LAC पर तनाव से लेकर बढ़ते तकनीकी और ट्रेड वॉर तक, एशिया का रणनीतिक संतुलन पहले से ही भारी दबाव में है. ऐसे में चीन की अर्थव्यवस्था की सेहत भारत के लिए एक सीधा असर डालने वाला मसला बन गई है.
यह सब तब हो रहा है जब नई दिल्ली और बीजिंग 2020 की गलवान झड़प और लद्दाख में सीमा विवाद के बाद से बुरी तरह पटरी से उतरे अपने द्विपक्षीय रिश्तों को वापस लाइन पर लाने की कोशिश कर रहे हैं.
दशकों तक, बीजिंग के आर्थिक उभार ने उसके सैन्य आधुनिकीकरण, कूटनीतिक पहुंच और ग्लोबल सप्लाई-चेन पर उसके दबदबे को ताकत दी. लेकिन जैसे ही चीन ने 2026 में कदम रखा, आंकड़े कहीं ज्यादा उलझी हुई कहानी बयां कर रहे हैं. लगातार ग्रोथ के दिखावे के पीछे एक ऐसी अर्थव्यवस्था छिपी है जो कमजोर घरेलू मांग, चरमराते प्रॉपर्टी सेक्टर, डिफ्लेशन यानी लगातार गिरती कीमतों के दबाव और बढ़ते ग्लोबल ट्रेड विवादों से जूझ रही है. भारत के लिए, जो अब मैन्युफैक्चरिंग, इन्वेस्टमेंट और रणनीतिक प्रभाव के लिए चीन से मुकाबला कर रहा है, ये आर्थिक बदलाव एशिया के जियो-पॉलिटिकल परिदृश्य को पूरी तरह से बदल सकते हैं.
आधिकारिक तौर पर, चीन की अर्थव्यवस्था स्थिर दिखती है. चीन के 'नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स' के जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में देश की GDP पांच प्रतिशत की दर से बढ़ी, जो बीजिंग के सालाना लक्ष्य से बिल्कुल मेल खाती है. ऊपरी तौर पर देखने पर, यह आंकड़ा ग्लोबल चुनौतियों के बावजूद चीन के टिके रहने की कहानी कहता है. फिर भी, इस ग्रोथ का स्ट्रक्चर एक बहुत गहरे असंतुलन को उजागर करता है. यह ग्रोथ घरेलू खपत, वह पिलर जिसे चीन लंबे समय से मजबूत करने का वादा करता रहा है, के दम पर नहीं, बल्कि भारी एक्सपोर्ट के दम पर हासिल की गई है.
जानकारों का दावा है कि 2025 में चीन का 'ट्रेड सरप्लस' 20 प्रतिशत बढ़कर 1.19 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, और कुल आर्थिक ग्रोथ में अकेले एक्सपोर्ट की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई रही. 1997 के बाद से बाहरी मांग का यह सबसे बड़ा योगदान है. चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए विदेशी बाजारों पर इस तरह की निर्भरता बहुत अजीब है और यह घर के भीतर की लगातार कमजोरी को दिखाती है. एक 'बैलेंस्ड रिकवरी' के बजाय, यह डेटा एक ऐसे आर्थिक सिस्टम की तरफ इशारा करता है जो कमजोर घरेलू खपत और इन्वेस्टमेंट की भरपाई के लिए ग्लोबल डिमांड पर बहुत ज्यादा झुका हुआ है.
