ब हालात, समस्याएं, आपके इर्द-गिर्द के लोगों के हताश करने वाले विचार, ये सब मिलकर आपको शुरुआत करने से रोकते हैं. महिला आर्थिक परेशानी में फंसी हो, उसे परिवार का सहयोग नहीं हो और बच्चे छोटे-छोटे हों, तो यह काम और भी कठिन हो जाता है.
इसके बावजूद कामयाब महिला उद्यमियों की तादाद हमारे यहां लगातार बढ़ती जा रही है. आप उन्हें उन तमाम जगहों पर पा सकते हैं जहां इनकी उम्मीद तक न हो. ये ऐसी विविध और अनजान पृष्ठभूमि से आती हैं और ऐसे अवसर खोज लाती हैं जिनके बारे में कई को यह भी पता नहीं होता कि ऐसा कुछ हो सकता है. पेश है ऐसी पांच असाधारण महिला उद्यमियों की जिंदगी की कहानी, जिन्होंने सारी बाधाओं को पार करके खुद को दौड़ में बनाए रखा.
फौलादी इरादे
कल्पना सरोज खांटी कॉर्पोरेट अधिकारी जैसी नहीं दिखतीं. महाराष्ट्र के अकोला जिले में एक दलित परिवार में जन्मी कल्पना की शादी 12 साल की उम्र में 22 साल के एक युवक से मुंबई में हो गई थी. ससुराल वालों ने उन्हें प्रताडि़त किया, नतीजतन उनकी शादी कुछ महीनों में ही टूट गई. वे अपने माता-पिता के घर लौट आईं. वहां उन्होंने एक बार खुदकुशी की भी कोशिश की, लेकिन बच गईं. वे याद करते हुए कहती हैं, ''मैंने अपना जीवन खत्म करने की कोशिश की. ऐसा कुछ भी नहीं बचा था जिसके लिए जीने को मन करे. पैसा था नहीं और मकान बहुत छोटा था. मुझे उस जिंदगी से बाहर निकलना था.”
सरोज पिछली सदी के आठवें दशक के अंत में मुंबई पहुंच गईं. शुरुआत में उन्होंने एक हौजरी कारखाने में काम किया, फिर तकरीबन अगले एक दशक तक निर्माण उद्योग, रियल एस्टेट से लेकर सामाजिक कार्य के क्षेत्र में हाथ आजमाया. वे बताती हैं, ''मैं जानती थी कि मुझे जीवन में कुछ करना है.”
बात 2001 की है जब तांबे के ट्यूब बनाने वाली कंपनी कमानी ट्यूब्स, जिसमें कि वे बोर्ड सदस्य थीं, उसके कुछ कर्मचारी उनके पास कंपनी को बीमार हालत से बाहर निकालने की गुहार लेकर पहुंचे. इस कंपनी का इतिहास बहुत उथल-पुथल भरा रहा था. यह कंपनी 1960 में बनी थी और 1985 में इसे बंद कर दिया गया. बाद में कर्मचारियों के सहकारी उपक्रम ने इसे 1988 में दोबारा शुरू किया लेकिन 1995 में इसे बीमार करार दिया गया. जिस वक्त कंपनी 116 करोड़ रु. के कर्ज और 140 मुकदमों के बोझ तले दबी हुई थी, तब सरोज ने कमानी की बागडोर अपने हाथों में ली. उनके सामने बहुत बड़ी चुनौती थी. वे कहती हैं, ''कई लोगों को यह काम असंभव लग रहा था.”
सरोज 2001 से 2006 के बीच लंबित मुकदमों को निबटाती गईं और सरकार व ऋणदाताओं के साथ बातचीत के रास्ते उन्होंने ब्याज और अर्थदंड से कंपनी को छुटकारा दिलवाया. आइडीबीआइ बैंक ने जो कमानी ट्यूब्स के पुनर्गठन की प्रक्रिया की निगरानी कर रहा था, 2006 में कंपनी के लिए बोलियां आमंत्रित कीं. तब सरोज ने कमानी ट्यूब्स को खरीद लिया और वे तभी से कंपनी के विस्तार के लिए अनवरत काम कर रही हैं.
