
आभासी दुनिया में दिन-रात गोता लगाने वालों की तादाद दिनोदिन बढ़ती जा रही है, ये लोग सोशल मीडिया और चैट में घंटों डूबे रहते हैं. जानकारों के मुताबिक डिजिटल दीवानगी हद से ज्यादा बढ़कर दिमागी बीमारी बनी. हर पांच में से दो युवा अपने स्मार्टफोन के बगैर बेचैन होने लगते हैं तो 96 फीसदी हर सुबह उठते ही सबसे पहले सोशल मीडिया खंगालते हैं.
आजकल 22 वर्षीय अभिषेक टिंडर पर भिड़ा हुआ है. वह अपने मोबाइल पर जैसे ही यह डेटिंग ऐप खोलता है, उसके दिमाग में एंडोर्फिन रसायन का तेजी से संचार होने लगता है, ठीक वैसे ही जैसे कि सेक्स के दौरान, कसरत करते वक्त या फिर मादक दवाओं को लेने से होता है. उसकी उंगलियां काफी तेजी से मोबाइल पर घूम रही हैं और वह लगातार “दाईं ओर स्वाइप” करता जा रहा है.
इस ऐप पर दाईं ओर स्वाइप करने का मतलब होता है “लाइक” करना यानी जितने भी चेहरे स्क्रीन पर आ रहे हैं, उसे सब पसंद हैं. ऐसा करते वक्त दिल्ली के खालसा कॉलेज का यह कॉमर्स स्नातक का छात्र बीच-बीच में फेसबुक या इंस्टाग्राम पर भी तस्वीरों और पोस्ट को टैग करने के लिए चला जा रहा है. इसके बाद “अगला घंटा वह अश्लील साइटों” को समर्पित करता है. आखिर में सवेरे चार बजे उसे गेम ऑफ थ्रोन्स ऑनलाइन देखने के बाद थककर नींद आ जाती है.

इन सब कामों से अगर उसे कुछ वक्त बचता है, तो ईस्ट ऑफ कैलाश निवासी एक रियल एस्टेट कारोबारी का यह इकलौता लड़का अपने पिता के दफ्तर में हो आता है. वह बिल्कुल आजकल के सामान्य लड़कों जैसा ही है.
(यह रिपोर्ट इंडिया टुडे मैगजीन के 30 सितंबर 2015 के अंक में प्रकाशित हुई थी)
बढ़ती जमात
अभिषेक ऐसे शहरी युवाओं की बढ़ती हुई जमात का हिस्सा है जिनके लिए इंटरनेट “उनके मस्तिष्क का विस्तार” बन चुका है. विभिन्न रिपोर्टों में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैः भारत में 18 से 30 साल के बीच पांच में से दो युवा ऐसे हैं जो अपने स्मार्टफोन के बगैर इस तरह “बेचैन होने लगते हैं जैसे उनका कोई अंग गायब हो.” इनमें 96 फीसदी सवेरे उठकर सबसे पहले सोशल मीडिया पर जाते हैं. 70 फीसदी युवाओं का कहना है कि वे ई-मेल और सोशल मीडिया को चेक किए बगैर जी नहीं सकते.
मामला इतना ही नहीं है. ग्लोबल आइटी सुरक्षा समाधान फर्म कैस्पर्स की लैब द्वारा इस साल किए गए सिलसिलेवार सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई है कि 1007 भारतीय युवाओं में से 73 फीसदी ऐसे थे जिन्हें “डिजिटल लत का शिकार” पाया गया, जो हर संभव डिजिटल प्लेटफॉर्म से लगातार खुद को इंटरनेट से जोड़े रहते हैं. अभिषेक की तरह ये युवा जितनी देर जागते हैं, आभासी दुनिया में अपना समय गुजारते हैं. ये पागलों की तरह लगातार गेम खेलते हैं, वीडियो देखते हैं, समाचार और आलेख पढ़ते हैं, ई-कॉमर्स की साइटें देखते हैं, चैट करते हैं, रीट्वीट करते हैं और सोशल मीडिया पर अपने फेवरेट बनाते हैं.

