
सुमन पाण्डेय
97 वर्ष की आयु में जापानी कलाकार यायोई कुसामा का देहावसान केवल एक कलाकार के जीवन का अंत नहीं बल्कि समकालीन कला के एक ऐसे अध्याय का विराम है, जिसकी दृश्य-भाषा ने विश्वभर के दर्शकों की कल्पना को गहराई से प्रभावित किया. लगभग सात दशकों तक सक्रिय रहीं कुसामा ने चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापनाकला, प्रदर्शन-कला और दर्पण-आधारित अनुभवात्मक कलाकृतियों के माध्यम से कला की पारंपरिक सीमाओं को लगातार चुनौती दी.
उन्होंने बिंदु, जाल, दर्पण, कद्दू और पुनरावृत्ति जैसे अत्यंत सरल दिखाई देने वाले दृश्य तत्वों को ऐसी वैचारिक शक्ति प्रदान की कि वे उनकी कला में अस्तित्व, स्मृति, शरीर, पहचान और अनंत के प्रश्नों के प्रतीक बन गए.
कुसामा को आज उनकी चमकीली बिंदुओं वाली सतहों, पीले कद्दुओं और अनंत दर्पण-कक्षों के कारण दुनिया भर में पहचाना जाता है लेकिन उनकी कला को केवल उसके बाहरी आकर्षण से समझना उनके सृजनात्मक संसार को बहुत छोटा कर देना होगा. उनके रंगों के पीछे बेचैनी है, उनकी पुनरावृत्ति के पीछे एकाग्रता है, उनके दर्पणों के पीछे आत्म की खोज है और उनके अनंत के पीछे स्वयं को व्यापक अस्तित्व में विलीन कर देने की आकांक्षा है.
कुसामा की कला-यात्रा को उनकी कुछ महत्वपूर्ण कृतियों के माध्यम से पढ़ना इसलिए विशेष रूप से रोचक है. उनकी कला में एक स्पष्ट दृश्य और वैचारिक क्रम दिखाई देता है व्यक्ति से पुनरावृत्ति, पुनरावृत्ति से शरीर, शरीर से आत्म-विलयन और आत्म-विलयन से अनंत तक. बाद के वर्षों में यही दृश्य-भाषा संग्रहालयों से निकलकर वैश्विक लोकप्रिय संस्कृति और डिजिटल संसार का हिस्सा बन गई.
व्यक्ति से पुनरावृत्ति तक
कुसामा की आरंभिक कृतियों में ही बिंदु और पुनरावृत्ति के बीज दिखाई देने लगते हैं. Accumulation (1952) में असंख्य काले बिंदु एक सीमित सतह पर फैलते हुए दिखाई देते हैं. एक अकेला बिंदु कितना छोटा और सीमित है, लेकिन जब वही बिंदु बार-बार दोहराया जाता है तो वह पूरी सतह को अपने भीतर समेटने लगता है. यही साधारण-सा दृश्य प्रयोग आगे चलकर कुसामा की पूरी कला-दृष्टि का आधार बनने वाला था.
यहां बिंदु केवल चित्र बनाने का साधन नहीं है. वह ‘एक’ और ‘अनेक’ के बीच संबंध स्थापित करता है. एक बिंदु की अपनी सीमा है, लेकिन अनगिनत बिंदु मिलकर उस सीमा को चुनौती देने लगते हैं. कुसामा के लिए यही पुनरावृत्ति धीरे-धीरे आत्म और संसार के बीच की दूरी को कम करने वाली प्रक्रिया बन जाती है.
1958 में जापान से न्यूयॉर्क पहुंचना उनकी कला-यात्रा का निर्णायक मोड़ था. उस समय न्यूयॉर्क युद्धोत्तर आधुनिक कला का प्रमुख केंद्र था और अमूर्त अभिव्यंजनावाद का प्रभाव व्यापक था. इसके विपरीत कुसामा ने अपनी अलग दृश्य-भाषा विकसित की. 1959 की Infinity Net (1959) में अत्यंत सूक्ष्म और लगातार दोहराई गई वक्र रेखाएं विशाल कैनवास को ढक लेती हैं. यहां कोई एक केंद्रीय आकृति नहीं है, न कोई स्पष्ट आरंभ और न कोई अंत. देखने वाले की दृष्टि जाल में प्रवेश करती है और लगातार उसके भीतर आगे बढ़ती रहती है.

