में धड़कता समय

करीब दो घंटे बाद कप्तान की आवाज स्पीकर पर सुनाई दी, “दाईं ओर देखिए. सामने एयालिक ग्लेशियर है.” मैं लगभग दौड़कर रेलिंग तक पहुंची.

पहाड़ों के बीच दूर एक बेहद चौड़ी नीली-सफेद दीवार दिखाई दे रही थी. जैसे-जैसे बोट पास पहुंचती गई, उसका आकार खुलता गया. तस्वीरों में ग्लेशियर बड़े लगते हैं. असल में वे कल्पना से भी कहीं ज्यादा विशाल होते हैं. उनके सामने खड़े होकर समझ आता है कि प्रकृति के साथ ‘विराट’ विशेषण क्यों लगता है.

बोट कुछ देर के लिए लगभग स्थिर हो गई. सब लोग कैमरे निकाल डेक पर आ चुके थे. बारिश लगातार हो रही थी, पर इस नजारे के आगे बारिश की परवाह अब किसी को नहीं थी.

विराट एयालिक ग्लेशियर

वहां पहुंचकर सबसे पहले मेरी नजर ग्लेशियर पर नहीं, उसकी खामोशी पर गई. इतना विशाल हिमखंड और इतनी गहरी शांति.

तभी कप्तान ने कहा, “आज भाग्य आपका साथ दे रहा है. ध्यान से सुनिए.”

पहले तो कुछ समझ नहीं आया. फिर उस विशाल हिमखंड के भीतर से एक गूंज उठी. जैसे पहाड़ की छाती के भीतर कोई भारी चीज टूट रही हो. कुछ सेकंड बाद ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर समुद्र में गिरा.

वह आवाज. उसे किसी एक शब्द में बांधना मुश्किल है. वह धमाका भी था, गर्जना भी और समय के टूटने की ध्वनि भी.

पानी कई दिशाओं में उछला और समुद्र में नीली बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े तैरने लगे. कप्तान ने बताया कि इसे कैल्विंग कहते हैं. हिमनद लगातार चलते रहते हैं. अपने ही भार, तापमान और समुद्र के प्रभाव से उनके हिस्से टूटते रहते हैं. यह उनके जीवन का हिस्सा है.

बोट के दो क्रू सदस्य लंबे जाल लेकर आगे आए. उन्होंने समुद्र में तैरते हुए बर्फ के बड़े टुकड़े निकाले. फिर वे उन्हें यात्रियों के हाथ में देने लगे. कुछ ही क्षण बाद मेरे हाथ में भी एक बर्फ का बड़ा टुकड़ा था.

वह साधारण बर्फ नहीं थी. उसकी पारदर्शिता अलग थी. उसका रंग अलग था. उसे हाथ में पकड़ते ही मेरे भीतर एक अलग अनुभूति हुई. ऐसा लगा जैसे मैं बर्फ नहीं, समय को छू रही हूं. मैं अचानक लाखों साल पीछे चली गई हूं. जैसे पृथ्वी पर फिर से हिमयुग उतर आया हो. जैसे समय की चाल रुक गई हो. और फिर लगा, जैसे मैं इस दुनिया में खड़ी होकर किसी दूसरी दुनिया का सपना देख रही हूं या शायद किसी दूसरी दुनिया में खड़ी होकर इस दुनिया का.

कुछ क्षणों के लिए सचमुच समझ नहीं आया कि वास्तविक क्या है और स्वप्न क्या. इतना रोमानियत से भरा, इतना अविश्वसनीय और इतना शांत अनुभव मैंने पहले कभी नहीं जिया था.

