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संसद की सर्वोच्चता का सवाल

सरकारें अगर अपनी सुविधा के अनुसार संसद के सत्र के कार्यक्रम तय करती हैं या रद्द करती हैं तो यह निश्चित रूप से संसद की सर्वोच्चता को चुनौती देने जैसा ही है.

मेहमान का पन्ना
मेहमान का पन्ना
अपडेटेड 27 नवंबर , 2017

संसद के शीतकालीन सत्र की घोषणा में हो रही देरी गहरी चिंता की वजह बन गई है. अमूमन शीतकालीन सत्र नवंबर के तीसरे हफ्ते में शुरू हो जाता है. संसद के नियमों के मुताबिक, सत्र शुरू होने की घोषणा 15 दिन पहले करना आवश्यक है, ताकि सांसदों को दिल्ली पहुंचने के लिए पर्याप्त समय मिल सके. यह लेख लिखते वन्न्त यानी 21 नवंबर तक इसकी घोषणा नहीं होने का मतलब है कि इस वर्ष शीतकालीन सत्र रद्द भले न किया जाए, मगर संभावना यही है कि सामान्य तौर पर महीने भर के सत्र की अवधि कम हो जाएगी. भाजपा के विरोधियों ने इस देरी पर गंभीर आपत्ति जताई है. राजनैतिक दलों की प्रतिक्रिया अपेक्षित-सी है. आम आरोप यह है कि भाजपा संसद का शीत सत्र या तो नहीं होने देना चाहती या उसमें देरी करना चाहती है, ताकि विपक्ष के उठाए मुद्दों का असर गुजरात में 9 और 14 दिसंबर को होने वाले मतदान के दौरान लोगों पर न पड़े और भाजपा को उसका नुक्सान न उठाना पड़े.

 तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ'ब्रायन ने 30 अक्तूबर को ट्वीट किया, ''क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि शीतकालीन सत्र की तारीख का आज ऐलान होगा? क्या कोई सुन रहा है?" राज्यसभा में कांग्रेस के उपनेता आनंद शर्मा ने कहा, ''प्रधानमंत्री संसद और बहस से भाग रहे हैं... जो कुछ हो रहा है, वह संसद का अपमान है." यहां तक कि सोनिया गांधी ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.

दूसरी ओर, अखबारों में एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री का बयान छपा, ''प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अनेक केंद्रीय मंत्रियों और कांग्रेस के अनेक वरिष्ठ नेताओं सहित बड़ी संख्या में सांसद चुनाव प्रचार में व्यस्त होंगे, जिसका शीतकालीन सत्र पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है. 37 सांसद, जिनमें 26 लोकसभा के और 11 राज्यसभा के शामिल हैं, भी प्रचार में शामिल होंगे; इसलिए सत्र को विलंबित करने की वाजिब वजह है...जब भाजपा और कांग्रेस के अधिकांश नेता गुजरात में व्यस्त होंगे...ऐसी स्थिति में सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी दल के सदस्यों की बड़ी संख्या में गैर-मौजूदगी की वजह से महत्वपूर्ण विधेयकों पर सार्थक बहस तो नहीं हो सकेगी."

अगर संसद का सत्र गुजरात चुनावों के बाद तक टाला जाता है या फिर उसे रद्द कर दिया जाता है, तो बिलाशक यह देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए बड़ा झटका होगा. यहां तक कि भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने भी ट्वीट कर लगभग ऐसी ही भावनाएं व्यक्त कीं, ''अगर गुजरात चुनावों की वजह से संसद का शीतकालीन सत्र आगे कर दिया जाता है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए वाकई एक दुखद परिघटना होगी."

हालांकि यह भी याद रखना चाहिए कि संसद के नियमों में कोई तारीख नियत नहीं है. फिर, पिछले दस शीतकालीन सत्रों को बुलाने की अवधि में भारी अंतर रहा है, जहां 2010 में यह 9 नवंबर को आरंभ हुआ था, तो 2013 में 5 दिसंबर को. 2008 में शीतकालीन सत्र तो रद्द ही कर दिया गया था. सिर्फ एक नियम तय है, और वह यह कि दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए. इस तर्क के आधार पर देखें, तो मॉनसून सत्र का समापन 11 अगस्त को हुआ था, इस लिहाज से फरवरी तक का समय है!

वर्ष 2003, 2008 और 2013 में संसद के शीतकालीन सत्र को दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनावों के कारण विलंबित किया गया था. 2008 में यूपीए सरकार के समय शीतकालीन सत्र को कथित रूप से इसलिए रद्द किया गया था, क्योंकि प्रधानमंत्री देश से बाहर थे. जो कारण बताया गया था, वह गले उतरने लायक नहीं था, इसके बावजूद कोई शोर-शराबा नहीं हुआ था.

इसमें दो राय नहीं कि सरकारें अगर अपनी सुविधा के अनुसार संसद के सत्र के कार्यक्रम तय करने या उसे रद्द करने लगती है तो यह संसद की सर्वोच्चता को चुनौती देने जैसा है. हालांकि इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि संसद की महत्ता में गिरावट आई है, जैसा कि देखा जा सकता है कि पहली लोकसभा (1952-57) के बाद से किस तरह सदन की बैठकों और सत्रों की संख्या कम होती चली गई है. यह भी याद रखना चाहिए कि प्रतिनिधि लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए संसद के नियमित सत्रों में स्वस्थ बहस का होना बेहद जरूरी है.

बहरहाल, यह अच्छा होगा कि हर सत्र के लिए न्यूनतम बैठकों की संक्चया के साथ ही हर संसद सत्र के आरंभ की तारीखें भी नियत की जाएं, ताकि इस मुद्दे के राजनीतिकरण की गुंजाइश कम हो सके. इससे यह आश्वस्त किया जा सकेगा कि नीति और विधेयक पर होने वाली बहस किसी राज्य में होने वाले चुनाव से प्रभावित नहीं होगी. वजह यह भी है कि लगभग हर साल चुनावी कार्यक्रम चलता रहता है और प्रतिकूल असर से सरकारें बचना भी चाहेंगी.

लेखक, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त और एन अनडॉक्युमेंटेड वंडर—मेकिंग ऑफ द ग्रेट इंडियन इलेक्शन के लेखक हैं

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