अध्ययन दिखाता है कि फोन का खो जाना इनके लिए गंभीर चिंता का विषय है. पिछले साल दस देशों के 10,000 लोगों पर ए.टी. कियर्नी द्वारा किए गए शोध में यह बात सामने आई कि 53 फीसदी भारतीय हर घंटे इंटरनेट से जुड़े रहते हैं जो कि वैश्विक औसत 51 फीसदी से ज्यादा है. इनमें 77 फीसदी लोग सोशल नेटवर्किंग साइटों पर रोजाना लॉग इन करते हैं.
यह एक लत है
लोगों के डिजिटल प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने की वजह अब बदल रही है और इसी के साथ शहरी रिश्तों में भी बदलाव आ रहा है. आइआइटी से पढ़े एक 28 वर्षीय लखनऊ निवासी इंजीनियर का ज्यादातर वक्त साइबरस्पेस में महिलाओं के साथ संबंध बनाने में गुजरता है. आइआइटी के दिनों से उसके “कुल 100 से ज्यादा महिलाओं के साथ साइबरस्पेस में संबंध रहे हैं,” जब “कैंपस में बमुश्किल ही कोई लड़की होती थी.” उसकी मुलाकात हकीकत में जिन महिलाओं से हुई, उनसे वह अपने शर्मीले स्वभाव के कारण संवाद नहीं बना पाया. आज की तारीख में इस लड़के को आभासी दुनिया में दोस्त बनाने का ऐसी लत लग गई है कि वास्तविक जिंदगी में कोई रिश्ता स्थापित करना उसके लिए “असंभव जान पड़ता है.
ऑनलाइन साइकोथेरपी की सुविधा मुहैया कराने वाली साइट ई-साइक्लीनिक डॉटकॉम से जुड़े बनारस के एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. प्रियरंजन अविनाश कहते हैं, “यह हमारे दौर का लक्षण है.” वे कहते हैं, “जब किसी की जिंदगी के केंद्र में गैजेट आ जाए जो काम, पारिवारिक जीवन, दोस्ती और खाली वक्त सबको खाने लगे, तो यह “लत” बन जाता है. यह किसी और लत की तरह ही है.”
अगर किसी गैजेट से आपका मन खिल जाए और उसके न होने पर बेचैन हो उठे, तो तत्काल इस लत के लिए काउंसलर को कॉल करें. बेंगलूरू के निमहांस ने 2014 में प्रौद्योगिकी की लत के बारे में दिलचस्प आंकड़े दिए वहां उपचार करा रहे साढ़े तीन फीसदी लोग डिजिटल प्रौद्योगिकी पर गंभीर रूप से आश्रित थे और इनमें 11 फीसदी लती लोग शारीरिक व मानसिक तनाव में थे. निमहांस के सर्विस फॉर हेल्दी यूज ऑफ टेक्नोलॉजी (शट) क्लीनिक में संयोजक और क्लिनिकल साइकोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मनोज शर्मा इस लत के नतीजों के बारे में कहते हैं, “लोगों को प्रौद्योगिकी की लत लग रही है और उन्हें इसका एहसास तक नहीं है. यह मनोवैज्ञानिक समस्या है जिसके शारीरिक नतीजे होते हैं और यह सामाजिक समस्या का रूप धारण कर सकती है.”
इंटरनेट की लत को अब भी क्लिनिकल इलाज के योग्य नहीं माना जाता. मानसिक रोगों पर डायग्नॉस्टिक और स्टेटिस्टिकल मैनुअल इंटरनेट पर गेम खेलने को एक अवस्था का दर्जा तो देता है, लेकिन पैथोलॉजिकल डिसॉर्डर यानी बीमारी नहीं मानता. इसके बावजूद युवाओं का इंटरनेट का अत्यधिक इस्तेमाल, जो उन्हें वास्तविक दुनिया से घंटों दूर रखता है, दुनिया भर में गंभीर चिंता का विषय है. चीन दुनिया का पहला देश है जहां इंटरनेट की लत को क्लिनिकल डिसॉर्डर माना गया है और जिसका इलाज होता है. वेब जंकी नाम की एक डॉक्युमेंट्री फिल्म ने दुनियाभर में सनसनी फैला दी है, जो बीजिंग के ऐसे पुनर्वास केंद्र पर बनी है जहां किशोरों को महीनों तक बंद करके रखा जाता है और खतरनाक “डिप्रोग्रामिंग” थेरपी से गुजारा जाता है.
