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डार्क मोड

नजरिया: अफगानिस्तान में वसंत का इंतजार

1992 और 1996 में पाकिस्तान ने अपनी पसंद की मुजाहिदीन और तालिबान सरकारें काबुल में बैठाईं लेकिन उसे इनसे राहत नहीं मिली.

अपडेटेड 13 जनवरी , 2015
अफगानिस्तान के भविष्य पर की जा रही खौफनाक भविष्यवाणियों के विपरीत तालिबानी खतरे को नजरअंदाज करते हुए वहां के नागरिकों ने पिछले साल दो बार वोट दिया ताकि देश में शांतिपूर्ण तरीके से राजनैतिक स्थिरता बहाल हो सके. अफगानी सेना ने देश की सुरक्षा की कमान अमेरिकी नेतृत्व वाले इंटरनेशनल सिक्योरिटी असिस्टेंस फोर्स (आइएसएएफ) से अपने हाथ में ली.

उसके पास न तो विमान थे और न ही सतह पर सुरक्षित आवागमन के बख्तरबंद और सक्षम वाहन, इसके बावजूद उसने 34 प्रांतीय और 348 जिला मुख्यालयों में से एक को भी अपने हाथ से नहीं फिसलने दिया. साढ़े तीन दशक तक विदेशी सेनाओं और प्रशासकों के रहम पर जी चुके अफगानियों को अब खुद को अकेले छोड़े जाने का स्वागत करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि तालिबान के उभार से लडऩे में जो जान और माल की कीमत उन्हें चुकानी होगी, वह बहुत ज्यादा है और संभवतः यहां स्थिरता को टिकने नहीं देगी.

गौर तलब है कि 2014 में करीब 5,000 अफगान सैनिक मारे गए जो कि 2001 में जंग शुरू होने के बाद से मारे गए आइएसएएफ सैनिकों की संख्या से कहीं ज्यादा है. ज्यादातर मौत पर्याप्त चिकित्सीय मदद न मिलने के कारण हुई. तालिबान आज देश भर में फैल चुका है और इनसानी जिंदगियों तथा अथाह पैसे की कीमत पर अब तक किए गए अच्छे कामों के लिए खतरा पैदा कर रहा है (अकेले अमेरिका ने ही यहां जंग में एक खरब डॉलर से ज्यादा रकम झोंकी है और नागरिक सहायता पर 104 अरब डॉलर खर्च किए हैं).

राष्ट्रपति के तौर पर अशरफ गनी के कार्यकाल की शुरुआत अमेरिका और नाटो के साथ मतभेदों को सुलझने से हुई, जिसके लिए उन्होंने द्विपक्षीय सुरक्षा और स्टेटस ऑफ फोर्स पर समझौतों पर दस्तखत किए थे. इसके बाद उन्होंने पाकिस्तान से रिश्ते सुलझाए और चीन के साथ रिश्ते मजबूत बनाए, जिसका इस्लामाबाद की सियासी ताकतों पर खासा असर रहता है. पाकिस्तान के सहयोग के बावजूद अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता को सुनिश्चित करना कठिन होगा, पर उसके बगैर तो यह काम नामुमकिन हो जाएगा.

अपने पाकिस्तान दौरे पर गनी ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात से पहले रावलपिंडी में जनरल रहील शरीफ से बात कर के वहां के विदेश मंत्रालय को सकते में डाल दिया था. वे जानते थे कि समस्या की जड़ कहां है, इसीलिए वे पाकिस्तानी फौज के मुख्यालय गए. उन्होंने अपने मेजबानों से कहा कि दोनों मुल्क अघोषित जंग में मुब्तिला हैं और उन्हें सबसे पहले भरोसा कायम कर के रिश्तों को सामान्य करने की शुरुआत करनी होगी और फिर समयबद्ध तरीके से सहयोग की दिशा में आगे बढऩा होगा.

