जब तक यह कॉलम छपकर आए, तब तक मुमकिन है केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) के इतिहास के एक भूलने लायक अध्याय का पटाक्षेप हो चुका हो. मुझे इस बात पर बड़ा ही अफसोस हो रहा है कि मौजूदा सीबीआइ प्रमुख रंजीत सिन्हा बड़े बेआबरू होकर विदा हो रहे हैं. हालांकि तत्कालीन यूपीए सरकार ने उनके चयन को इस आधार पर ही तर्कसंगत बताया था कि वे देश में इस पद के लिए उपलब्ध अफसरों में वरिष्ठतम थे. ब्यूरो में भी कई लोग उनके विदा होने से राहत की सांस लेंगे.
जहां तक मैंने सुना है, उसके हिसाब से सिन्हा किसी भी मामले में अंतिम आदेश देते वक्त अपने कनिष्ठ अफसरों की सारी समझ को धता बताते हुए अकेले ही खांचा खींचने में यकीन रखते थे. मिसाल के तौर पर यह यकीन करना मुश्किल है कि कोयला घोटाले की जांच करने वाला कोई भी अफसर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से पूछताछ न करके संतुष्ट रह सकता था. यह कैसे मुमकिन था भला, जबकि मनमोहन सिंह उस समय कोयला मंत्रालय का भी काम देख रहे थे.
एक विशेष अदालत की हाल ही में की गई टिप्पणी के संदर्भ में यह जानना दिलचस्प होगा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री को सीबीआइ की जिरह से बचाए रखने का फैसला सीबीआइ प्रमुख ने अपनी ओर से किया था या फिर इसके पीछे एक तरह की सर्वानुमति थी.
इस जांच एजेंसी में किसी भी मामले में अंतिम निर्णय लिए जाने से पहले चार या पांच स्तरों पर अधिकारी लिखित में उसके बारे में अपनी राय देते हैं. निदेशक स्तर के किसी अधिकारी के लिए भी अपने सारे अधीनस्थों की राय को दरकिनार करके एक प्रत्यक्षतया उलटा फैसला लेना बड़ी हिम्मत का काम है.
मैं अगर यह मान लूं कि उनके सारे के सारे विवादास्पद फैसले ईमानदारी से लिए गए होंगे, तो भी मेरे लिए उनका पक्ष ले पाना बड़ा मुश्किल है. ऐसा नहीं हो सकता कि आप बीच धारा में नाव को बुरी तरह हिला डालें और फिर भी सुरक्षित तनकर खड़े रहें. यह सिन्हा की बेढंगी शैली थी और यही उनके पतन का कारण बनी.
मेरे लिए यह समझ पाना भी मुश्किल है कि क्यों उन्होंने उन तमाम अवांछनीय लोगों से बार-बार मिलना पसंद किया जो जांच से जुड़े हुए और संदेह के घेरे में थे. इससे यही सबक मिलता है कि या तो आप अपने यहां आने-जाने वालों का ब्योरा न रखें या फिर केवल ऐसे सम्मानित लोगों से ही मिलें जिनकी ईमानदारी पर कोई संदेह न किया जा सके. जाहिर है कि सीबीआइ निदेशक सिन्हा के मामले में ऐसा नहीं हुआ.
रंजीत सिन्हा प्रकरण उनसे पहले के सीबीआइ निदेशकों के लिए भी तगड़ा झटका है. यह उन लोगों के लिए भी झटका है जो लगातार सीबीआइ की स्वायत्तता की मांग उठाते आए हैं. सीबीआइ के इस्तेमाल में किसी भी सरकार ने कोई कोताही नहीं बरती है. यह बात भी किसी से छुपी हुई नहीं है.
लगता है, किसी भी सरकार को सीबीआइ को यह बताने में बड़ा मजा आता है कि उसे क्या करना चाहिए, क्या नहीं. ऐसे में लाख टके का सवाल यही है कि उस एजेंसी से कैसे उसका बेहतरीन काम कराया जाए जिसमें न्यायपालिका और आम आदमी, दोनों का अटूट भरोसा है. हकीकत यही है कि काफी कीचड़ उछाले जाने के बावजूद सीबीआइ ने राज्यों की पुलिस से उसके पास आए कई मामलों को बड़े सलीके से सुलझाया है.
मूल रूप से जिसकी परिकल्पना सरकार के भ्रष्टाचार-निरोधी अंग के रूप में की गई थी, वह कालांतर में बड़ी संख्या में अनसुलझे अपराधों के चलते पैदा हुए अविश्वास को पाटने के क्रम में अपराध सुलझाने वाली एक शाखा बन गई.