फंतासी या हकीकत
किशोरों के दिमाग पर किसी चीज की छाप बहुत जल्द पड़ती है. अगर वे आभासी दुनिया को ही वास्तविकता मान लेते हैं, तो उसके नतीजे बड़े भयावह हो सकते हैं. तीन महीने पहले मुंबई की एक मनोचिकित्सक सीमा हिंगोरानी ने 25 साल की एक लड़की का इलाज किया था जिसने पारिवारिक झगड़े के विवरण फेसबुक पर लगातार पोस्ट करके परिवार को टूटने के कगार पर ला दिया. वह फेसबुक पर यहां तक लिखती थी कि कौन किसे गाली दे रहा है और किसने किसको झापड़ मारा. इन विवरणों को फेसबुक पर डालने के बाद पारिवारिक झगड़ा नाटकीय तरीके से ऑनलाइन भी शुरू हो गया.
अपने फेसबुक के दोस्तों से मिल रहे कमेंट और लाइक पर वह काफी उत्साहित होती थी और जब कभी कोई अजनबी भी उससे सहानुभूति जताता, तो उसे खुशी मिलती. हिंगोरानी ने बताया, “वह अपने परिवार से भावनात्मक स्तर पर अलग-थलग महसूस कर रही थी. ऐसे में उसने अजनबी लोगों को अपना सहारा बना लिया.”
काउंसलरों के पास लगातार गैजेट की लत से जुड़े मामले आ रहे हैं और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ गैजेट की लत के साथ व्यवहार में आने वाले बदलावों के लिए नए-नए शब्द भी गढ़ रहे हैं. कई युवाओं को सेल्फाइटिस और वाइब्रेटिंग फोन सिंड्रोम की शिकायत देखने में आ रही है. मुंबई की एक 24 वर्षीया वकील चैताली सिन्हा को बताया गया कि उसे सेल्फाइटिस है. वह खुद को अपने कमरे में कई घंटे बंद रखती थी और दिनभर में 50 से ज्यादा सेल्फी खींच कर पोस्ट करती थी. इसे आत्ममुग्धता या आत्मरति भी कह सकते हैं. जब दफ्तर में कम उपस्थिति के चलते उसे इस्तीफा देने को कहा गया, तब जाकर उसके माता-पिता उसे एक काउंसलर के पास ले गए. वह कहती है, “मेरी तस्वीरों पर जब मुझे ढेर सारे लाइक मिलते हैं तो मैं खुश हो जाती हूं. मैं अपनी देह को सुडौल बनाए रखने के लिए काफी मेहनत जो करती हूं.” काउंसलिंग सेशन के दौरान उसे एहसास हुआ कि उसकी यह सनक दरअसल बचपन से ही खराब रही उसकी देहयष्टि के कारण थी.
तकनीक के लती लोगों को आजकल फोमो भी अपनी गिरफ्त में ले रहा है. फ्रोमो का मतलब है फियर ऑफ मिसिंग आउट यानी किसी चलन से पीछे छूट जाने का डर. अब चाहे इसे ध्यानाकर्षण की चाहत कहें, सामाजिक स्वीकार्यता की सनक कहें और दूसरों की जिंदगियों में झांकने की इच्छा, लेकिन यह बीमारी एक हकीकत है. दिल्ली की एक मनोचिकित्सक गीतांजलि कुमार कहती हैं, “फोन पर बस एक बीप बजने की देर है, हम तुरंत फोन उठा लेते हैं और फिर लतीफे फॉरवर्ड करना, चैट करना, संदेशों का जवाब देना एक मूर्खतापूर्ण सिलसिला चल निकलता है. यह चलता ही रहता है.”

