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नरेंद्र मोदी: संघ और बीजेपी से बड़ा कद

ऐसा लगता है कि मोदी उससे भी ज्यादा शक्तिशाली स्थिति में हैं जिसमें वाजपेयी 1996 में थे. वे आरएसएस और बीजेपी की संगठित शक्ति से भी ज्यादा ताकत के साथ आगे की ओर बढ़ रहे हैं.

अपडेटेड 24 फ़रवरी , 2013

पश्चिमी देशों और भारत के बीच लोकतांत्रिक राजनीति के तौर-तरीके में काफी फर्क है. इसमें सबसे अहम है कि राजनैतिक वर्ग जनता के विचार का किस तरह आकलन कर उस पर प्रतिक्रिया जताता है. पश्चिम में चुनाव संबंधी जनमत सर्वेक्षणों और अहम मतदाता समूहों पर बहुत ज्यादा निर्भरता दिखाई देती है और इन्हीं (महंगी) कसरतों से निकले नतीजों से राजनैतिक फैसले आकार लेते हैं. कहा जाता था कि टोनी ब्लेयर चुनावी भविष्यवाणियों, स्पिन डॉक्टर और चार्ट के रंगों पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे.

दूसरी तरफ, भारतीय नेता अपनी सहज सूझ-बूझ से काम लेते हैं. जनमत सर्वेक्षणों की असमान क्वालिटी और सार्थक ढंग से उनकी व्याख्या करने में नाकामी की वजह से राजनैतिक फीडबैक में हमेशा लफ्फाजी शामिल हो जाती है. ऐसे में केवल समझदार और होशियार नेता ही प्रतिबद्ध लोगों की प्राथमिकता और आम आदमी की आकांक्षाओं के बीच बखूबी फर्क कर सकता है.

जब से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी तीसरी चुनावी पारी जीती है, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेताओं को देशभर में फैले कार्यकर्ताओं से भारी संख्या में प्रासंगिक ब्योरे मिल रहे हैं. वे सब एक स्पष्ट संदेश की ओर इशारा करते हैं: पार्टी के स्वाभाविक समर्थकों का एकमत आग्रह है कि 2014 के लिए (या जब भी आम चुनाव हों) बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मोदी को ही बनाया जाए. चाहे वह मध्य भारत हो, जहां बीजेपी की व्यापक उपस्थिति है, या पूर्वी भारत, जहां उसकी उपस्थिति नाममात्र है, सब तरफ मोदी के के नाम का आह्वान सुनाई दे रहा है. कहा जा रहा है कि कार्यकर्ताओं और मतदाताओं, दोनों को केवल वही प्रेरित कर सकते हैं और जीत सकते हैं.

हाल की घटनाओं में सहज प्रतिक्रियाओं को आत्मतुष्ट भविष्यवाणी में तब्दील होते हुए साफ देखा जा सकता है. बीजेपी के राष्ट्रीय मुख्यालय में 25 जनवरी को दिल्ली में मोदी के सम्मान में आयोजित सभा में कार्यकर्ता ''पीएम, पीएम'' जप रहे थे. दिल्ली में 6 फरवरी को श्रीराम कॉलेज ऑफ कामर्स (एसआरसीसी) में छात्रों के सामने मोदी ने अपने भाषण के जरिए युवाओं तक यह संदेश पहुंचाया कि उनके दर्शन का अनुसरण सिर्फ गुजरात के युवाओं तक ही सीमित नहीं रहने वाला. मीडिया ने जिस तरह जमकर उनके भाषण को कवरेज दी उससे राजनैतिक पंडितों को अचानक एहसास हुआ कि मोदी प्रखर राष्ट्रवाद के प्रतीक से हटकर कुछ अलग अवतार में खुद को पेश कर रहे थे: वे युवा और ग्लोबलाइज्ड भारत की उम्मीदों का सार पेश कर रहे थे. उनके आशावाद का मंत्र मध्यम वर्ग पर कुंडली मारे बैठी कुंठा और राजनीति के प्रति पनपे रोष का समाधान बन कर सामने आया है.