ग्लेशियर के टूटे टुकड़े के साथ सुषमा गुप्ता

कप्तान हमें ग्लेशियर के बारे में लगातार जानकारी भी दे रहे थे. उन्होंने बताया कि एयालिक ग्लेशियर हार्डिंग आइसफ़ील्ड से निकलने वाला एक सक्रिय टाइडवॉटर ग्लेशियर है, जिसकी बर्फ की यात्रा अंतिम हिमयुग से जुड़ी है. लगभग तेईस हजार वर्ष पहले, जब पृथ्वी का एक बड़ा भाग बर्फ की मोटी चादरों से ढका हुआ था, उसी काल में इस विशाल हिमक्षेत्र का निर्माण आरम्भ हुआ. आज भी एयालिक ग्लेशियर उसी प्राचीन आइसफील्ड से निरंतर नया हिम प्राप्त करता है. अर्थात् इसकी जड़ें तो हजारों वर्ष पुराने हिमयुग में हैं पर इसकी बर्फ स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर बहती, टूटती और नई बनती रहती है.

इस ग्लेशियर की सबसे अद्भुत विशेषता यह है कि इसका अंतिम सिरा सीधे समुद्र में उतरता है. समय-समय पर इसकी बर्फ की विशाल दीवारों से हिमखंड टूटकर समुद्र में गिरते हैं. यह दृश्य जितना मोहक होता है, उतना ही विस्मयकारी भी. पहले एक गहरी दरार उभरती है, फिर मानो पूरा पहाड़ कांपता है और अगले ही क्षण कई मंजिला इमारत जितना बड़ा बर्फ का खंड गर्जना के साथ समुद्र में समा जाता है. उसकी गूंज देर तक पहाड़ों और पानी के बीच प्रतिध्वनित होती रहती है.

अंतिम हिमयुग में बना यह विशाल हिमक्षेत्र आज भी केनाई प्रायद्वीप के अनेक ग्लेशियरों को जन्म देता है यानी जिस बर्फ को मैं छू रही थी, वह तब भी अस्तित्व में रही होगी जब मनुष्य की आज की सभ्यता की कल्पना भी नहीं की गई थी. हमारे कप्तान ने ग्लेशियर के नीले रंग का रहस्य भी समझाया. उन्होंने कहा, “ध्यान से देखिए, नई बर्फ सफेद है लेकिन पुरानी बर्फ गहरे नीले रंग की दिखाई दे रही है.”

कारण बड़ा रोचक था. सदियों तक लगातार दबाव पड़ने से ग्लेशियर की बर्फ के भीतर की हवा लगभग समाप्त हो जाती है. तब वह प्रकाश की अधिकांश किरणों को अपने भीतर सोख लेती है और नीली तरंगों को अधिक परावर्तित करती है. इसलिए जितनी पुरानी और सघन बर्फ होती है, उसका नीला रंग उतना ही गहरा दिखाई देता है.

विज्ञान की यह छोटी-सी जानकारी उस दृश्य को और भी सुंदर बना रही थी. अब मैं केवल बर्फ नहीं देख रही थी, उसकी उम्र भी पढ़ पा रही थी.

अलास्का में कैलाश का आभास

हम सब कप्तान को मंत्रमुग्ध हो सुन रहे थे कि अचानक उनकी आवाज का स्वर बदल गया. उसमें एक अनायास गंभीरता और रोमांच घुल आया, मानो वे किसी लंबे समय से छिपे रहस्य का परदा उठाने वाले हों. उन्होंने कहा, “ज़रा दाईं तरफ़ देखिए. आपके लिए एक सरप्राइज़ है.”

जब मैंने उस दिशा में देखा तो जैसे मेरे भीतर एक गहरी सिहरन दौड़ गई. दूर एक दूसरे पहाड़ की काली चट्टानों के बीच से एक गहरे नीले रंग की हिमधारा नीचे उतर रही थी. अगले ही क्षण मेरा पूरा शरीर मानो जड़ हो गया. सामने से उतरती वह विराट हिमधारा, उसका अलौकिक नीला रंग और उसके भीतर समाया अनंत मौन.

चट्टानों के बीच से उतरती नीली हिमधारा

एक पल में मेरे सामने का दृश्य बदल गया. सामने पानी की गहरी नीली धारा जैसा एक और ग्लेशियर था. पर मेरे लिए वह केवल एक ग्लेशियर नहीं था. मुझे लगा, मानो मैं स्वयं कैलाश के सम्मुख खड़ी हूं. ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उस हिमशिखर पर त्रिशूल धारण किए, अपार गौरव के साथ स्वयं भगवान शिव खड़े हैं.