सीबीआइ में ऐसे निष्ठावान अफसरों की कतार है जिनके सामने भावी करियर के तौर पर देखने को कोई बड़ी संभावनाएं नहीं हैं. पद पर रहते हुए वे एफबीआइ समेत दुनिया के किसी भी देश की जांच एजेंसी जितनी ही दक्षता दिखाते हैं. उनका उम्दा काम किसी काबिल नेतृत्व में ही नजर आता है.
लिहाजा एजेंसी के लिए यह जरूरी है कि आइपीएस अधिकारियों में से कोई सर्वश्रेष्ठ उन्हें उनके काम के मामले में रास्ता दिखाए. सिन्हा का उत्तराधिकारी चुनते समय नई सरकार को बेहद सावधानी से आगे बढऩा होगा और ऐसा अधिकारी चुनना होगा जो न केवल योग्य और ईमानदार हो बल्कि अपने मातहतों के सामने उम्दा मिसाल पेश कर सके. ऐसे कई लोग सेवा में हैं और उनमें से कोई एक चुनना मुश्किल काम नहीं. लेकिन मसला यह है कि ऐसा कुशल चयन भर कर लेने से एजेंसी की प्रतिष्ठा नहीं लौटेगी.
हम सुप्रीम कोर्ट की वह अद्भुत टिप्पणी नहीं भूल सकते कि 'सीबीआइ महज सरकार का पिंजरे में बंद तोता है’. जो लोग सीबीआइ को कामकाज में ज्यादा आजादी देने के खिलाफ हैं, वे इस बात से डरे रहते हैं कि सीबीआइ एक बेकाबू मिसाइल बन जाएगी जो सरकार के भीतर और बाहर बड़े नामों को निशाने पर ले लेगी. यह शुद्ध रूप से एक भुलावा है. सीबीआइ के स्वायत्त होने का मतलब उसका गैरजिम्मेदार और गैरजवाबदेह होना नहीं है.
सीबीआइ कानून के दायरे के बाहर एक स्वेच्छाचारी संगठन तो नहीं हो सकता ना. तंत्र में ऐसे कई तरीके हैं जिनसे किसी बेकाबू जांच एजेंसी को काबू में रखा जा सके. यह एक ऐसा नाजुक संतुलन है जो कोई होशियार और ईमानदार सरकार ही कायम कर सकती है. मुझे यकीन है कि एनडीए सरकार के पास यह संतुलन हासिल करने की काबिलियत है.
आर.के. राघवन सीबीआइ के पूर्व निदेशक हैं.
जहां तक मैंने सुना है, उसके हिसाब से सिन्हा किसी भी मामले में अंतिम आदेश देते वक्त अपने कनिष्ठ अफसरों की सारी समझ को धता बताते हुए अकेले ही खांचा खींचने में यकीन रखते थे. मिसाल के तौर पर यह यकीन करना मुश्किल है कि कोयला घोटाले की जांच करने वाला कोई भी अफसर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से पूछताछ न करके संतुष्ट रह सकता था. यह कैसे मुमकिन था भला, जबकि मनमोहन सिंह उस समय कोयला मंत्रालय का भी काम देख रहे थे.
एक विशेष अदालत की हाल ही में की गई टिप्पणी के संदर्भ में यह जानना दिलचस्प होगा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री को सीबीआइ की जिरह से बचाए रखने का फैसला सीबीआइ प्रमुख ने अपनी ओर से किया था या फिर इसके पीछे एक तरह की सर्वानुमति थी.
इस जांच एजेंसी में किसी भी मामले में अंतिम निर्णय लिए जाने से पहले चार या पांच स्तरों पर अधिकारी लिखित में उसके बारे में अपनी राय देते हैं. निदेशक स्तर के किसी अधिकारी के लिए भी अपने सारे अधीनस्थों की राय को दरकिनार करके एक प्रत्यक्षतया उलटा फैसला लेना बड़ी हिम्मत का काम है.
मैं अगर यह मान लूं कि उनके सारे के सारे विवादास्पद फैसले ईमानदारी से लिए गए होंगे, तो भी मेरे लिए उनका पक्ष ले पाना बड़ा मुश्किल है. ऐसा नहीं हो सकता कि आप बीच धारा में नाव को बुरी तरह हिला डालें और फिर भी सुरक्षित तनकर खड़े रहें. यह सिन्हा की बेढंगी शैली थी और यही उनके पतन का कारण बनी.
