- राजेश गनोदवाले
पंडवानी के रूप में गायन और अभिनय से दुनिया को एकल अंदाज में मंत्रमुग्ध करने वाला नाम था तीजन बाई का. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के गनियारी निवासी इस कलाकार ने 5 जुलाई को जीवन का अंतिम अध्याय खत्म कर विदा ली और पीछे छोड़ गईं वह शानदार विरासत जिसे अपने बूते ही बनाया था.
लंबी बीमारी के चलते एक कमरे में सिमटे संसार के कुछ वर्ष खासे कष्टप्रद रहे. व्याधियों ने घेर लिया था. दो माह पहले रायपुर एम्स में दाखिल हुईं थीं. छत्तीसगढ़ से बरास्ता महाभारत बाहर आई यह अकेली ऐसी आवाज थी जिसने मात्र तेरह वर्ष की उम्र में समाज को बताया कि वो एक नई विधा का स्वप्न बुन चुकी है. बाद में उन्होंने पंडवानी का कैसा जाजम बिछाया इसकी साक्षी दुनिया बनी.
बोल बिंदाबन बिहारी लाल की जय—इस उद्घोष के साथ जब वे प्रवेश करतीं तो अगले तीस मिनट तक वह मंच महाभारत कालीन पात्रों की लीलाभूमि में बदल जाता. तीजन बाई ने पंडवानी गाई ही नहीं, उसे नई जिंदगी भी दी. उनके पहले एक नाम झाड़ूराम देवांगन का हुआ जो 'कथ्य' और 'फॉर्म' में तीजनबाई से कहीं बीस थे. पर दोनों की प्रस्तुतियों में बुनियादी फर्क शैलीगत रहा.
झाड़ूराम गाते हुए सर्वांग रचते थे. जिसमें अभिनय केवल स्वरों का सहारा लेता था, जबकि तीजनबाई की पंडवानी आवाज और दैहिक भंगिमाओं का बढ़िया मेल थी. उनकी विश्व स्वीकृति के अनेक बुनियादी कारण थे: बुलंद आवाज, बलिष्ठ काया और तीसरे अकेले होते हुए भी मंच को अपनी प्रतिभा से इस तरह भरना कि आभास होता था जैसे अनेक पात्र संवादों का घटाटोप बुन रहे हों!
तीजन बाई का सम्मोहन मंच पर तो तिलस्म बिखेरता ही था, उनके साथ मिलना, बैठना और बात करना भी यादगार होता था. सन् 2004 में छत्तीसगढ़ ने पहली बार उन्हें पंडवानी की दूसरी पीढ़ी की खोज-खबर करने का न्योता दिया तब छत्तीसगढ़ी बोली से अनजान करीब 25 युवाओं को उन्होंने पांच रोज तक इसके गुर दिए. उनके अंदर 'निर्माण' की भी गहरी क्षमता है तब यह राज बाहर आया था. बाद में देश के अनेक भागों से उन्हें पंडवानी सिखाने के मकसद से बुलावे आए.
पाकिस्तान की लोक आवाज रेशमा की तरह तीजन के परिजन भी भटकाऊ प्रवृत्ति के थे. खानाबदोश, आज यहां तो कल वहां. उनका वंश पारधी समाज से था. छत्तीसगढ़ में देवार समुदाय अपनी कलात्मकता रुचियों के लिए तो लोकप्रिय रहा, लेकिन पारधी समाज की आबोहवा में गीत-संगीत का उदाहरण आधिकारिक रूप से नहीं रहा. हालांकि परधान और देवारों समेत आंशिक रूप से पारधी समाज में जो वंशानुगत 'कथा गायन' था उसे पंडवानी के जैविक रूप की तरह मान सकते हैं.
घुमंतू जीवन के दौरान डेरे में ही नाना से कुछ कथाएं उन्हें बालपन में सुनने मिलीं जो उन्हें कंठस्थ थीं. तीजन के पारधी समुदाय की एक पहचान कभी निडरता और जीवटता भी रही. गेय ढंग से कथाएं सुनाने वाला डेरे का यह गुण तीजन बाई की रचनात्मक ताकत था जिसे धीरे धीरे उन्होंने एक मुकम्मल पंडवानी में बदल दिया.
आज तीजन का नाम स्टार कलाकारों की फेहरिस्त में भले हो लेकिन बचपना दंश सहते बीता था. लैंगिक रूढ़ियों ने चौतरफा राह रोकी, लेकिन साहस असाधारण था. मौका देखते ही वे तंबूरा उठा कर निकल पड़तीं. कैसा भी मंच हो: गांव की चौपाल, मुंबई का पृथ्वी थिएटर या फिर भारत महोत्सव दिखाते विदेशी मंच. कुशल संगतकार और प्रतिभाशाली 'रागी' उनके लिए 'तानपूरा' बन जाते थे जिनकी सुरीली संगति में वे अपना तिलस्म बिखेर देती थीं. एक क्षण में भीम का आकार-प्रकार उकेर देना और अगले ही पल द्रौपदी की करुण पुकार.
योद्धाओं, ऋषियों और देवताओं का रूप धरकर अपनी आवाज से ऐसा आरोह-अवरोह सजातीं मानो सदियों की स्मृतियां उनके कंठ से बह रही हों. यह भी सच है कि महाभारत की पारंपरिक कथाएं उनकी अपनी मौलिक जोड़जाड़ से मानो अधिक तरल बन जाती थीं. देश के तीनों सर्वोच्च नागरिक अलंकरण पाने वाली वे विरल लोक कलाकार थीं.
हबीब तनवीर की पारखी दृष्टि ने एक समय नया थिएटर के साथ भी उन्हें जोड़ा लेकिन वहां वे टिक न सकीं. सिनेमा भी उन्हें रास न आया. श्याम बेनेगल ने भारत एक खोज में महाभारत की स्मृति जीवंत करने के लिए तीजन बाई की पंडवानी को ही आधार बनाते हुए उन्हें लिया था. वे एक नैसर्गिक प्रतिभा थीं जिन्हें उनके जनपद से बाहर निकालने में भोपाल के मध्य प्रदेश आदिवासी लोककला परिषद् की बुनियादी भूमिका थी. पंडवानी की दो शैलियों के दो शीर्ष साधक झाड़ूराम देवांगन के बाद तीजन बाई का अवसान गहरा खालीपन बनेगा. तीजन का अंश अनेक कलाकारों ने अपनाने की कोशिश की है पर वह संघर्ष, वह आग और महाभारत को कहने वाला निश्छल मन कितनों के पास होगा. तीजन जैसा दूजा नहीं.

