भारतीय प्रशासनिक सेवा के 2010 बैच के अधिकारी जितेंद्र कुमार सोनी के राजस्थानी में लिखी गई कहानियों के संग्रह ‘भरखमा’ को वर्ष 2025 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है. ‘भरखमा’ राजस्थानी का एक आत्मीय शब्द है, जिसका अर्थ है 'सहनशील' या 'क्षमा से भरा हुआ'.
इसी भाव को केंद्र में रखकर रचा गया यह कहानी-संग्रह तीन बड़ी और प्रभावशाली कहानियों का संकलन है. पहली कहानी ‘भरखमा’ नारी की सहनशीलता, धैर्य और आंतरिक शक्ति को अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त करती है.
वहीं दूसरी कहानी ‘गंगा दादी’ एक वृद्ध महिला के निर्मल और उदार स्वभाव को इतनी सहजता से सामने लाती है कि पाठकों को अपने गांव की किसी बुजुर्ग महिला की छवि याद आ जाती है. तीसरी कहानी ‘मोटोड़ी छांटां वाळो मेह’ (मोटी बूंदों वाली बारिश) मानवीय संवेदनाओं की धरती पर रची गई एक प्रेम कथा है, जिसमें रिश्तों की गर्माहट और जीवन की सादगी झलकती है.
जितेंद्र कुमार सोनी ने बताते हैं, “जिस मिट्टी में मैं पला-बढ़ा, जिसकी भाषा की मिठास ने मेरे कानों में मिश्री घोल दी और जिस भाषा का इतना समृद्ध इतिहास, व्याकरण, शब्दकोश व साहित्य भंडार है, उसी राजस्थानी में लिखी मेरी पुस्तक 'भरखमा' को मिला यह पुरस्कार मैं उन सभी लोगों को समर्पित करता हूं, जिनसे मैंने इस भाषा का ककहरा सीखा. राजस्थानी हमेशा व्यवहार और व्यापार की भाषा बनी रहे और दुनिया की अन्य भाषाओं की तरह इसकी प्रतिष्ठा भी दिन-दूनी, रात-चौगुनी बढ़ती रहे.’’
पत्रकार व साहित्यकार त्रिभुवन इस पुरस्कार को राजस्थानी के लिए बेहद सम्मान की बात मानते हैं. वे कहते हैं, “राजस्थानी कहानी पुस्तक ‘भरखमा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार-2025 दिया जाना केवल एक लेखक का सम्मान नहीं, बल्कि यह उस पूरी भाषिक दुनिया की पहचान है, जो बरसों से लोक, स्मृति, मिट्टी, प्रशासन, संवेदना और जनभाषा के बीच अपनी जगह बनाती रही है. यह खबर केवल एक पुरस्कार की नहीं, बल्कि राजस्थानी की प्रतिष्ठा की खबर है.’’
जितेंद्र सोनी ने प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच हमेशा समाज के कमजोर और हाशिए पर छूटे लोगों के लिए काम करने का प्रयास किया है. वर्ष 2011 में जालोर में एसडीएम के रूप में उनकी पहली नियुक्ति हुई थी. वहां उन्होंने देखा कि घुमंतू समुदायों के कई बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंच पाते, क्योंकि उनके डेरों (अस्थाई बसाहट) और स्कूलों के बीच की दूरी कई बार दशकों के फासले जितनी लंबी हो जाती है. ऐसे बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए उन्होंने ‘विद्याप्रवाहिनी’ नाम से एक मोबाइल वैन शुरू करवाई. इस वैन में कंप्यूटर, ऑडियो-वीडियो सामग्री और विभिन्न विषयों की किताबें रखी जाती थीं, जिसे झुग्गी-बस्तियों व डेरों तक ले जाकर बच्चों को पढ़ाया जाता था. यह प्रयोग प्रशासनिक संवेदनशीलता का एक उल्लेखनीय उदाहरण बन गया.
उनका सबसे चर्चित अभियान ‘चरण पादुका’ रहा है. वर्ष 2014 में जब वे जालोर के कलेक्टर बने, तो एक सरकारी स्कूल के दौरे के दौरान उन्होंने देखा कि कई बच्चे नंगे पांव या फटे जूतों में स्कूल आ रहे हैं. दिसंबर की कड़ाके की ठंड में ठिठुरते उन पैरों को देखकर वे भावुक हो उठे. उसी दिन उन्होंने कुछ जोड़ी जूते खरीदकर बच्चों को दिए और धीरे-धीरे यह पहल एक बड़े अभियान में बदल गई. देखते ही देखते हजारों लोग इस प्रयास से जुड़ गए और लगभग दो लाख बच्चों तक जूते पहुंचाए गए. बाद में सोनी की इस पहल को राज्य स्तर पर भी अपनाया गया.