शैलेश गांधी 36 साल के चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं. वे जब भी वॉट्सएप पर कोई संदेश भेजते हैं, उन्हें रोमांच हो आता है. संदेश कुछ भी हो सकता है, किसी दूसरे देश में विमान हादसे से लेकर मुंबई में बारिश का अपडेट. वे कहते हैं, “ताजा समाचार साझा करना मजेदार काम है. हर कोई जुड़े रहना चाहता है.” एपीजे अब्दुल कलाम की मौत की खबर आने के मिनटों के भीतर ही शैलेश ने इंटरनेट से पूर्व राष्ट्रपति की तस्वीर डाउनलोड की और अपने व्हाट्सऐप समूहों में पोस्ट कर दिया. मुंबई स्थित माइंड मंडल की संस्थापक और मनोचिकित्सक जानकी मेहता कहती हैं, “कोई खबर सही हो या नहीं, लेकिन उसे साझा करने पर दूसरे आपकी सराहना करते हों तो लोग खुद को महत्वपूर्ण समझने लगते हैं.”
ऑनलाइन गेमिंग की लत या इंटरनेट गेमिंग सिंड्रोम चिंता का एक और विषय है. दो साल पहले इंजीनियरिंग का एक छात्र मुंबई के मनोचिकित्सक डॉ. केर्सी चावडा के कमरे में आया और उसने गेम की लत छुड़ाने के लिए उनकी मदद मांगी. वह मेधावी छात्र था, लेकिन लगातार पचास घंटे ऑनलाइन गेम खेलता पाया गया तो युनाइटेड स्टेट्स यूनिवर्सिटी ने उसे लंबी छुट्टी पर भेज दिया था. इसी तरह पुणे यूनिवर्सिटी में भौतिकी के छात्र 20 वर्षीय मुनीश मेहता ने एक “ब्रेक ईयर” का विकल्प चुना, क्योंकि दुनियाभर के गेमरों के साथ फुटबॉल और टेनिस खेलने में उसे पढ़ाई के लिए फुर्सत नहीं मिली थी. वह कहता है, “मैं अक्सर रात को ही खेलता था, क्योंकि मेरी टीम के लोग अमेरिकी हैं.”
इस दौर का रोग
लक्षण बिल्कुल साफ हैं. डॉक्टरों के मुताबिक, जब कोई शख्स स्मार्टफोन के चक्कर में अपने काम और खाली समय से समझौता करने लगे, तो समझिए कि यह लत की शुरुआत है. मुंबई के कारोबारी 38 वर्षीय समीर मेहरोत्रा को वर्चुअल गेमिंग की ऐसी लत लग गई थी कि उनका विवाहित जीवन खतरे में पड़ गया. इस लत को छुड़ाने के लिए उन्हें लूडो और टेनिस की खुराक देनी पड़ी. उनका फोन घर पर ही छुड़वा दिया जाता और इनके बच्चों को घर से बाहर इनके साथ खेलने को कहा जाता. शुरुआती कुछ दिनों तक जब फोन उनके पास 15 मिनट भी नहीं होता था तो वे बेचैन हो जाते थे. अब मेहरोत्रा अपने फोन का समझदारी से इसतेमाल करते हैं.
हैदराबाद के धृति साइकियाट्रिक केयर में मनोविकार परामर्शदाता डॉ. पूर्णिमा नागराज कहती हैं, “जिन लोगों को भारी लत लग जाती है, वे बात करते वक्त आंख नहीं मिला पाते. इनकी भावनाएं भी भोथरी पड़ जाती हैं क्योंकि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए युवा इमोटिकॉन का प्रयोग करते हैं.” छह महीने पहले उन्होंने एक 17 साल के लड़के को परामर्श दिया था जिसके पास तीन सेलफोन थे और फेसबुक पर उसके 13 खाते थे जिनका इस्तेमाल वह अलग-अलग पहचानों से अलग-अलग लोगों से चैट करने के लिए करता था.
इकलौता होने के चलते वह घर पर अकेला था, लिहाजा आभासी दुनिया में उसके पास रिश्तों का पूरा एक जाल था जिसमें वह डूब जाता था. उसके माता-पिता ने जब-जब उससे फोन छीनने की कोशिश की, तो पहले उसने उनके ऊपर हमला किया और फिर खुद को घायल कर लिया. इससे छोटी उम्र के बच्चे भी जो देर तक ऑनलाइन गेम खेलते हैं, उनके भीतर उत्तेजना और मूड में बदलाव देखने में आता है. मुंबई की एक दंत चिकित्सक डॉ. नूपुर झुनझुनवाला बताती हैं कि उनका नौ साल का बेटा दो घंटे ऑनलाइन गेम खेलने के बाद खीझ जाता है. वे कहती हैं, “ऑनलाइन खेलों की गति तेज होती है. जब वास्तविक दुनिया में वह चाल नहीं दिखती, तो वह बेचैन हो जाता है.”
