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सीपी जोशी: सड़क के नए सारथी

टी.आर. बालू और कमलनाथ के वक्त सुस्त पडे़ राजमार्ग निर्माण को डॉ. सी.पी. जोशी ने नई गति दी है. अगर राजमार्ग पर उनके रथ का पहिया बिना लड़खड़ाए घूमा, तो वे राज्य में अशोक गहलोत को चुनौती दे सकते हैं.

डॉ. सी.पी. जोशी
डॉ. सी.पी. जोशी
अपडेटेड 19 जून , 2011

उन्हें सतही जवाब पसंद नहीं है. पारदर्शिता और जवाबदेही उनका मूलमंत्र है. सड़क, परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की कमान संभालने के फौरन बाद जब डॉ. सी.पी. जोशी ने राजमार्ग से जुड़े सभी ठेकेदारों की मीटिंग ली, तो एक ठेकेदार ने दरकने वाली मिट्टी की जगह पर अतिरिक्त भराव के खर्च का मुद्दा उठाया.

असल में यह सवाल योजनाबद्ध तरीके से पूछा गया था, ताकि सहानुभूति जता रहे मंत्री समीक्षा के लिए एक कमेटी गठित कर दें और इसके जरिए निर्माण लागत को बढ़ाकर मिलीभगत कर अपनी जेब गर्म कर सकें.

लेकिन जोशी ने तपाक से कह दिया-''ऐसा तो बाईचांस (संयोगवश) होता है...''  मंत्री का यह जवाब सुनते ही ठेकेदार समेत बैठक में मौजूद तमाम अधिकारियों का चेहरा उतर गया. ठेकेदारों के साथ मिल कुछ लोग निर्माण लागत बढ़ाने का नया जरिया बनाना चाह रहे थे. लेकिन जोशी मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालते ही स्पष्ट कर चुके हैं, ''पारदर्शिता और जवाबदेही तय करना मेरी प्राथमिकता होगी.''

मंत्रालय के अधिकारी भी अब मानने लगे हैं कि मनोविज्ञान और खास तौर से आइक्यू परखने में विशेषज्ञ जोशी को चलताऊ जवाब से संतुष्ट नहीं किया जा सकता, अगर उन्हें समझाना है तो पहले खुद उस मामले का गहराई से अध्ययन करना होगा.

जोशी भौतिकी में मास्टर और मनोविज्ञान में डॉक्टरेट और खास तौर से आइक्यू में विशेषज्ञता हासिल कर चुके हैं. उदयपुर के एम.बी. कॉलेज में मनोविज्ञान के प्रोफेसर रहे चंद्र प्रकाश जोशी के बारे में आम धारणा है कि वे जल्द किसी पर यकीन नहीं करते, लेकिन एक बार भरोसा कर लिया, तो सारी बातें खोलकर रख देते हैं.

मिसाल के तौर पर एक अधिकारी कहते हैं कि अगर विभाग के लिए कोई गाड़ी खरीदी जाती है तो सी.पी.जोशी उसकी सी.सी. से लेकर टायर की चौड़ाई तक पूछते हैं. सड़क निर्माण के मामले में भी वे चौड़ाई से लेकर दोनों किनारे छोड़ी जाने वाली जगह आदि फौरन पूछ लेते हैं और कमी महसूस हुई तो तब्दीली का फरमान देने में तनिक भी देर नहीं लगाते हैं.

झ्क सफेद कुर्ता-पायजामा धारण करने वाले जोशी सख्त अंदाज में, लेकिन सीधी-सपाट ढंग से बात करना पसंद करते हैं. इसलिए अक्सर उन्हें लोग अक्खड़ या मुंहफट भी कहते हैं. जोशी के काज से राज भोगने वाले नौकरशाह अब चुस्त होने लगे हैं.

एनएचएआइ से जुड़े सभी अधिकारियों को वे विभाग की मालदार छवि को बदलने और सरकारी ढर्रा छोड़ कॉर्पोरेट संस्कृति में ढलने की घुट्टी पहले ही पिला चुके हैं.

ऐसा नहीं है कि अपनी ईमानदार छवि और काम के लिए प्रतिबद्धता की वजह से अलग पहचान बनाने वाले जोशी ने सिर्फ अधिकारियों को ही पूरी तैयारी के साथ आने की हिदायत दे रखी है, बल्कि वे खुद जब किसी मामले की रिपोर्ट सोनिया गांधी या राहुल गांधी को देने जाते हैं, तो पूरी तैयारी के साथ जाते हैं.