उस क्षण मेरे भीतर क्या घट रहा था, उसे शब्दों में बांधना संभव नहीं. एक हल्की-सी थरथराहट पूरे अस्तित्व में फैल गई थी. बाहर से मैं बिल्कुल निश्चल खड़ी थी पर भीतर जैसे भावनाओं का अथाह ज्वार उमड़ रहा था. वह अनुभव न आंखों का था, न बुद्धि का, वह केवल अनुभूति का था.

वहां उपस्थित अन्य लोगों के लिए वह शायद एक अद्भुत प्राकृतिक दृश्य रहा होगा. वे विदेशी पर्यटक थे, उनकी अपनी संवेदनाएं और अपने अर्थ रहे होंगे लेकिन मेरे लिए वह क्षण अलौकिक था. मुझे लगा, जैसे मेरे इष्ट ने उस अनजानी धरती पर, उस अनपेक्षित क्षण में, मुझे अपने होने का आभास दे दिया हो.

तभी कप्तान की आवाज फिर गूंजी, “तूफ़ान तेज हो रहा है, कृपया सभी यात्री तुरंत भीतर आ जाएं.”

समुद्र में, विशेषकर बर्फीले पहाड़ों के बीच, मौसम पल भर में विकराल हो उठता है, और वही होने लगा था. तेज हवा और बारिश के बीच सभी लोग जल्दी-जल्दी डेक छोड़कर भीतर चले गए. लेकिन मेरे पैर जैसे वहीं जम गए थे. मैं चाहकर भी हिल नहीं पा रही थी.

कुछ क्षण बाद क्रू का एक सदस्य मेरे पास आया. उसने मेरा हाथ पकड़ा और लगभग खींचते हुए मुझे भीतर ले गया. वो माइक था, क्रू मेंबर, जो टेक्सास से आया था समर जॉब के लिए. जो इस बोट यात्रा के कुछ ही घंटों में मेरा अच्छा मित्र बन गया था. मुझे खींच के ले जाते हुए वो अपनी धाराप्रवाह अंग्रेजी में वहां खड़े रहने के खतरे गिना रहा था. तब लगा जैसे किसी गहरी तंद्रा से मेरी चेतना लौटी हो. मेरे हाथ-पांव अब भी पूरी तरह साथ नहीं दे रहे थे.

बोट अब ग्लेशियर से दूर, वापसी की दिशा में मुड़ चुकी थी पर लौट तो केवल नाव रही थी. मेरा एक हिस्सा अब भी वहीं, उस नीली हिमधारा के सामने, कैलाश के उस दिव्य आभास में स्थिर खड़ा रह गया था. उस समय अपने भीतर होती सिहरन से मेरी आंखें छलछला रही थीं.

नाव धीरे-धीरे ग्लेशियर से दूर जा रही थी. समुद्र अब पहले की तुलना में कुछ खुला था. बारिश लगातार हो रही थी लेकिन अब उसकी आदत-सी हो गई थी.

तभी एक बार फिर कप्तान की बेहद उत्साही आवाज गूंजी, “सब लोग दाईं ओर देखिए. वहां हंपबैक व्हेल हो सकती हैं.”

एक पल में सबकी आंखें उसी दिशा में मुड़ गईं.

हंपबैक व्हेल की लंबाई लगभग 40-52 फीट तक हो सकती है

पहले तो कुछ दिखाई नहीं दिया. केवल पानी की सतह पर बड़ी संख्या में पक्षी मंडरा रहे थे. उनमें सबसे ज्यादा पफिन थे, छोटे-से समुद्री पक्षी, जो जितने सुंदर दिखते हैं, उतने ही कुशल गोताखोर भी हैं. क्रू गाइड ने बताया कि पक्षियों का इस तरह एक जगह इकट्ठा होना अक्सर इस बात का संकेत होता है कि नीचे समुद्र में मछलियों का बड़ा झुंड है. और जहां इतनी मछलियां हों, वहां हंपबैक व्हेल भी हो सकती हैं.