मुंबई की 38 वर्षीया स्मिता प्रधान को डिप्रेशन की शिकायत है. साइकोथेरपी के कुछ सेशन के बाद यह बात सामने आई कि नेटवर्किंग साइटों की सनक के चलते उनके भीतर उत्तेजना है और वे आत्मप्रतिष्ठा में कमी महसूस करती हैं. उनकी काउंसलिंग कर रही साइकोथेरेपिस्ट गीतांजलि मुरगइ कहती हैं, “रिश्तों को मापने का उनका पैमाना फेसबुक की अपनी तस्वीरों पर आने वाले लाइक और कमेंट थे. इसीलिए उनके लगता था कि उनके पति और बच्चे, जो फेसबुक पर नहीं हैं, उन्हें नापसंद करते हैं.”
छिपी हुई चाहतें
समाजशास्त्री तकनीक की लत को नए दौर के शहरी जीवन का परिणाम बताते हैं. इनमें संयुक्त परिवारों का विघटन, वास्तविक संबंधों की कमी और महत्वाकांक्षी जीवनशैली की आकांक्षा शामिल हैं. सोशल मीडिया पर बढ़ती निर्भरता के विषय पर शोध कर रही पुणे यूनिवर्सिटी से समाजशास्त्र में स्नातक सुशीला चौधरी कहती हैं, “मनुष्य में लोकप्रिय होने की चाहत होती है और आपको ऑनलाइन जितनी संख्याएं प्राप्त होती हैं, वे वास्तविक जीवन के मुकाबले कहीं ज्यादा होती हैं जहां आपको सिर्फ संबंध बनाने ही नहीं होते, उन्हें संभालना भी पड़ता है.”
विशेषज्ञ तकनीक की लत को दूसरी बीमारियों के साथ भी जोड़ते हैं, जैसे आत्मसम्मान में कमी और स्वीकार किए जाने की चाहत. अधिकतर लोगों के लिए आभासी दुनिया फूलों की एक सेज जैसी है जिसमें हकीकत की जिंदगी में मिलने वाले कांटे नदारद हैं.

इंस्टाग्राम पर साफ-सुथरी तस्वीरें, शानदार छुट्टियों के ऐल्बम, दोस्तों से मिलने वाले कमेंट और लाइक दरअसल एक आदर्श जीवन की आकांक्षा पैदा करते हैं. जानकी मेहता कहती हैं, “सोशल मीडिया पर लोग नई पहचान के साथ जी सकते हैं और अपने लिखे पर मिले कमेंट को देखकर खुश हो सकते हैं. पर यह इतना क्षणिक होता है कि वे प्रतिष्ठा पुष्ट करने के लिए बार-बार ऑनलाइन जाते हैं.”
मस्तिष्क और देह का रिश्ता
इस साल जनवरी में चीन के शंघाई मेंटल हेल्थ सेंटर ने एक अध्ययन किया जिसने दिखाया कि इंटरनेट की लत शराब और कोकीन की लत से होने वाले स्नायविक बदलावों को पैदा कर सकती है. मुरगइ कहती हैं, “यह दिमाग और शरीर के संतुलन को प्रभावित करता है. मैंने ऐसे मरीज भी देखे हैं जिन्होंने शारीरिक दर्द और हड्डियों के घनत्व की शिकायत की है.” वेडिंग प्लानर 27 वर्षीया अक्षता राव को जब अपनी उंगलियों में असह्य दर्द और खुजली की शिकायत हुई तो उन्हें फिजियोथेरपी करवानी पड़ी. वे कहती हैं, “यह लगातार मैसेज टाइप करने से हुआ. मैं दिन में 16 घंटे से ज्यादा टेक्स्ट करती थी.”