स्वतंत्र आकलनों की तस्वीर और भी ज्यादा सावधान करने वाली है. चीन पर एक्सपर्टीज रखने वाले एक स्वतंत्र रिसर्च ग्रुप 'रोडियम ग्रुप' के एनालिस्ट्स का अनुमान है कि 2025 में बीजिंग की असल जीडीपी ग्रोथ शायद 2.5 से 3 प्रतिशत के बीच रही, जो आधिकारिक तौर पर बताए गए आंकड़े का लगभग आधा है. इन्वेस्टमेंट के पैटर्न भी इस आकलन को सही साबित करते हैं. साल की दूसरी छमाही में 'फिक्स्ड-एसेट इन्वेस्टमेंट' में भारी गिरावट आई, जो जुलाई और नवंबर के बीच (2024 की इसी अवधि के मुकाबले) लगभग 11 प्रतिशत कम हो गया. आधिकारिक आंकड़ों और प्राइवेट अनुमानों के बीच यह चौड़ी होती खाई चीन की आर्थिक सेहत से जुड़ी बहसों की एक बड़ी पहचान बन गई है.
स्ट्रक्चरल तनाव अगर कहीं सबसे ज्यादा साफ दिखता है, तो वह है चीन का संकटग्रस्त प्रॉपर्टी सेक्टर. कभी देश के ग्रोथ मॉडल की रीढ़ रहा रियल एस्टेट मार्केट 2021 में अपने चरम पर पहुंचने के बाद से लगातार गिर रहा है. यह मंदी अब लगातार अपने पांचवें साल में खिंच गई है, जिसने पूरे देश में अनुमानित तौर पर 80 मिलियन (8 करोड़) अनबिके या खाली पड़े घरों का अंबार लगा दिया है.
चीन पर नजर रखने वाले एक विशेषज्ञ ने बताया कि कंस्ट्रक्शन का काम लगभग ठप पड़ गया है. नए घरों का काम अपने पीक लेवल से करीब 75 प्रतिशत नीचे चल रहा है, जबकि ओवरऑल प्रॉपर्टी इन्वेस्टमेंट लगभग आधा रह गया है. इसका असर सिर्फ हाउसिंग मार्केट तक ही सीमित नहीं है. सालों से, वहां की स्थानीय सरकारें अपनी आमदनी के मुख्य साधन के तौर पर डेवलपर्स को जमीन बेचने पर बहुत ज्यादा निर्भर थीं. जैसे-जैसे प्रॉपर्टी की मंदी गहरी हुई, उनकी आमदनी में भारी गिरावट आई. हालांकि 2025 के पहले 10 महीनों में स्थानीय सरकारों की आय में मामूली ग्रोथ लौटी, लेकिन यह बढ़ोतरी न के बराबर थी - सालाना आधार पर सिर्फ 0.2 प्रतिशत.
लोकल फाइनेंसेज पर दबाव कम करने के लिए, बीजिंग ने 2024 के आखिर में 10 ट्रिलियन युआन का एक 'डेट-स्वैप' प्रोग्राम शुरू किया. यह पहल स्थानीय सरकारों को अपनी मौजूदा देनदारियों को कम ब्याज दरों और लंबी मैच्योरिटी वाले आधिकारिक बॉन्ड्स में बदलने की इजाजत देती है. लेकिन जमा हो चुके कर्ज का पहाड़ इतना बड़ा है कि यह राहत सिर्फ कुछ पल की हो सकती है. कई नगर पालिकाओं को आने वाले कई सालों तक टाइट बजट का सामना करना पड़ सकता है, जिसने पहले ही इंफ्रास्ट्रक्चर के खर्चों में कटौती और कुछ मामलों में सोशल सर्विसेज को कम करने पर मजबूर कर दिया है. कंजूसी का यह दौर एक ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए बिल्कुल गलत समय पर आया है जिसे घरेलू खपत को बढ़ावा देने के लिए ज्यादा 'पब्लिक स्पेंडिंग' की जरूरत है.