वे कहती हैं, ''यह बिल्कुल किसी पहाड़ी के कगार पर चलने जैसा था.” आज वे कमानी ट्यूब्स की चेयरमैन हैं. कमानी अब 300 करोड़ रु. की कंपनी है और सरोज का आज बड़ी राजनैतिक और कारोबारी शख्सियतों के साथ उठना-बैठना है. उनका लक्ष्य अब कंपनी की निर्माण क्षमता को 100 टन से बढ़ाकर 3,000 टन करने का है. महीने भर के भीतर वे स्टील की रॉड का उत्पादन भी शुरू कर देंगी. वे कहती हैं, ''मैं कंपनी को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहती हूं.”
पैसा सब कुछ नहीं
रश्मि सावंत उन लोगों में से हैं जिन्होंने पैसे की दिक्कत के कारण अपने कदम पीछे नहीं खींचे. पर्यटन में पोस्ट ग्रेजुएट 33 वर्षीया सावंत ने अपना रास्ता चुनने से पहले कई ट्रैवल कंपनियों के साथ काम किया, लेकिन वे एक सामान्य टूर ऑपरेटर बन कर नहीं रह जाना चाहती थीं जो हनीमून के पैकेज से लेकर हिल स्टेशन की यात्रा योजनाएं या शॉपिंग कार्निवाल आदि बेचते हैं.
सावंत कहती हैं, ''हम चाहते थे कि लोग गांवों में पैसे खर्च करें.” लिहाजा 2005 में उन्होंने ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कल्चर आंगन की स्थापना की जिसके माध्यम से राजस्थान और गोवा के गांवों में घरों में रुकने का काम शुरू किया गया. उन्होंने मुंबई स्थित अपनी कंपनी में अब तक 30 लाख रु. निवेश किए हैं. इस कारोबार में सात साल बीत जाने के बाद सावंत को आशा है कि इस वित्त वर्ष में वे ''छोटा-सा मुनाफा” कमा सकेंगी. वे कहती हैं, ''भारत में ग्रामीण घरों में रुकने का विचार बिल्कुल नया है. लोगों को जागरूक करने में वक्त लगता है.”
कारोबारी वर्जिश
मां बनने के बाद सायरी चहल को समझ आया कि कॉर्पोरेट दफ्तरों में काम करने के सुविधाजनक विकल्पों की कितनी दरकार है. वे भी उन तमाम महिलाओं में से एक हो सकती थीं जो मां बनने के बाद संस्थानों के काम करने के कठिन तरीकों के चलते आकर्षक और बेहतरीन करियर छोड़ देती हैं. लेकिन उनकी योजनाएं कुछ अलग थीं. वे कहती हैं, ''मैं अकसर सोचती हूं कि अगर मैंने खुद पर जोर नहीं डाला होता तो मैं जड़ हो जाती.”
चहल ने फ्लेक्सिमॉम्स नाम से दिल्ली में एक कंपनी बनाई, जिसकी शाखाएं देश के कई शहरों में हैं. यह कंपनी महिलाओं को आराम से नौकरी करने का विकल्प देती है. वे कहती हैं, ''जब तक आपका सामना नहीं होता, आप इसकी जरूरत को नहीं समझ पाते.” उन्होंने अनिता वासुदेव के साथ मिलकर यह कंपनी खड़ी की है. वे महिलाएं जिनके हाथ से करियर फिसल चुका होता है, उनके लिए यह कंपनी सुविधाजनक तरीके से काम करने के विकल्प खोजती है और कौशल में रह गई कमियों को पूरा के लिए प्रशिक्षण भी देती है.
फ्लेक्सिमॉम्स पिछले साल एक स्वतंत्र कंपनी के रूप में उभरी है. चहल ने साइता कंसल्टिंग की देखरेख में इसे दो साल तक विकसित किया. साइता एक कंसल्टिंग फर्म है जिसे उन्होंने वासुदेव के साथ मिलकर 2006 में खड़ा किया था. यह छोटे और मध्यम उद्यमों को परामर्श देती है. आज फ्लेक्सिमॉम्स 300 कंपनियों के साथ काम कर रही है. चहल कहती हैं, ''कई दूसरी कंपनियां भी इसके साथ जुडऩा चाहती हैं.”
