मारुतिः स्थापनाः 1981
पहली चाबी
भारत की सड़कों पर जिस जमाने में केवल दो ही कारों—एंबेसडर और प्रीमियर पद्मिनी—का राज हुआ करता था, यह पहली जनता कार के रूप में आई. बाजार में 50.5 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले भारत के सबसे बड़े कार निर्माता ने ग्राहकों की बदलती पसंद को समझते हुए छोटी कारों समेत सभी श्रेणी की कारों का निर्माण शुरू कर दिया.
मेक इन इंडिया अभियान में अगुआई करते हुए इसने 100 से ज्यादा देशों में 15 लाख से ज्यादा कारों का निर्यात किया. प्रीमियम हैचबैक बलेनो भारत में निर्मित और जापान को निर्यात होने पहली कार बन गई. इसमें 25,000 कर्मचारी काम करते हैं. कंपनी आयात को कम करके मुनाफे का अपना मजबूत मॉडल तैयार कर रही है.
1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी देश की पहली छोटी कार बनाना चाहते थे. शुरुआत दिल्ली के गुलाबी बाग में एक वर्कशॉप में हुई, तब संजय ने दोस्तों के साथ मिलकर मोटरसाइकिल के इंजन और जामा मस्जिद के पास की दुकानों से पुर्जे मंगाकर कार बनाने का काम शुरू किया. सरकार ने सितंबर 1970 में आशय-पत्र भी जारी कर दिया और संजय गांधी को साल में 50,000 कारें बनाने की इजाजत मिल गई.
लेकिन जून 1980 में संजय गांधी की मौत हो गई. साल भर बाद इंदिरा गांधी ने दोबारा मारुति को शुरू किया और तकनीक के लिए जापान की सुजुकी कंपनी से सहयोग लिया. बहुतों के लिए मारुति उनकी पहली कार थी. कंपनी ने अब तक 36 नई या नए मॉडल वाली कारें बाजार में उतारी हैं और आरऐंडडी सेंटर में 2,000 करोड़ रु. का निवेश कर चुकी है.
पूरी तैयारी
मारुति अगले 3-5 वर्ष में अपनी क्षमता बढ़ाने और 15 नई कारें बाजार में उतारने के लिए करीब एक अरब डॉलर का निवेश करने की योजना बना रही है. दशक के अंत तक यह सालाना 20 लाख कारों की बिक्री का लक्ष्य बना रही है, जो मौजूदा समय में 12.8 लाख है.