समाज सेवा के क्षेत्र में सोनी का एक और उल्लेखनीय कार्य रक्तदान के क्षेत्र में रहा. वर्ष 2018 में झालावाड़ के कलेक्टर रहते हुए उन्होंने अस्पतालों में रक्त की कमी को दूर करने के लिए ‘रक्तकोष फाउंडेशन’ की स्थापना की. इसके माध्यम से राजस्थान के विभिन्न जिलों में सक्रिय रक्तदाताओं को एक मंच पर जोड़ा गया. इस फाउंडेशन के बैनर तले पिछले सात वर्षों में 550 से अधिक रक्तदान शिविर आयोजित कर लगभग 70 हजार यूनिट रक्तदान कराया गया. उल्लेखनीय है कि डॉ. सोनी स्वयं अब तक 150 से ज्यादा बार रक्तदान कर चुके हैं. इससे पहले 2015 में जालोर कलेक्टर रहते हुए उन्होंने रेयर ब्लड ग्रुप के मरीजों की सहायता के लिए ‘यूनिवर्सल डोनर’ नाम से एक व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाया था, जिसने बाद में एक बड़े नेटवर्क का रूप ले लिया.
प्रशासनिक कामकाज में तकनीक के उपयोग के लिए भी उन्हें जाना जाता है. मनरेगा (वीबी-जी-रामजी) जैसे बड़े कार्यक्रमों में हो रहे कार्यों की रियल-टाइम मॉनिटरिंग व्यवस्था विकसित करना और सोशल मीडिया के माध्यम से जनता की समस्याओं का समाधान करना उनके प्रमुख प्रयोगों में शामिल है. जालोर में उन्होंने ‘जबरो जालोर’ नाम से एक फेसबुक पेज शुरू करवाया था, जहां लोग अपनी समस्याएं सीधे प्रशासन तक पहुंचाते थे और उनका तुरंत समाधान किया जाता था.
राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के धनसार गांव में 29 नवंबर 1981 को एक किसान परिवार में जन्मे सोनी का बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता. बचपन में ही उनकी इकलौती बहन की मृत्यु हो गई थी, जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया. उनकी मां रेशमा पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन बेटे की पढ़ाई को लेकर बेहद सजग थीं. मां के लिए शिक्षा के दरवाजे कभी नहीं खुले, लेकिन उन्हें विश्वास था कि पढ़ाई से उनके बेटे का जीवन बदलेगा. यही विश्वास आगे चलकर जितेंद्र के जीवन की प्रेरणा बना.
जितेंद्र सोनी के पिता बताते रहे हैं कि बचपन में जब कभी उनके गांव में कोई कलेक्टर आता, तो वे उसकी गाड़ी के पीछे दौड़ते थे. यह देखकर उनके पिता का सपना बन गया कि एक दिन उनका बेटा भी कलेक्टर बने. समय के साथ मेहनत और लगन ने उस सपने को सच कर दिया और उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा पास कर भारतीय प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया.
प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच जब भी उन्हें समय मिलता है, वे पढ़ने और लिखने में डूब जाते हैं. ‘भरखमा’ के लिए मिला यह सम्मान उनकी पहली बड़ी साहित्यिक उपलब्धि नहीं है. इससे पहले उनके काव्य संग्रह ‘रणखार’ के लिए उन्हें वर्ष 2016 में साहित्य अकादमी का 'युवा पुरस्कार' मिल चुका है. प्रशासनिक और साहित्यिक कार्यों के अलावा दिव्यांगजनों के लिए किए गए सराहनीय कार्यों के लिए सोनी को वर्ष 2015, 2016 और 2022 में राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया. मनरेगा कार्यों की रियल-टाइम मॉनिटरिंग के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है.
भगवान अटलानी को भी मिलेगा साहित्य अकादमी पुरस्कार
राजस्थान के ही साहित्यकार भगवान अटलानी की सिंधी कहानियों पर आधारित पुस्तक 'वाघू' का चयन भी साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए हुआ है. 10 मार्च 1945 को सिंध (अब पाकिस्तान) में जन्मे भगवान अटलानी का परिवार विभाजन के बाद राजस्थान आ गया था.
वे अब तक 30 किताबें लिख चुके हैं. वर्ष 1995 में उन्हें राजस्थान अकादमी का सर्वोच्च 'मीरां पुरस्कार' मिल चुका है. भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व अधिकारी भगवान अटलानी राजस्थान सिंधी अकादमी के सदस्य भी रह चुके हैं.