डिफ्लेशन यानी लगातार गिरती कीमतें, चीन के आर्थिक माहौल की एक और बड़ी पहचान बनकर उभरी हैं. देश अब लगातार तीन सालों से अर्थव्यवस्था में हर तरफ कीमतों में कमजोरी का सामना कर रहा है, जो 1970 के दशक के आखिर में शुरू हुए मार्केट रिफॉर्म्स के बाद से सबसे लंबा दौर है. 'फैक्ट्री-गेट' कीमतें इस समस्या की गहराई को दिखाती हैं. जून 2025 में, प्रोड्यूसर प्राइस सालाना आधार पर 3.6 प्रतिशत गिर गए, जो लगातार नौवें महीने की गिरावट और लगभग दो सालों में सबसे बड़ी गिरावट है. कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन (महंगाई) भी सुस्त बनी हुई है, जहां 2025 में ओवरऑल कीमतें लगभग सपाट रहीं और कोर इन्फ्लेशन लगातार 1 प्रतिशत से नीचे रही.
दिसंबर 2025 के अपने आकलन में, 'इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड' (IMF) ने इन डिफ्लेशनरी दबावों को प्रॉपर्टी की लंबी मंदी, कमजोर स्थानीय सरकारी वित्त और लगातार गिरते कंज्यूमर कॉन्फिडेंस से जोड़ा है. IMF ने यह चेतावनी भी दी है कि चीन का 'करंट अकाउंट सरप्लस' जीडीपी के 3.3 प्रतिशत तक पहुंच सकता है. अगर बीजिंग इसी तरह एक्सपोर्ट के दम पर होने वाली ग्रोथ पर बहुत ज्यादा निर्भर रहता है, तो इससे उसके ट्रेडिंग पार्टनर्स के साथ राजनीतिक तनाव बढ़ने का खतरा है.
घरेलू खपत, जिसे चीन लंबे समय से मजबूत करने का वादा करता रहा है, निराशाजनक रूप से कमजोर बनी हुई है. 2025 में रिटेल सेल्स सिर्फ 3.7 प्रतिशत की दर से बढ़ी, जो इन्वेस्टमेंट और एक्सपोर्ट पर अपनी पारंपरिक निर्भरता से दूर जाने की कोशिश कर रही अर्थव्यवस्था के लिए बहुत सुस्त रफ्तार है. रोजगार की चिंताओं, सीमित पेंशन कवरेज और घरों की गिरती कीमतों के बीच चीनी परिवार अभी भी बहुत सतर्क हैं और उन्होंने अपनी 'सेविंग्स' की दर को ऊंचा रखा हुआ है.
लेबर मार्केट में भी यह बेचैनी साफ दिखती है. कैलकुलेशन से छात्रों को बाहर करने जैसे 'स्टैटिस्टिकल एडजस्टमेंट' के बावजूद, फरवरी 2025 में 16 से 24 साल के युवाओं में बेरोजगारी 16.9 प्रतिशत पर खड़ी थी. वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, कमजोर नौकरियों और प्रॉपर्टी की कीमतों में चल रहे उतार-चढ़ाव के कारण 2026 तक कंज्यूमर स्पेंडिंग सुस्त ही रहने की उम्मीद है.
डेमोग्राफिक्स यानी जनसंख्या का ढांचा, एक और भी गहरी स्ट्रक्चरल चुनौती पेश करता है. 2025 में चीन में सिर्फ 7.92 मिलियन (करीब 79 लाख) बच्चों का जन्म हुआ, जो 1949 में आधिकारिक रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से सबसे कम आंकड़ा है. दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले इस पूर्व देश की कुल आबादी अब लगातार चार सालों से घट रही है, जो एक ऐतिहासिक बदलाव है. हालांकि अधिकारियों ने बच्चे पैदा करने को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी भी शुरू की है, लेकिन इसका असर बहुत सीमित रहा है. समय के साथ, एक सिकुड़ती 'वर्कफोर्स' (कामकाजी आबादी) और तेजी से बूढ़ी होती आबादी चीन के राजकोषीय सिस्टम, खासकर उसके पेंशन ढांचे पर भारी दबाव डालेगी.