एक अन्य शिकायत गरदन, हाथ और उंगलियों में दर्द की है जो बार-बार होने वाले तनाव से पैदा होता है. खराब पोश्चर या ज्यादा टेक्स्ट करने से उन्हीं मांसपेशियों पर बार-बार दबाव पड़ता है. कोच्चि स्थित अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में प्रोफेसर और न्यूरोलॉजी के प्रमुख डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, “विद्युत-चुंबकीय विकिरण के लगातार संपर्क में रहने से ज्ञानात्मक बोध, स्मृति और नींद पर असर पड़ता है. गैजेट से पैदा होने वाली गर्मी त्वचा की सतह पर मौजूद कोशिकाओं को प्रभावित करती है. हमारे पास मोबाइल विकिरण से ट्यूमर को जोडऩे का अब तक कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है.”
डिजिटल नशा
इंसान में नशे की लत का इतिहास बहुत पुराना है. सिकंदर महान शराब की लत से 323 ईसा पूर्व में मरा. चीनियों के बीच अफीम की लत 19वीं सदी के अफीम युद्ध की वजह बनी. आज शहरी जीवन और सामाजिक मेलजोल में निकोटीन और कैफीन की लत पाई जाती है.
ऐसा पहली बार है कि एक ऐसे नशे से सामना हुआ है जिसे न तो खाया जा सकता है, न पिया जा सकता है और न ही सूंघा जा सकता है, जबकि यहां शारीरिक नुक्सान भी असल मसला नहीं है. मुंबई के हीरानंदानी अस्पताल में सोशल साइकियाट्रिस्ट डॉ. हरीश शेट्टी के मुताबिक, डिजिटल लत के लक्षण हालांकि समान रहते हैं और इसका दिमाग से लेना-देना होता है. किसी भी अन्य लत की तरह इंटरनेट की लत से ग्रस्त लोगों का अपने ऊपर नियंत्रण खत्म हो जाता है, वे झूठ बोलने लगते हैं, पैसे चुराते हैं या दूसरों को ठगते हैं, शारीरिक तनाव झेलते हैं. मेहता कहते हैं, “अगर आप चैन की नींद नहीं लेंगे तो आपका हाजमा खराब होगा जिससे स्नायविक बदलाव पैदा हो जाएगा.”

आश्चर्य नहीं कि तकनीक के लती दूसरे नशे के भी शिकार हो जाते हैं. मेहता कहते हैं, “कोई भी लत भीतर के खालीपन से होती है. इसीलिए एक ही वक्त में कई चीजों की लत लगना स्वाभाविक है.” शेट्टी क्लीनिक में आने वाले अधिकतर टेक एडिक्ट को “ड्रग, गेम और पोर्न डिसॉर्डर” के मरीज कहते हैं. केर्सी चावडा कहते हैं, “एडिक्टिव पर्सनैलिटी पर सिद्धांत मौजूद हैं लेकिन डिजिटल लत के लिए उनका परीक्षण नहीं हुआ है. कुछ लोगों ने इसे डिप्रेशन या बॉर्डरलाइन व्यक्तित्व विकारों से जोड़ा है.”
इलाज की तलाश
भारत में भी अब इंटरनेट पुनर्वास केंद्र खुल रहे हैं. शट क्लीनिक 2014 में खोला गया था जिसने डिजिटल या इंटरनेट की लत से छुटकारा दिलाने का काम किया, जहां प्रौद्योगिकी के लती लोगों की फोन पर निर्भरता कम की जाती है. फोन और चैट के लती किशोरों के लिए दिल्ली के एनजीओ उदय फाउंडेशन ने पिछले जुलाई में सेंटर फॉर चिल्ड्रेन इन इंटरनेट ऐंड टेक्नोलॉजी डिस्ट्रेस खोला है ताकि इन बच्चों को तकनीक के अत्यधिक उपयोग से दूर किया जा सके.