इस प्रकार पुनरावृत्ति उनके लिए केवल सजावटी दोहराव नहीं रही. वह एक मानसिक, अस्तित्वगत और कलात्मक प्रक्रिया में बदल गई. एक रूप का लगातार दोहराया जाना मानो सीमित को असीमित में बदलने का प्रयास था. आकृति और पृष्ठभूमि के बीच की सीमा धीरे-धीरे समाप्त होती गई और ‘एक’ तथा ‘अनेक’ के बीच का अंतर धुंधला पड़ने लगा.
पुनरावृत्ति से शरीर तक
कुसामा की कला में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव शरीर है. 1960 के दशक में उनके कार्यों में पुनरावृत्ति धीरे-धीरे कैनवास से निकलकर वास्तविक वस्तुओं और शरीर के अनुभव से जुड़ने लगती है. Accumulation No. 1 (1962) में उन्होंने एक साधारण घरेलू कुर्सी को असंख्य उभरे हुए मुलायम रूपों से ढक दिया. परिचित घरेलू वस्तु अचानक शरीर और कामना से जुड़ी एक असहज आकृति में बदल जाती है. यह कृति देखने में विचित्र लग सकती है, लेकिन इसकी वैचारिक शक्ति इसी विचित्रता में छिपी है.
एक उपयोगी और परिचित वस्तु को लगातार दोहराए गए जैविक रूपों से ढककर कुसामा वस्तु और शरीर, उपयोगिता और कामना, आकर्षण और असुविधा के बीच की सीमाओं को चुनौती देती हैं. यहां पुनरावृत्ति केवल रूप का विस्तार नहीं करती; वह शरीर, लैंगिकता और स्त्री-अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों को भी सामने लाती है.
कुसामा के लिए शरीर केवल देखने की वस्तु नहीं है. वह अनुभव का स्थल है, जहां इच्छा, भय, स्मृति, सामाजिक दृष्टि और पहचान एक साथ उपस्थित होते हैं. इस अर्थ में उनकी कला को केवल ‘सुंदर’ या ‘असामान्य’ कह देना उसके भीतर छिपे स्त्रीवादी और अस्तित्वगत प्रश्नों को अनदेखा करना होगा.
शरीर से आत्म-विलयन तक
यहीं से कुसामा की कला में आत्म-विलयन का विचार अधिक स्पष्ट होने लगता है. आत्म-विलयन का अर्थ यहां स्वयं को समाप्त करना नहीं बल्कि अपनी अलग और सीमित पहचान की सीमा को व्यापक परिवेश में विलीन कर देना है. जब बिंदु किसी वस्तु की पूरी सतह पर फैल जाते हैं, जब एक रूप सैकड़ों रूपों में बदल जाता है या जब एक ही आकृति लगातार दोहराई जाती है, तब मूल वस्तु की स्वतंत्र पहचान धीरे-धीरे पीछे हटने लगती है.
व्यक्ति और परिवेश के बीच की सीमा अस्थिर हो जाती है. कुसामा की कला में यही प्रक्रिया एक व्यक्तिगत अनुभव से आगे बढ़कर एक सार्वभौमिक प्रश्न बन जाती है मनुष्य वास्तव में कितना अलग है और कितना उस विशाल संसार का हिस्सा है जिसमें वह अस्तित्वमान है?
आत्म-विलयन से अनंत तक
इस विचार को उनकी Infinity Mirror Room Phalli’s Field (1965) में सबसे प्रभावशाली रूप मिलता है. यहां दर्शक किसी चित्र के सामने खड़ा नहीं रहता; वह स्वयं कलाकृति के भीतर प्रवेश करता है. दर्पण और अनगिनत प्रतिबिंब एक सीमित कमरे को असंख्य रूपों में विभाजित कर देते हैं. दर्शक स्वयं को एक बार नहीं, अनेक बार देखता है. उसका शरीर अपनी एक निश्चित सीमा खोकर प्रतिबिंबों की अनंत श्रृंखला का हिस्सा बन जाता है.
यहां कला केवल देखने की वस्तु नहीं रहती, एक अनुभव बन जाती है. यही कुसामा की स्थापना कला की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है. पारंपरिक चित्रकला में दर्शक और कलाकृति के बीच एक दूरी होती है, जबकि दर्पण-कक्षों में वह दूरी समाप्त हो जाती है. दर्शक स्वयं कलाकृति का हिस्सा बन जाता है.
बाद के दर्पण-कक्षों में यह अनुभव और अधिक जटिल होता गया. Infinity Mirrored Room, The Souls of Millions of Light Years Away (2013) और All the Eternal Love I Have for the Pumpkins (2016) जैसी कृतियों में प्रकाश, दर्पण, रंग और प्रतिबिंब मिलकर ऐसा संसार बनाते हैं, जिसमें दर्शक स्वयं को एक सीमित व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि अनंत दृश्य-अनुभव के एक अंश के रूप में अनुभव करता है. यहां ‘अनंत’ वास्तव में अनंत स्थान नहीं है.