फिर उन्होंने हमें एक रोचक बात बताई.

हंपबैक व्हेल अकेले शिकार नहीं करतीं. कई बार वे मिलकर काम करती हैं. पहले वे मछलियों के झुंड को चारों ओर से घेरती हैं. फिर उनमें से एक नीचे जाकर बुलबुलों का एक विशाल घेरा बनाती है. मछलियां उस बुलबुले की दीवार को पार नहीं कर पातीं और एक छोटे-से घेरे में सिमट जाती हैं. अगले ही क्षण सभी व्हेल एक साथ नीचे से ऊपर की ओर आती हैं और अपना विशाल मुंह खोलकर उन मछलियों को निगल लेती हैं. इसे बबल-नेट फीडिंग कहा जाता है.

और तभी समुद्र अचानक बदल गया. पहले एक जगह पानी में हलचल हुई. फिर सतह पर बुलबुले दिखाई दिए. अगले ही पल समुद्र जैसे भीतर से फट गया. चार विशाल हंपबैक व्हेल एक साथ पानी की सतह पर उभरीं. उनके खुले हुए मुंह, पानी का फव्वारा और फिर उसी तेजी से वापस समुद्र में समा जाना, सब कुछ कुछ ही सेकंड में हुआ.

मैं उस क्षण को आज भी ठीक से लिख नहीं पा रही. तस्वीरों में व्हेल बहुत बड़ी लगती हैं. डॉक्यूमेंट्री में भी. लेकिन जब वे आपके सामने हों, तब पता चलता है कि तस्वीरें उनके आकार के साथ कितना अन्याय करती हैं.

गाइड ने यह भी बताया कि हंपबैक व्हेल समुद्र के सबसे विशाल जीवों में से एक है. एक वयस्क हंपबैक व्हेल की लंबाई लगभग 40–52 फीट तक और वजन 25 से 40 टन तक हो सकता है. उसके ये आंकड़े सुनकर ही विस्मय होता है और जब वही विराट जीव अपनी पूरी काया के साथ समुद्र की सतह पर उभरता है, तो उसकी भव्यता शब्दों से परे लगती है.

उसकी विशाल देह को अपनी आंखों के सामने देखकर हम सभी कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गए. वे इतनी विशाल थीं कि पहली प्रतिक्रिया खुशी नहीं थी. डर था. सचमुच का डर. बार-बार मन में एक ही बात आ रही थी. अगर इसने बोट को टक्कर मार दी तो? अगर यह पलट गई तो? अगर इसे हमारी मौजूदगी पसंद नहीं आई तो?

कप्तान ने इंजन लगभग बंद कर दिया. उन्होंने बताया कि नियम के अनुसार बोट को समुद्री जीवों से सौ गज की दूरी रखनी होती है लेकिन अगर व्हेल खुद हमारे पास आ जाए तो वह उसका निर्णय है. पर वह दिन, वह पल अलग था. उस दिन शायद उन्होंने हमें स्वीकार कर लिया था. एक व्हेल हमारी बोट के बिल्कुल बगल से निकली. फिर दूसरी. फिर तीसरी.

ऐसा लग रहा था जैसे वे हमें देख रही हों. उनके लिए हम शायद समुद्र में तैरती एक और चीज़ भर रहे होंगे. उन कुछ मिनटों में मैं भूल गई कि मेरे हाथ में कैमरा भी है. तस्वीरें बाद में भी देखी जा सकती थीं. यह क्षण दोबारा नहीं मिलने वाला था.