मुंबई भर में इंटरनेट से छुटकारे की कार्यशालाएं और काउंसलिंग कार्यक्रम चलाने वाले शेट्टी कहते हैं, “नियमित परामर्श और कठोर नशामुक्ति कार्यक्रम की जरूरत है.” तकनीक की निर्भरता से लोगों को छुटकारा दिलाने के लिए विशेषज्ञ नई शब्दावली भी गढ़ रहे हैं. मसलन, वे गैजेटमुक्त छुट्टियों पर जाने के लिए कहते हैं, जैसा हाल ही में इमरान खान ने किया. वे ऑनलाइन टाइम में संतुलन की बात करते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि किशोरों और छोटे बच्चों में भी इसका प्रभाव नजर आता है. मुंबई के 13 साल के एक बच्चे को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा क्योंकि उसने अपने माता-पिता पर सिर्फ इसलिए हमला कर दिया क्योंकि “उसका फोन वे छीन रहे थे.”

काउंसलरों की माता-पिता को सलाह है कि वे नए दौर के हिसाब से बच्चों को पालने के कौशल विकसित करें. इसके लिए वे गैजेट पर खर्च किए जा रहे समय पर निगरानी रखें और बच्चों को परिवार में वक्त दें. स्कूल भी अब अपने परिसरों में फोन को प्रतिबंधित कर के डिजिटल इस्तेमाल के प्रति जागरूक हो रहे हैं. मुंबई के एक स्कूल में शिक्षक और दो बच्चों की मां रूपाली कहती हैं, “माता-पिता बच्चों को सबसे आधुनिक फोन देने की होड़ करते हैं. वे बच्चों के भीतर यह सनक भर देते हैं.”
समाधान आसान नहीं
इसका समाधान इतना आसान नहीं है. हमेशा गैजेट मुक्त रहना भी उतना व्यावहारिक नहीं है. इसीलिए बाजार में एक नया शब्द आया है “डिजिटल हाइजीन.” शेट्टी कहते हैं, “जब आप सोने जाएं तो अपने गैजेट को एक कोने में रख दें, टीवी का रिमोट और फोन कमरे के बाहर फेंक दें.” हर दौर में में नशामुक्ति के तमाम नुस्खों की तरह डिजिटल डीटॉक्स यानी डिजिटल नशामुक्ति को भी दुनियाभर में बाजार के अनुकूल बनाने के लिए इसमें नई-नई चीजें जोड़ी जा रही हैं.
अब डीटॉक्स कैंप यानी डिजिटल नशामुक्ति शिविर और अवकाशों के विज्ञापन देखने में आ रहे हैं. डिजिटल डीटॉक्स पैकेज के साथ वेलनेस रिट्रीट दिए जा रहे हैं. होटलों में गैजेट उपयोग के नए-नए नियम बनाए जा रहे हैं. डीटॉक्स योगा की पेशकश हो रही है. कार्यस्थलों पर भी टेक-फ्री स्पेस बनाया जा रहा है. काम के दौरान ऐसी अवधि बनाई जा रही है जिसमें आप गैजेटमुक्त रह सकें. कर्मचारियों से आग्रह किया जा रहा है कि वे अपने सप्ताहांत का दोबारा आनंद लें.
धुंधली रेखाएं
अभिषेक अब भी अपने डिवाइस से पहले की तरह चिपका हुआ है. शोध और औसत के नियम के हिसाब से देखें तो वह 16 घंटे जगे रहने के दौरान कम से कम 150 बार फोन चेक करता है; रोजाना 22 कॉल या तो करता है, लेता है या उनसे बचता है; रोजाना 23 संदेश भेजता है या प्राप्त करता है; दिन में 18 बार मोबाइल में समय देखता है. यह सब करते हुए भारत के 97.8 करोड़ मोबाइल उपयोगकर्ताओं की तरह उसे इस बात का इल्म नहीं है कि वह फोन कहां ले जा सकता है और कहां नहीं (जैसे शौचालय में, बिस्तर पर, खाने के वक्त और गाड़ी चलाने के दौरान), इसके बीच का अंतर धुंधला होता जा रहा है.
अगर वह इस स्टोरी को पढ़ रहा हो, तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह ऊपर कही गई बातों से सहमत होते हुए जिंदगी की दूसरी खुशियों के प्रति खुद को खोलेगा.
(गोपनीयता बनाए रखने के लिए केस स्टडी के लोगों के नाम बदल दिए गए हैं)
(अदिति पै के साथ रिपोर्ट में मोना रामावत, मरूशा मुजफ्फर, मोईना हलीम और दूरबा घोष का भी योगदान है)