मेरे लिए यह समझ पाना भी मुश्किल है कि क्यों उन्होंने उन तमाम अवांछनीय लोगों से बार-बार मिलना पसंद किया जो जांच से जुड़े हुए और संदेह के घेरे में थे. इससे यही सबक मिलता है कि या तो आप अपने यहां आने-जाने वालों का ब्योरा न रखें या फिर केवल ऐसे सम्मानित लोगों से ही मिलें जिनकी ईमानदारी पर कोई संदेह न किया जा सके. जाहिर है कि सीबीआइ निदेशक सिन्हा के मामले में ऐसा नहीं हुआ.
रंजीत सिन्हा प्रकरण उनसे पहले के सीबीआइ निदेशकों के लिए भी तगड़ा झटका है. यह उन लोगों के लिए भी झटका है जो लगातार सीबीआइ की स्वायत्तता की मांग उठाते आए हैं. सीबीआइ के इस्तेमाल में किसी भी सरकार ने कोई कोताही नहीं बरती है. यह बात भी किसी से छुपी हुई नहीं है.
लगता है, किसी भी सरकार को सीबीआइ को यह बताने में बड़ा मजा आता है कि उसे क्या करना चाहिए, क्या नहीं. ऐसे में लाख टके का सवाल यही है कि उस एजेंसी से कैसे उसका बेहतरीन काम कराया जाए जिसमें न्यायपालिका और आम आदमी, दोनों का अटूट भरोसा है. हकीकत यही है कि काफी कीचड़ उछाले जाने के बावजूद सीबीआइ ने राज्यों की पुलिस से उसके पास आए कई मामलों को बड़े सलीके से सुलझाया है.
मूल रूप से जिसकी परिकल्पना सरकार के भ्रष्टाचार-निरोधी अंग के रूप में की गई थी, वह कालांतर में बड़ी संख्या में अनसुलझे अपराधों के चलते पैदा हुए अविश्वास को पाटने के क्रम में अपराध सुलझाने वाली एक शाखा बन गई.
सीबीआइ में ऐसे निष्ठावान अफसरों की कतार है जिनके सामने भावी करियर के तौर पर देखने को कोई बड़ी संभावनाएं नहीं हैं. पद पर रहते हुए वे एफबीआइ समेत दुनिया के किसी भी देश की जांच एजेंसी जितनी ही दक्षता दिखाते हैं. उनका उम्दा काम किसी काबिल नेतृत्व में ही नजर आता है.
लिहाजा एजेंसी के लिए यह जरूरी है कि आइपीएस अधिकारियों में से कोई सर्वश्रेष्ठ उन्हें उनके काम के मामले में रास्ता दिखाए. सिन्हा का उत्तराधिकारी चुनते समय नई सरकार को बेहद सावधानी से आगे बढऩा होगा और ऐसा अधिकारी चुनना होगा जो न केवल योग्य और ईमानदार हो बल्कि अपने मातहतों के सामने उम्दा मिसाल पेश कर सके. ऐसे कई लोग सेवा में हैं और उनमें से कोई एक चुनना मुश्किल काम नहीं. लेकिन मसला यह है कि ऐसा कुशल चयन भर कर लेने से एजेंसी की प्रतिष्ठा नहीं लौटेगी.
हम सुप्रीम कोर्ट की वह अद्भुत टिप्पणी नहीं भूल सकते कि 'सीबीआइ महज सरकार का पिंजरे में बंद तोता है’. जो लोग सीबीआइ को कामकाज में ज्यादा आजादी देने के खिलाफ हैं, वे इस बात से डरे रहते हैं कि सीबीआइ एक बेकाबू मिसाइल बन जाएगी जो सरकार के भीतर और बाहर बड़े नामों को निशाने पर ले लेगी. यह शुद्ध रूप से एक भुलावा है. सीबीआइ के स्वायत्त होने का मतलब उसका गैरजिम्मेदार और गैरजवाबदेह होना नहीं है.
सीबीआइ कानून के दायरे के बाहर एक स्वेच्छाचारी संगठन तो नहीं हो सकता ना. तंत्र में ऐसे कई तरीके हैं जिनसे किसी बेकाबू जांच एजेंसी को काबू में रखा जा सके. यह एक ऐसा नाजुक संतुलन है जो कोई होशियार और ईमानदार सरकार ही कायम कर सकती है. मुझे यकीन है कि एनडीए सरकार के पास यह संतुलन हासिल करने की काबिलियत है.
आर.के. राघवन सीबीआइ के पूर्व निदेशक हैं.