एनएचएआइ के चेयरमैन के लिए भी उन्होंने बेहिचक प्रधानमंत्री से टेक्नोक्रेट की पैरवी की, तो बाकायदा मेट्रोमैन ई. श्रीधरन का उदाहरण दिया. जिससे इस पद की आस में बैठे कई नौकरशाह नाराज हो गए, नाराज होने वालों में मंत्रालय के सचिव आर.एस. गुजराल भी थे, जो चेयरमैन का अतिरिक्त कार्यभार भी देख रहे हैं और खुद इस पद की दौड़ में हैं.

गुजराल उस वक्त छुट्टी पर चले गए थे, जब जोशी ने मंत्रालय के कामकाज पर पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस की और गुजराल की जगह वहां पोत सचिव के. मोहनदास बैठे थे.

लेकिन इन नाराजगियों से बेफिक्र जोशी कहते हैं, ''चेयरमैन के लिए मापदंड में बदलाव होना ही चाहिए. हम चाहते हैं कि टेक्नोक्रेट और निजी जगत के लोगों के लिए भी व्यवस्था होनी चाहिए.'' अपनी राय को पुष्ट करते हुए वे यहां तक कहते हैं, ''यह अजीब स्थिति है कि नौकरशाह कभी वित्त मामलों का विशेषज्ञ हो जाता है, तो कभी टेक्नोक्रेट की भूमिका में आ जाता है. अब विशेषज्ञों का जमाना है.''

मंत्रालय की कमान संभालते ही जोशी ने करीबन दर्जन भर ऐसे कदम उठाए हैं, जो उन्हें उनके पूर्ववर्तियों से अलग पहचान दिला सकें. सबसे पहले उन्होंने भ्रष्टाचार के मौसम में पारदर्शिता का बिगुल फूंका. राजमार्ग प्राधिकरण को सोशल साइट फेसबुक से जोड़ा और इससे जुड़े सभी अधिकारियों-ठेकेदारों की जवाबदेही तय की.

महज चार माह में ही इसे 30,000 से ज्यादा लोगों ने देखा, तो 1,000 से ज्यादा लोगों ने फेसबुक पर परिचर्चा में हिस्सा लिया और अपनी शिकायत के साथ-साथ सुझाव भी दर्ज कराए. फेसबुक पर आने वाली शिकायत पर महकमे के दो अधिकारी कुछ ही देर में उसके समाधान के लिए संबंधित अधिकारी-ठेकेदार का नंबर और सड़क के बारे में पूरा विवरण मुहैया करा देते हैं, जिससे शिकायतकर्ता अपनी बात को मजबूती से रख सकता है.

जोशी स्पष्ट कहते हैं, ''अगर भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाना है, तो सरकार के साथ-साथ आम नागरिकों को भी पहल करनी होगी, सिर्फसरकार को कोसने या आंदोलनों से भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं किया जा सकता.'' 

राजमार्ग निर्माण के रोजाना 20 किमी के लक्ष्य को हासिल करने के लिए मंत्रालय के इतिहास में पहली बार मासिक कैलेंडर बनाया गया है, जिसमें किस महीने में कितनी परियोजनाओं की कितनी सड़कें बननी हैं, उसका खर्च समेत पूरा ब्यौरा दर्ज है.

जोशी ने सभी परियोजनाओं को समयसीमा में बांध दिया है जबकि टी.आर. बालू के समय राजमार्ग निर्माण का काम करीब-करीब लकवाग्रस्त हो चुका था और 2009-10 में 3,360 किमी तो कमलनाथ के वक्त 5,083 किमी सड़कों का ही टेंडर हुआ. जिसकी वजह से 2010-11 में भी लगातार तीसरे साल सड़क निर्माण की रफ्तार पांच किमी प्रतिदिन ही रही.

अब जोशी ने पांच साल की देरी से चल रही 16,000 करोड़ रु. की 105 मेगा परियोजनाओं पर चिंता जाहिर करते हुए अधिकारियों को फास्ट ट्रैक योजना पर काम करने के निर्देश दिए हैं, ताकि समय और अतिरिक्त लागत का बोझा न पड़े. वे कहते हैं, ''रोड सेक्टर में आमूल-चूल बदलाव जरूरी है. मैंने अधिकारियों को कह दिया है कि परियोजनाओं पर अमल में देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी.''

अब जोशी ने अपने पूर्ववर्तियों की गलती से सबक लेते हुए सालाना 7,300 किमी सड़क निर्माण का टेंडर जारी करने की ठानी है, ताकि लक्ष्य हासिल किया जा सके. जोशी कहते हैं, ''अगर तीन साल तक हम 7,300 किमी टेंडर करते रहें, तो 20 किमी रोजाना का लक्ष्य आसानी से हासिल हो जाएगा.''