जानकारों ने इस बात की तरफ भी इशारा किया कि बाहरी मोर्चे पर, जिस माहौल ने चीन के एक्सपोर्ट बूम को बनाए रखा है, वह अब ज्यादा अनिश्चित होता जा रहा है. 2025 की शुरुआत में अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव बहुत तेजी से बढ़ा, जब अप्रैल में चीनी सामानों पर टैरिफ कुछ समय के लिए 100 प्रतिशत से ऊपर चला गया, जो बाद में आंशिक सुलह के बाद लगभग 30 प्रतिशत पर आ गया. यूरोप ने भी अपनी इंडस्ट्रीज को बचाने के लिए कदम उठाए हैं. यूरोपियन यूनियन (EU) ने 2024 में चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों पर 'एंटी-सब्सिडी ड्यूटी' लगा दी थी, जिससे कई सेक्टर्स में व्यापक व्यापार विवाद शुरू हो गए.
इन दबावों को देखते हुए, ग्लोबल संस्थाओं ने भी अपने ग्रोथ के अनुमान घटा दिए हैं. फिच रेटिंग्स को उम्मीद है कि 2026 में चीन की अर्थव्यवस्था लगभग 4.1 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी, जबकि IMF और वर्ल्ड बैंक ने लगभग 4.4-4.5 प्रतिशत के विस्तार का अनुमान लगाया है.
अनिश्चितता की इस पूरी तस्वीर में एक और परत चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की सेहत और उनके अधिकारों के इर्द-गिर्द लगातार उठ रहे सवालों की है. विदेशी चीनी मीडिया की रिपोर्ट्स ने दावा किया है कि शी जिनपिंग ने शायद 2021 में ही 'सेरेब्रल एन्यूरिज्म' का इलाज कराया था. उनका BRICS समिट से गायब रहना और अक्टूबर 2025 में APEC समिट की एक तय मीटिंग का रद्द होना, उनकी सेहत और 'चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी' के भीतर चल रही सियासी खींचतान, दोनों के बारे में अटकलों को हवा दे रहा है.
नई दिल्ली में चीन पर पैनी नजर रखने वाले एक विशेषज्ञ का मानना है कि 2027 में होने वाली '21वीं पार्टी कांग्रेस' के साथ, चीन की भविष्य की लीडरशिप को लेकर अनिश्चितता अब आर्थिक हिसाब-किताब में शामिल होने लगी है. भारत के लिए दांव बहुत बड़ा है. सुस्त पड़ता चीन ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग एक्सपोर्ट में 'कंपटीशन' को तेज कर सकता है, बीजिंग को अपने सरप्लस इंडस्ट्रियल सामान को विदेशों में डंप करने पर मजबूर कर सकता है और घरेलू मोर्चे पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में लीडरशिप को एक ज्यादा आक्रामक विदेश नीति अपनाने के लिए उकसा सकता है.
नई दिल्ली के लिए, इसके मायने आर्थिक होने के साथ-साथ रणनीतिक भी हैं. चीन की सुस्ती भारत के लिए उन सप्लाई चेन्स को अपनी तरफ खींचने के मौके खोल सकती है जो चीन से बाहर जा रही हैं, खासकर इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर्स और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे सेक्टर्स में. हालांकि, यह पूरे एशिया में व्यापारिक प्रतियोगिता और जियो-पॉलिटिकल दुश्मनी को भी तेज कर सकता है.
बीजिंग के सामने खड़ा विरोधाभास बिल्कुल साफ है: भले ही चीन अपने आधिकारिक ग्रोथ के आंकड़ों से खुद को स्थिर दिखा रहा हो, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था की नींव लगातार खोखली होती दिख रही है. जब तक लीडरशिप घरेलू खपत को मजबूत करने और इन्वेस्टर्स का भरोसा बहाल करने के लिए गहरे सुधार नहीं करती, तब तक चीन के 'हेडलाइन ग्रोथ नंबर्स' उन स्ट्रक्चरल कमजोरियों पर पर्दा डालते रहेंगे जो आने वाले सालों में एशिया के जियो-पॉलिटिकल और आर्थिक संतुलन को तय करेंगी.