एक सीमित कमरे में दर्पण सीमित स्थान को असंख्य बार प्रतिबिंबित करके अनंत का अनुभव उत्पन्न करते हैं. यही कुसामा की कलात्मक बुद्धिमत्ता है वे वास्तविक अनंत का निर्माण नहीं करतीं; वे सीमित के भीतर अनंत को अनुभव करने की संभावना पैदा करती हैं.
अनंत से वैश्विक लोकप्रियता तक
कुसामा की कला-यात्रा का सबसे रोचक विरोधाभास यह है कि जिस कलाकार ने कभी कला-जगत की स्थापित सीमाओं को चुनौती दी थी, वही आगे चलकर वैश्विक दृश्य-संस्कृति की सबसे पहचानी जाने वाली कलाकारों में शामिल हो गईं. उनके बिंदु, कद्दू और दर्पण-कक्ष अब केवल संग्रहालयों और कला-दीर्घाओं तक सीमित नहीं हैं. वे फैशन, विज्ञापन, वस्तु-संस्कृति और सामाजिक माध्यमों की दृश्य-भाषा का हिस्सा बन चुके हैं.
कुसामा ने स्वयं भी कला और व्यावसायिक संस्कृति के बीच संबंधों के साथ प्रयोग किए थे. इसलिए उनकी वर्तमान लोकप्रियता को केवल बाजार द्वारा उनकी कला पर थोपी गई घटना मानना भी पूरी तरह उचित नहीं होगा. लेकिन आज उनकी कला के सामने एक नया प्रश्न है. दर्पण-कक्ष में प्रवेश करने वाला दर्शक कलाकृति का अनुभव करने के साथ-साथ अक्सर उसकी तस्वीर भी लेता है.
कला का अनुभव और उसका डिजिटल प्रदर्शन एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं. ऐसे में प्रश्न उठता है क्या हम कुसामा की कला को अनुभव कर रहे हैं या केवल उसकी छवि को अपने डिजिटल संसार में संग्रहित कर रहे हैं?
एक ओर, उनकी लोकप्रियता ने समकालीन कला को व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाया है. वे लोग भी संग्रहालयों और कला-प्रदर्शनियों तक पहुंचे हैं, जो शायद पहले समकालीन कला से दूर थे. इस अर्थ में उनकी कला का प्रसार एक प्रकार का लोकतंत्रीकरण भी है. दूसरी ओर, उनकी कला की गहरी अस्तित्वगत बेचैनी, आत्म-विलयन और अनंत की खोज कभी-कभी चमकीले रंगों, आकर्षक दर्पणों और सामाजिक माध्यमों पर साझा की जाने वाली तस्वीरों के पीछे छिप जाती है.
जो बिंदु कभी आत्म और संसार के संबंध का प्रश्न था, वह अब एक लोकप्रिय सजावटी प्रतिरूप भी बन सकता है. यहीं कुसामा की विरासत का सबसे रोचक विरोधाभास सामने आता है. उन्होंने एक अत्यंत सरल दृश्य तत्व बिंदु को लेकर उससे एक ऐसा दृश्य-ब्रह्मांड रचा, जिसमें व्यक्ति, शरीर, स्मृति, प्रकृति, पहचान और अनंत एक-दूसरे में समाहित होते जाते हैं.
आज वही बिंदु वैश्विक दृश्य-संस्कृति का हिस्सा है. इसलिए कुसामा की कला-यात्रा को केवल एक कलाकार की शैलीगत यात्रा नहीं कहा जा सकता. यह व्यक्ति से पुनरावृत्ति, पुनरावृत्ति से शरीर, शरीर से आत्म-विलयन, आत्म-विलयन से अनंत और अनंत से वैश्विक दृश्य-संस्कृति तक की यात्रा है.
कुसामा ने एक बिंदु को अनगिनत बार दोहराया और उसे इतना फैलाया कि अंततः वह स्वयं एक दृश्य-ब्रह्मांड बन गया. शायद उनकी कला की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह हमें एक साथ दो बातें सोचने के लिए बाध्य करती है कि हम कौन हैं और हम कितने बड़े संसार का हिस्सा हैं और शायद इसी अर्थ में एक बिंदु कभी समाप्त नहीं होता. वह फैलता रहता है, दोहराता रहता है और धीरे-धीरे अपनी सीमा खोकर अनंत हो जाता है.