 हालांकि पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विभागीय समीक्षा करते हुए सड़क निर्माण का लक्ष्य बढ़ाने की तारीफ तो की, लेकिन जोशी को निर्देश दिया कि अब हर साल 10,000 किमी की परियोजनाएं टेंडर के लिए रखें ताकि कभी किसी अड़चन की वजह से लक्ष्य हासिल करने में दिक्कत न हो. इसके अलावा उन्होंने 15,000 किमी की विस्तृत योजना रिपोर्ट (डीपीआर) भी तैयार रखने पर जोर दिया.

प्रधानमंत्री की ओर से मिली सराहना से उत्साहित जोशी बेहद जोश से कहते हैं, ''हम चुनाव में जाने से पहले देश की जनता को बता देंगे कि प्रधानमंत्री ने रोजाना 20 किमी सड़क निर्माण का जो वादा किया था, उसे हमने पूरा कर दिखाया.''

इतना ही नहीं, जोशी ने मलाईदार माने जाने वाले राजमार्ग विभाग के सभी टेंडर को इसी साल अगस्त से ऑनलाइन करने का फैसला कर लिया है. जल्द ही खरीद की प्रक्रिया भी ऑनलाइन होगी. ई-टेंडरिंग पर जोशी कहते हैं, ''पहले कुछ लोग एक गिरोह बनाकर ठेके हासिल कर लेते थे, लेकिन हम चाहते हैं कि अब सबको मालूम होना चाहिए.''

पारदर्शिता के लिए सूचना-प्रौद्योगिकी का भरपूर इस्तेमाल करते हुए जोशी ने गूगल अर्थ के साथ मिल कर सितंबर से जीआइएस प्रणाली शुरू करने का ऐलान किया है. इसके जरिए नक्सल प्रभावित और ग्रामीण इलाके की परियोजनाओं की निगरानी के साथ-साथ जमीनी स्तर पर होने वाले निर्णयों में भी पारदर्शिता आएगी.

जोशी कहते हैं, ''सड़क के नक्शे में अगर किसी बदलाव की जरूरत पड़ती है तो स्थानीय स्तर पर कोई एकतरफा या पक्षपाती निर्णय नहीं हो सकेगा.'' अक्सर यह देखने में आता है कि ऐसी परियोजनाओं को बिल्डर माफिया अपनी जमीन के आसपास से ले जाना चाहते हैं ताकि उसकी कीमत बढ़ जाए.

टोल टेक्स को भी टेंडर से देने और टोल प्लाजा पर होने वाले समय व ईंधन की बर्बादी से बचने के लिए जोशी ने इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह पर जोर दिया है. इसके लिए एनआइसी के डीडीजी के नेतृत्व में कमेटी गठित कर दी है और 2012 से यह प्रणाली शुरू होगी. जिसके लिए यूआइडी प्राधिकरण के अध्यक्ष नंदन नीलेकणि की सहायता ली जा रही है.

इस तकनीक में देश भर के सभी टोल प्लाजा को एक सर्वर से जोड़ा जाएगा और टोल से गुजरने वाली सभी गाड़ियों पर एक चिप लगी होगी, जिसे मोबाइल की तरह कहीं भी रिचार्ज करवाया जा सकेगा. इस पहल को मोबाइल के बाद दूसरी क्रांति के तौर पर देखा जा रहा है.

जोशी कहते हैं, ''पारदर्शिता के साथ-साथ अब मंत्रालय की विश्वसनीयता भी बढ़ी है और जहां कुछ जगहों पर ठेकेदारों को 30 से 40 फीसदी तक व्यावहार्यता अंतर वित्त पोषण (वीजीएफ) देना पड़ता था. लेकिन हाल ही में छह प्रोजेक्ट से मंत्रालय को 34,000 करोड़ रु. बतौर प्रीमियम मिलेंगे.''

जोशी ने विभाग के कर्मचारियों को कुशल बनाने के लिए विकसित देशों के साथ प्रशिक्षण की बातचीत भी शुुरू की है, लेकिन सड़क पर होने वाली दुर्घटनाओं को लेकर वे बेहद चिंतित हैं. उन्होंने अधिकारियों से दो-टूक कह दिया है कि उन्हें दुर्घटना के आंकड़े मात्र नहीं, बल्कि उसके कारणों का विश्लेषण चाहिए. वे अब एक जागरूकता अभियान छेड़ना चाहते हैं.

सड़क निर्माण में कई बार पर्यावरणीय मंजूरी अड़चन बन जाती है, लेकिन जोशी सड़क के साथ-साथ वन, जल, मृदा संरक्षण पर भी जोर दे रहे हैं. वे यह चाहते हैं कि सड़क बनाते वक्त ठेकेदारों को यह ख्याल रखना होगा कि  बारिश का पानी जमीन के अंदर भी जाए.