एसआरसीसी में भाषण देने से पहले मोदी ने यूरोपीय देशों के राजदूतों के साथ लंच किया था—इसकी वजह से मुख्यमंत्री राजनयिक अस्पृश्यता से अंतत: उबर गए. यह संकेत है कि मोदी अब 'सामान्य' नेता माने जा रहे हैं, एक ऐसा शख्स जिस पर जिम्मेदारी डाली जाए और उसे निभाने के लिए तैयार किया जाए.

राष्ट्रीय परिदृश्य पर दर्ज हो रही मोदी की सशक्तमौजूदगी का सबसे अहम बिंदु था बीजेपी की फीकी पड़ रही छवि—माना तो यह भी जा रहा है कि उनके ही डर से अफजल गुरु को आनन-फानन फांसी पर लटका दिया गया. बीजेपी के दिग्गज नेता और नागपुर में उनकी कमान थामे बैठे सारथियों का सारा ध्यान लंबे समय तक नितिन गडकरी के मामले में उलझ रहा. अंतिम घड़ी में ही सही लेकिन 'सामाजिक उद्यमी' को हटाकर राजनाथ सिंह—मेहनती व्यक्ति,जिन्हें अपनी उपलब्धियों के बराबर का मुकाम हासिल नहीं हुआ—को अध्यक्ष बनाने का फैसला करने के बाद भी पार्टी के हाथ-पांव ठंडे हो रहे हैं.

लोकप्रियता के दृष्टिकोण से देखा जाए तो मोदी ने सबको पीछे छोड़ दिया है. यह भी माना जा रहा है कि बिहार में नीतीश कुमार (जिनकी अपनी 'माइनॉरिटी' मजबूरियां हैं) को छोड़कर एनडीए के शेष गठबंधन सहयोगियों ने 2014 में यूपीए का सामना करने के लिए मोदी की अगुआई के लिए सहमति दे दी है. फिर भी, अभी औपचारिक फैसले की प्रक्रिया बाकी है, क्योंकि आरएसएस के कुछ नेता मोदी के उग्र 'व्यक्तिवाद' से आशंकित हैं.

यह दिलचस्प समस्या है. आरएसएस मोदी को अयोध्या में राम मंदिर बनाने की मांग समेत संघ परिवार की सारी प्राथमिकताओं के लिए किए जाने वाले महती प्रयास की मुख्य कमान देना चाहता है. लेकिन यह भी साफ दिख रहा है कि मोदी को मिलने वाला अपार समर्थन उनके आर्थिक प्रबंधन कौशल, आधुनिकतावादी दृष्टि और भारत को विश्व में अग्रणी बनाने के दृढ़ निश्चय और उससे भी बढ़कर उनकी गंभीर नेतृत्व क्षमता पर टिका है.

बड़ी दिलचस्प बात है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी को नेता चुना गया तब उन्हें भी ऐसी ही विरोधाभासी स्थितियों का सामना करना पड़ा था. लेकिन वाजपेयी की लोकप्रियता उस दुरूह विचारधारा पर कहीं ज्यादा भारी थी. अगर जनमत सर्वेक्षण और समीक्षा से निकले नतीजे कोई संकेत देते हैं तो मोदी वाजपेयी की 1996 की स्थिति से कहीं अधिक सशक्तदिख रहे हैं. वे ऐसी ताकत से शीर्ष की ओर बढ़ रहे हैं जो आरएसएस और बीजेपी की संगठित शक्ति से भी ज्यादा सामर्थ्र्यशाली है. ऐसे में अगर मोदी को कोई रोक सकता है तो वह खुद मोदी ही हैं.

स्वप्न दासगुप्ता राजनैतिक समीक्षक हैं

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