गनी ने इस्लामाबाद में ऐलान किया था, ‘‘हमने 13 साल की अड़चन को तीन दिन में पार कर लिया है.’’ उनके देश वापस लौटने पर समूचे अफगानिस्तान में बमबारियों का सिलसिला शुरू हो गया और अकेले काबुल में दर्जन भर हमले किए गए. यह तालिबान की ओर से पिछले दो साल में सर्दियों में किया गया पहला अप्रत्याशित हमला था.

पाकिस्तान की फौज अफगानिस्तान में आग को हवा भी दे रही है और आग बुझने में भी लगी है. इस तरह वह वहां एक ऐसे खेल में फंस चुकी है जिसमें हर बार खुद को दुरुस्त करने के चक्कर में वह अपने नए दुश्मन पैदा कर देती है. उसने अफगान विरोधी औैर भारत विरोधी ‘‘अच्छे’’ तालिबान और आतंकी समूहों को पाला-पोसा है तो पाकिस्तान विरोधी ‘‘बुरे’’ तालिबानों पर हमला किया है.

पेशावर में 16 दिसंबर को हुए स्कूली बच्चों के नृशंस कत्लेआम के बाद नवाज शरीफ  ने संकल्प व्यक्त किया था कि ‘‘हम दोनों के बीच अब फर्क नहीं करेंगे.’’ अफगानियों को अब भी देखना बाकी है कि पाकिस्तानी फौज इस वादे पर टिकी रहती है या नहीं.

अगर पाकिस्तान की कबाइली सरहद से तालिबान ने कोई हमला नहीं किया और अफगानिस्तान की पहुंच हक्कानी तथा शूरा के क्वेटा नेतृत्व तक हो गई, तो पाकिस्तानी फौज का इम्तिहान इसी बसंत में हो जाना है. अगर पाकिस्तान ने वही पुरानी दलीलें दीं कि ये आतंकी उसकी धरती पर मौजूद नहीं हैं (भले ही वे हों), वे पाकिस्तानी फौज या आइएसआइ के कहने में नहीं हैं या फिर कुछ ऐसे आतंकी समूह हो सकते हैं जिनका आइएसआइ से संपर्क हो लेकिन वे बुरे तत्वों के साथ हैं-तब गनी अपने हिसाब से इसके निष्कर्ष निकालने को स्वतंत्र होंगे.

पाकिस्तान ने 1992 और 1996 में अपनी पसंद की मुजाहिदीन और तालिबान सरकारें काबुल में बैठाईं, बावजूद इसके उसे इनसे कोई राहत नहीं मिली. अफगानिस्तान अगर खुलकर सामने आ गया तो ऐसी कोई स्थिति नहीं बनेगी जिसमें पाकिस्तान को राहत रहे हालांकि पाकिस्तानी फौज तब भी फायदे में ही रहेगी. गनी का उद्देश्य एक मजबूत, स्थिर और संप्रभु अफगानिस्तान का निर्माण है और भारत भी यही चाहता है.

उनके पास अपनी रणनीति से इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पर्याप्त छूट होनी ही चाहिए. भारत उसके साथ मानव संसाधन विकास और संस्थाओं के निर्माण के मामले में साझेदारी जारी रखेगा और अफगानिस्तान को उस तरीके से सहयोग देता रहेगा जैसा वहां की जनता और सरकार चाहेगी.

सार्क सम्मेलन से पहले गनी की जल्दबाजी में होने जा रही भारत यात्रा को आगे बढ़ाकर औैर गर्मियों की शुरुआत में बाकायदा एक विस्तृत राजकीय दौरे में तब्दील कर अफगानिस्तान और भारत के अफसरों ने अच्छा ही किया है. तब तक वहां की जमीनी हकीकत का भारत को साफ अंदाजा भी मिल जाएगा और वह अपनी नीति का उसी हिसाब से अनुकूलन कर लेगा. भारत को भी बाकी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की तरह अफगानिस्तान के संदर्भ में एक दीर्घकालिक नजरिए की जरूरत है, जिसमें धैर्य, दृढ़ता और दीर्घकालिक संलग्नता के तत्व समाहित हों.
 
(जयंत प्रसाद अफगानिस्तान में पूर्व भारतीय राजनयिक हैं)
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