छह लेन वाले सभी राजमार्गों के दोनों तरफ हरियाली (ग्रीन-वे) लगाने का भी निर्देश दिया गया है. जोशी कहते हैं, ''इस देश में गुणवत्ता वाली सड़कों का जाल बिछाना जरूरी है ताकि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास में तेजी लाई जा सके.'' हालांकि जोशी पर भाजपा-राजग शासित राज्य भेदभाव का भी आरोप लगाते हैं.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का आरोप है कि खराब राजमार्गों के रख-रखाव के लिए केंद्र एक पैसा देने को राजी नहीं है. लेकिन अपनी आदत और छवि के मुताबिक जोशी राजनैतिक बयानबाजी से बचते हैं. वे कहते हैं, ''मैं राजनैतिक बयानबाजी नहीं करूंगा. अगर किसी के पास सच में ऐसी शिकायत है तो मेरे पास लाएं, मैं उसका जवाब दूंगा.''

अपनी तमाम नई पहलों के साथ सी.पी. जोशी सड़कों के नए सारथि के तौर पर उभरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन असल में उनकी मंशा शेरशाह सूरी की तरह सड़क-ए-आजम कहलाने की है जिसके लिए वे अथक मेहनत भी कर रहे हैं.

दिल्ली में रहने पर रोजाना मंत्रालय आना और एनएचएआइ और मंत्रालय के सभी अधिकारियों के साथ बैठकें करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा है. मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष के तौर पर 1973 में राजनैतिक जीवन की शुरुआत करने वाले जोशी 1980 में पहली बार विधायक चुने गए. फिर 1998 में जब अशोक गहलोत पहली बार मुख्यमंत्री बने तो जोशी को बतौर कैबिनेट मंत्री ग्रामीण विकास, पंचायती राज, जन स्वास्थ्य, सूचना ह्ढौद्योगिकी जैसा भारी-भरकम विभाग मिला.

भाजपा के सत्ता में रहते उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की कमान मिली, तो फिर कांग्रेस को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया, लेकिन खुद एक वोट से हार मुख्यमंत्री पद की दौड़ से बाहर हो गए. इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलु यह रहा कि नाथद्वारा सीट के चुनाव में उनकी पत्नी, मां और ड्राइवर ही अपना वोट नहीं डाल पाए थे.

लेकिन जोशी ने अभी हार नहीं मानी है.

शनिवार-रविवार की अपनी छुट्टियां वे खास तौर से संसदीय क्षेत्र की जनता के लिए रखते हैं. फिलहाल वे भीलवाड़ा से सांसद हैं, लेकिन उनका दिल आज भी नाथद्वारा के लिए धड़कता है. एक वोट की वह हार जोशी के दिल को आज भी कचोटती है, इसलिए अब मुख्यमंत्री पद का अपना सपना साकार करने के लिए वे केंद्र की राजनीति में अपनी कुशलता का दमखम दिखा रहे हैं.

राहुल गांधी के करीबियों में गिने जाने वाले जोशी अब केंद्र के साथ-साथ राज्य की राजनीति में भी अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने की जद्दोजहद में लगे हैं. उनके पास अपने कुछ विश्वस्तों और नौकरशाहों की एक ऐसी कोर टीम है, जो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मजबूती और कमजोरियों पर हमेशा पैनी नजर बनाए रखती है और जिसकी करीबन हर पखवाड़े गोपनीय बैठक होती है.

मुख्यमंत्री पद से महरूम होने की व्यथा यदा-कदा उनकी जुबां से दर्द के रूप में छलक ही पड़ती है. गहलोत की मौजूदगी वाले उदयपुर के एक कार्यक्रम में उन्होंने बेहिचक कहा था, ''मैं पहले अशोक गहलोत का फॉलोअर था. लेकिन अब फॉलोअर नहीं, सहयोगी हूं.'' यह जोशी और गहलोत के बीच खींचतान का ही नतीजा था कि सोनिया गांधी भी दो महीने तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के नाम का फैसला नहीं कर पाई थीं. आखिरकार इसमें बाजी गहलोत समर्थक डॉ. चंद्रभान ने मार ली, लेकिन जोशी के करीबी कहते हैं कि वे हार नहीं मानेंगे.   

 

नए कदम

*रोजाना 20 किमी सड़क निर्माण
*निर्माण के लिए मासिक कैलेंडर
*अगस्त, 2011 से ई-टेंडरिंग
*एनएचएआइ को फेसबुक से जोड़ा
*सितंबर से जीआइएस प्रणाली शुरू होगी
*टोल टेक्स भी अब टेंडर से होगा
*2012 से इलेक्ट्रोनिक टोल संग्रह लागू होगा
*कौशल प्रशिक्षण के लिए विकसित देशों से बात
*एन.एच. घोषित करने के लिए बनेगा ग्रिड
*दुर्घटना के आंकड़े नहीं, कारण का विश्लेषण हो

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