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हिमाचल प्रदेश: अपनों से जूझ रही भाजपा

उत्तराखंड गंवा चुकी भाजपा के लिए पहाड़ की दूसरी और एकमात्र सरकार को बचाना बड़ी चुनौती है. वरिष्ठ नेताओं की बगावत और गुटबाजी से मुश्किलें बढ़ी.

अपडेटेड 2 अप्रैल , 2012

पहाड़ की सियासी फिजा भाजपा की सेहत को शायद नहीं सुहा रही. उत्तराखंड में खंडूड़ी-निशंक की लड़ाई से हाथ आई सत्ता फिसलने के बाद हिमाचल प्रदेश की गुटबाजी पर शीर्ष नेतृत्व चौकन्ना जरूर हो गया है. लेकिन पूर्व सांसद और राज्य के वरिष्ठ नेता माहेश्वर सिंह की ओर से हिमाचल लोकहित पार्टी का गठन करने और कांगड़ा से सांसद राजन सुशांत को पार्टी से निलंबित करने को मजबूर हुई भाजपा अब मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के धुर विरोधी शांता कुमार की शरण में है.

भाजपा सूत्रों के मुताबिक, मुख्यमंत्री को स्प्ष्ट कर दिया गया है कि खास तौर से कांगड़ा से जुड़े हर छोटे-बड़े फैसले शांता कुमार की जानकारी और उनकी सहमति से ही होने चाहिए.

इसके अलावा एकजुटता के फार्मूले के तहत शांता की हर बात को तवज्जो देना भी तय किया है. उनकी नाराजगी खास तौर से मंत्रियों की कार्यशैली को लेकर है.

सूत्रों के मुताबिक, शांता भी धूमल सरकार में शामिल दो मंत्रियों को बाहर करने की मांग कर रहे हैं, जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. लेकिन अब तक शांता को नजरअंदाज करने वाले नेता लगातार उनसे बातचीत कर नाराजगी खत्म करने में जुटे हैं. हिमाचल में हालात हू-ब-हू उत्तराखंड की तरह ही हैं और पार्टी के लोग ही सरकार पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगा रहे हैं. कांग्रेस ने तो बाकायदा 'हिमाचल ऑन सेल' अभियान भी छेड़ रखा है.

हालांकि पार्टी साल के आखिर में होने वाले हिमाचल विधानसभा का चुनाव धूमल के नेतृत्व में ही लड़ेगी, लेकिन अपने घर को दुरुस्त करने का काम वक्त रहते शुरु कर दिया है. भाजपा महासचिव जे.पी. नड्डा कहते हैं, ‘अब कोई मतभेद नहीं है. धूमल के नेतृत्व में हम चुनाव लड़ेंगे और पंजाब की तरह इस बार हिमाचल में भी मिथक टूटेगा. हमें पूरा विश्वास है कि भाजपा लगातार दूसरी बार सत्ता पर काबिज होगी.’

राज्य भाजपा में बगावत के फौरन बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने नड्डा और सचिव शाम जाजू को ही शिमला भेज रिपोर्ट मंगवाई थी. प्रदेश के सभी नेताओं से बातचीत के बाद पार्टी ने स्पष्ट तौर पर महसूस किया था कि किसी तटस्थ व्यक्ति को अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जाए, वर्ना उत्तराखंड के बाद पहाड़ की दूसरी सत्ता से भी बेदखल होना पड़ेगा.

इस रिपोर्ट पर फौरी कार्रवाई करते हुए खीमी राम को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर सरकार में मंत्री बनाया गया और प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी एबीवीपी पृष्ठभूमि से जुड़े विधायक सतपाल सत्ती को सौंपी गई. मुख्यमंत्री धूमल के सांसद पुत्र अनुराग सिंह ठाकुर कहते हैं, ‘विवादों की बात अब पुराना अध्याय बन गया है. इस वक्त सब कुछ सामान्य है.’

लेकिन फिलहाल अपनों से ही जूझ रही भाजपा के लिए राहत की एकमात्र वजह कांग्रेस की सिर-फुटव्वल है, जहां केंद्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह और आनंद शर्मा अपनी-अपनी दावेदारी जता रहे हैं. हालांकि उत्तराखंड में ब्राह्मण नेतृत्व को आगे बढ़ाए जाने के बाद हिमाचल में वीरभद्र ही एकमात्र विकल्प हैं. पहाड़ में ब्राह्मण बनाम ठाकुर की राजनीति काफी मजबूती से दिखती है, इसलिए भाजपा ने माहेश्वर सिंह को वापस भाजपा में लाने के लिए प्रदेश अध्यक्ष को हर फैसले का अधिकार दे दिया है.

पंजाब में मिली ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा उत्तराखंड की तरह कोई जोखिम नहीं लेना चाहती, इसलिए पार्टी छोड़ने वालों को वापस लाने और विरोधी गुट को मनौव्ल हो रही है. लेकिन सभी गुटों के बीच चुनाव तक एकजुटता को बनाए रखना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है.

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