फूलों की ताकत
डॉ. गजाला अमीन ने 2004 में जब लैवेंडर के फूलों के कारोबार में उतरने की ठानी, तो उनका यह निर्णय उनके परिवार और मित्रों को रास नहीं आया. वे समझ नहीं पा रहे थे कि गजाला चिकित्सा का क्षेत्र छोड़कर उद्यमी क्यों बनना चाहती हैं. वे कहती हैं, ''कश्मीर में महिलाएं कभी भी उद्यमिता से जुड़ी नहीं रहीं, वे सिर्फ एनजीओ में हैं. और कश्मीर में एनजीओ बहुत बदनाम हैं.” वे कहती हैं, ''आपका दिल जो कहता है, उससे लोगों को सहमत कर पाना मुश्किल होता है.”
गजाला ने सामंती मानसिकता से संघर्ष करते हुए अपनी बचत के आठ लाख रु. एक फार्म में लगा दिए. वहां उन्होंने गुलाब और लैवेंडर जैसे खुशबूदार पौधों की खेती की. वे बताती हैं, ''मैंने महसूस किया कि नकारात्मक संकेत उन दिशाओं से आ रहे थे जिनकी मेरे कारोबारी सफर में कोई अहमियत नहीं थी. मगर इस काम में जो विभाग और लोग मायने रखते थे, उन्होंने मुझे सहयोग किया. शुरुआती दिन मुश्किल भरे थे. गजाला बताती हैं, ''सब मान कर चलते थे कि मैं एनजीओ से जुड़ी हूं. लोगों को यह समझ पाना मुश्किल था कि मैं कारोबारी हूं.”
तब से लेकर अब तक उन्होंने लंबा सफर तय किया है. उन्होंने उद्यमिता को घाटी की 'महिलाओं के लिए सम्मानित पेशे’ में तब्दील कर दिया है. आज वे महिला सशक्ïतीकरण का प्रतिनिधि चेहरा हैं. उनकी कंपनी फासियाम एग्रो फाम्र्स सालाना आठ फीसदी की दर से तरक्की कर रही है. वे कहती हैं, ''मेरा लक्ष्य था एक विश्वस्तरीय उत्पाद को लाना. कश्मीर के लैवेंडर अब एक ग्लोबल नाम बन चुके हैं.”
धारा के विपरीत
इशिता स्वरूप ने नब्बे के दशक की शुरुआत में जब उद्यमी बनने की ठानी, तब उनके सरकारी कर्मचारी पिता ने साफ कह दिया, ''मैं कोई मदद नहीं करूंगा.” उस वक्त स्वरूप को प्रति माह 7,000 रु. वेतन मिलता था और बिजनेस को, खासकर महिलाओं के लिए, बुरा समझ जाता था. लेकिन वे डिगी नहीं. उनका पहला उद्यम था बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग कंपनी ओरियन डायलॉग, जिसे उन्होंने बाद में एस्सार समूह के बीपीओ एजिस को बेच दिया. उन्हें पुरुष वर्चस्व के खिलाफ भी संघर्ष करना पड़ा. वे बताती हैं, ''मुझसे अकसर पूछा जाता था कि क्या मैं अपने पिता का काम देख रही हूं.”
वित्तीय संकट के चलते स्वरूप को कड़ी मेहनत करनी पड़ी. उन्होंने जितने पैसे कमाए, सब कारोबार में झेंक दिए और लागत को जितना कम हो सके, बनाए रखा. फिलहाल वे 99 लेबल्स नामक ऑनलाइन शॉपिंग साइट चला रही हैं. 2010 में शुरू की गई यह वेबसाइट रियायती दरों पर लक्जरी ब्रांड बेचती है. नौकरी डॉट कॉम चलाने वाली कंपनी इनफोएज ने उनकी कंपनी में अब तक 28.5 करोड़ रु. निवेश किए हैं. स्वरूप कहती हैं, ''मेरी पहली कंपनी के जितना पैसा तो हम नहीं कमाते. लेकिन हमारी वृद्धि लाजवाब रही है.”

