scorecardresearch
डार्क मोड

संघ अपनों को ही नहीं संभाल पा रहा

जब जनसंघ बना उसी समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर उर्फ  गुरुजी ने आपसी संबंधों का सिद्धांत भी सुनिश्चित किया. वह क्या था? इसे जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि एक समय के बाद बीजेपी में जनसंघ का रूपातंरण हो गया.

मोहन भागवत, नितिन गडकरी, नरेंद्र मोदी
मोहन भागवत, नितिन गडकरी, नरेंद्र मोदी
अपडेटेड 27 जनवरी , 2013

जब जनसंघ बना उसी समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर उर्फ  गुरुजी ने आपसी संबंधों का सिद्धांत भी सुनिश्चित किया. वह क्या था? इसे जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि एक समय के बाद बीजेपी में जनसंघ का रूपातंरण हो गया. इसे जान लेने पर बीजेपी-संघ संबंधों को स्पष्टतया समझ जा सकेगा. इनके संबंधों का मार्गदर्शक सिद्धांत है, परस्पर विचार विनिमय हो, उससे निर्णय प्रक्रिया निकले. कोई किसी पर हावी होने या किसी के मामले में हस्तक्षेप करने का प्रयास न करे. जब कभी इसका उल्लंघन होता है तो समस्या पैदा होती है.

'2014 में नेतृत्‍व की बात अभी असमय है'
बीजेपी और संघ के संबंधों में जटिलता और समस्यामूलक प्रवृत्तियां कोई नई नहीं हैं. कम-से-कम 17 साल पुरानी है. इसकी एक घटना 1996 की है, जब राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने बीजेपी को सरकार बनाने के लिए न्यौता दिया, तब अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने अपने सहयोगियों से बिना विचार किए रजामंदी दे दी. यह उदाहरण बीजेपी का है. जो नेतृत्व अपने सहयोगियों से विचार करने से कतराता है, कैसे मान लिया जाए कि वह संघ नेतृत्व से विचार विमर्श करेगा?

किसी भी लोकतांत्रिक संगठन में विचार विनिमय से सहमति पर पहुंचने की पद्धति अपनाई जाती है. इसे 1947 से पहले कांग्रेस ने अपनाया और महात्मा गांधी के नेतृत्व में इसी प्रक्रिया से निर्णय लिए जाते थे. आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे तोड़ा. करीब-करीब यही तरीका एनडीए शासन में वाजपेयी ने अपनाया.

आरएसएस: दोराहे पर परिवार
मुझे याद है कि पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर कहा करते थे, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक शक्ति है.” एनडीए शासन में उन्होंने कहना शुरू किया, “वाजपेयी संघ को कमजोर कर रहे हैं और संघ तमाशा देख रहा है.” जाहिर है, वे उन नीतियों की बात कर रहे थे जिस पर एनडीए के फैसले होते थे. उन फैसलों में बीजेपी से भी परामर्श नहीं होता था. यह सवाल उठाने पर गोविंदाचार्य का क्या हश्र हुआ, हम जानते हैं.

संघ और बीजेपी में एनडीए शासन के दौरान तो नहीं ठनी लेकिन गांठ बन गई थी. 2005 में लालकृष्ण आडवाणी ने अपने सहयोगियों से बिना विचार किए पाकिस्तान की यात्रा की और फिर जिन्ना विवाद हुआ. लेकिन सवाल है कि जिस संघ ने उन्हें बीजेपी के अध्यक्ष पद से हटाया,  उसी ने उन्हें क्यों प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार माना. इसका जवाब संघ के पास नहीं है.

गांधीवादी समाजवाद से एकात्म मानववाद का सिद्धांत ही जनसंघ का बीजेपी में रूपांतरण है. जनसंघ छोटी पार्टी थी, पर अब बीजेपी का बहुत विस्तार हो गया है. इसमें संघ के जो भी कार्यकर्ता हैं वे संघमय कम, बीजेपीमय ज्यादा हैं. संघ की यह बड़ी समस्या है यानी वह अपने कार्यकर्ताओं को संभाल नहीं पा रहा है. नितिन गडकरी से संघ ने नई शुरुआत की. लेकिन तस्वीर सामने है.

संघ और बीजेपी के संबंधों पर दो तरह की बहस चलती है. जो इनके अंतर-संबंधों को जानते हैं, उनके विचार का छोर उनसे भिन्न होता है जो जानकर भी अनजान बने रहते हैं, जो जानते हैं कि उनकी शिकायत सीधे संघ से है. जो अनजान बने रहते हैं, वे यह उपदेश देते हैं कि संघ बीजेपी में हस्तक्षेप बंद करे और उसे एक मुकम्मल राजनैतिक पार्टी बनने दे. यह धारणा बना दी गई है कि आरएसएस अक्सर बीजेपी में हस्तक्षेप करता है. क्या यही आरोप 1934 के बाद महात्मा गांधी पर कांग्रेस के मुताबिक नहीं चस्पां हो जाता है?

बीजेपी की विडंबना है कि वह इसी व्यवस्था में अब अपनी जगह खोज रही है और संघ उसे परिवर्तन की पार्टी नहीं बना पा रहा. वह अगर अपने उन कार्यकर्ताओं को ठीक से संभाले जो बीजेपी में हैं तो यह पार्टी पथभ्रष्ट होने से बच सकती है. सरसंघचालक मोहन भागवत की टीम यही प्रयास कर रही है. देर से ही सही, दुरुस्त कदम उठाया गया है. 

ADVERTISEMENT
Advertisement