धीरे-धीरे समुद्र फिर शांत होने लगा. लहरों का उफान थम गया और हंपबैक व्हेल भी हमारी बोट से काफी दूर निकल गई. कुछ क्षण तक हम उसकी पीठ और कभी-कभार दिखाई देती पूँछ को क्षितिज की ओर विलीन होते देखते रहे. फिर कप्तान ने इंजन स्टार्ट किया और बोट को धीरे-धीरे वापसी के रास्ते पर मोड़ दिया. पीछे छूट रहा था समुद्र का वह अद्भुत संसार, और साथ लौट रही थीं वे स्मृतियां, जो जीवन भर हमारे भीतर जीवित रहने वाली थीं.

लौटकर न लौटता मन

प्रकृति ने अभी अपने सारे आश्चर्य हमारे सामने खोले नहीं थे. लगभग आधे घंटे बाद समुद्र के बीचों-बीच स्थित एक छोटे-से चट्टानी द्वीप पर असंख्य सी लायन पसरे हुए दिखाई दिए. कोई बस लेटा था, कोई ऊंची आवाज में गर्जना कर रहा था, तो कोई धीरे-धीरे पानी में उतर रहा था. ऐसा लगता था मानो उस निर्जन चट्टानी टापू पर उनका अपना ही एक संसार बसता हो, जहां मनुष्य केवल कुछ क्षणों का अतिथि था.

समुद्र किनारे चट्टानों पर सी लायन

समुद्र का यह संसार लगातार बदलता जा रहा था. वापसी के रास्ते में कई छोटे-छोटे द्वीप दिखाई दिए. अधिकांश पर केवल स्प्रूस और एल्डर के पेड़ थे लेकिन एक और विचित्र दृश्य अभी बाकी था. दूर एक द्वीप पर पेड़ों का पूरा जंगल खड़ा था लेकिन बिना पत्तों के. तने थे. शाखाएं थीं पर जीवन नहीं था.

कप्तान ने उसे घोस्ट फ़ॉरेस्ट कहा. उन्होंने बताया, 1964 में आए भीषण भूकंप और उसके बाद की सुनामी ने इस इलाके की जमीन को कई जगह नीचे धंसा दिया था. समुद्र का खारा पानी पेड़ों की जड़ों तक पहुंच गया. पेड़ धीरे-धीरे मर गए लेकिन गिरे नहीं. आज भी वे उसी तरह खड़े हैं, जैसे समय ने उन्हें उस त्रासदी का मौन साक्षी बनाकर छोड़ दिया हो.

इन अद्भुत नजारों से गुजरते हुए, शाम तक हम सीवार्ड लौट आए.

गर्मियों में यह छोटा-सा शहर दुनिया भर के मछुआरों से भरा हुआ था. दुकानों में हर तरफ फिशिंग गियर, नावों के उपकरण और अलास्का की प्रसिद्ध सॉकी (रेड) सैल्मन की चर्चा थी. जून और जुलाई यहां केवल मौसम नहीं, समुद्र का उत्सव होते हैं.

उस रात होटल लौटकर जब दिन भर की तस्वीरें देख रही थी तो महसूस हुआ कि सबसे सुंदर दृश्य तो कैमरे में आए ही नहीं. जैसे चार हंपबैक व्हेलों का एक साथ समुद्र से उभरना, कुछ क्षण के लिए पूरी जलराशि का जीवित हो उठना और फिर उसी गहराई में विलीन हो जाना, जहां से वे आई थीं.

जैसे परदेस के उस हिम पर्वत पर मेरे आराध्य शिव का दिखाई देना.

हम अक्सर यात्राएं इसलिए करते हैं कि दुनिया को थोड़ा और देख सकें लेकिन कुछ यात्राएं ऐसी होती हैं, जहां दुनिया से ज्यादा हम खुद को देख लेते हैं. मेरे लिए अलास्का ऐसी ही यात्रा थी. आज, इतनी दूर लौट आने के बाद भी, कभी-कभी आँखें बंद करती हूँ तो लगता है, मैं अब भी उसी खुले डेक पर खड़ी हूं. बारिश अब भी हो रही है. समुद्र अब भी साँस ले रहा है.

और कहीं बहुत दूर... एक हंपबैक व्हेल फिर से पानी की सतह तोड़कर ऊपर आ रही है.

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