हाल की लिंगभेद पर चर्चा ने सही मायने में हमारा ध्यान बॉलीवुड और पर्दे पर परोसी जा रही औरत की छवि की ओर खींचा है. सृजनात्मक अभिव्यक्ति के नाम पर जो भी परोसा जा रहा है, अगर निजी तौर पर वह मुझे फूहड़ और अरुचिपूर्ण भी लगता है तो भी किसी न्यायाधीश की तरह उसके बारे में अंतिम फैसला सुनाने से मुझे परहेज है.
मैंने अक्सर इस रवैए पर सवाल किया है; क्या यह गलत है? एक लेखिका होने के नाते निश्चित तौर पर इस फैसले में मेरा स्त्री होना भी मायने रखता है. वैसे भी खुद एक औरत होकर अपनी लेखनी का इजहार फिल्म जैसे माध्यम में करते वक्त निश्चित ही मुझे कुछ तो जिम्मेदारी उठानी ही होगी, जहां औरत और मर्द में फर्क किया जाता है.
कहानी कहने की छटपटाहट हजारों हैं तो उन्हें पेश करने के जरिए भी बेशुमार. खासकर फिल्म जैसे माध्यम में, जहां लोग परस्पर सहयोग से काम करते हैं. जहां कई एजेंडे और बेहिसाब पैसा जुड़ा है. फिल्मी दुनिया में अपने बहुत छोटे-से करियर के अनुभव से मुझे जो बात समझ में आई, वह यह कि फिल्म बनाने के पीछे सबसे बड़ा कारण है, ‘‘फिल्म को खूब पैसा कूटना चाहिए.’’ जाहिर है कि हमारा नजरिया और अनुभव उन लोगों की संगति में पनपता है, जिनके साथ हमारा मेलजोल है. अब दूसरों के लिए यह प्रेरणा है या बाध्यता, मैं कह नहीं सकती, लेकिन अपने बारे में यही कहना चाहूंगी कि यह एक ऐसा एहसास है, जो मुझे कलम उठाने के लिए मजबूर कर देता है.
शुरुआत होती है कहानी से, जो किसी भी फिल्म की बुनियाद है. उसी पर पूरी फिल्म तैयार होती है. फिर आती हैं कुछ हल्की-फुल्की सलाहें जैसे, एक औरत का किरदार जरूरी है. भई आम लोगों को वही चाहिए और मुख्यधारा की फिल्में पैसा न बटोरें तो क्या फायदा? किरदार भी ऐसा हो, जो पुरुष प्रोड्यूसर की कल्पना में बसी औरत की इमेज को साकार करे. दूसरी ओर, आम लोगों को खुश करने के लिए चारित्रिक तौर पर उसका भारतीय मर्यादा की मूर्ति होना बहुत जरूरी है, लेकिन पहनावे की खुली छूट है. खैर वह तो एक दूसरा ही पहलू है.
जहां तक उसकी भावनात्मक स्थिति का सवाल है तो वह कितने ही मजबूत व्यक्तित्व और दृढ़ इच्छाशक्ति की स्वामिनी क्यों न हो, फिल्म के अंत में उसे टूटकर हीरो के आगे समर्पण करना ही होगा. उसे मर्द किरदार को लुभाना होगा. अगर आपको हीरो को फिल्म में काम करने के लिए राजी करना है तो जाहिर है उसकी भूमिका हीरोइन के मुकाबले लंबी रखनी होगी. आखिरकार फिल्में उसी के नाम से तो चलती हैं. इस तरह ऐसे सशर्त ढांचे के भीतर अपनी कहानी कहनी है.
हर प्रोड्यूसर को एक खास ट्रैक तैयार रखना होता है, जिसमें हीरो की डेट के हिसाब से फेरबदल किया जाता है. हीरोइन की बारी तो बाद में आती है, जिसे लुभाने के लिए सुपर स्टार का नाम ही काफी है. सुपर स्टार को ‘सूट’ करने वाली हीरोइन बहुत कम हैं और उसमें भी प्रतिस्पर्धा बहुत कड़ी है.
मुख्यधारा की बड़े बजट वाली फिल्में अमूमन ऐसे ही ढांचे में गढ़ी जाती हैं. इसलिए बॉलीवुड में औरतों को पेश किए जा रहे तरीके पर कड़ी नजर डालना और भी जरूरी तथा महत्वपूर्ण हो जाता है. आसपास की परिस्थितियां भी स्त्री चरित्र में किसी भी तरह के बदलाव के विरुद्ध हैं. दर्शकों की भूमिका इसमें बहुत अहम है. लिहाजा उनके बारे में भी सोचना होगा. मैं श्फिल्में समाज का आईना होती हैं’ की सोच को नहीं मानती. फिल्में खालिस मनोरंजन का सामान हैं. पैसे खर्च कर सिनेमाघर में आ रहा शख्स ‘70 एमएम’ का आईना देखने कतई नहीं आता. वैसे भी यह एक ऐसी कला है, जो डंके की चोट पर कहती है कि इसके लिए दर्शक ही माई-बाप है. उपन्यास लेखन से फिल्मों की राह पर चल पडऩे के बाद सबसे पहला धक्का मुझे तब लगा, जब मैंने खुल्लम-खुल्ला दर्शकों को खुश करने की दलीलें सुनीं.
मेरे कदम दिल्ली के नामचीन साहित्यकारों की सार्थक-सुरुचिपूर्ण महफिलों, जहां किताबों को मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि पाठकों के विचार मंथन के लिए सौंपा गया ‘कर्म’ माना जाता है, से बिल्कुल अलग दिशा में मुड़ चुके थे.
फिल्म देखने पहुंचने वाले लोगों में ज्यादातर चेहरे मर्द होते हैं और वही रहेंगे. मल्टीप्लेक्स में स्त्री-पुरुष लगभग बराबर दिख सकते हैं. लेकिन इससे कोई मुगालता न पालें. 100 करोड़ रु. का बिजनेस पार करने के लिए फिल्मों को सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में कामयाब होना पड़ता है जहां बहुसंख्यक दर्शक पुरुष होते हैं. महिलाओं में सार्वजनिक जगहों के प्रति जो असुरक्षा की भावना है, वह सीधे तौर पर फिल्म देखने जा रही भीड़ के स्त्री-पुरुष अनुपात में दिखाई देती है. टीवी के कार्यक्रम स्त्री केंद्रित हैं, जिनका आनंद घर के सुरक्षित और निश्चित माहौल में उठाया जा सकता है, जहां स्वाभाविक रूप से महिला दर्शक ही मौजूद हैं.
पर बदलाव की आहट सुनाई दे रही है. कामकाज के मोर्चे पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है और वे आर्थिक फैसले लेने लगी हैं. इंग्लिश-विंग्लिश और कहानी जैसी फिल्मों ने न सिर्फ मनोरंजन किया, बल्कि पैसे भी कमाए. फिल्मों के असर का आकलन करना तो उचित है, लेकिन हमारे बीच घूम रहे जानवर की प्रकृति को समझने में हो रही चूक का क्या? समय है बदलाव की ऐसी जमीन तैयार करने का, जहां जड़ों से मानवीयता का अंकुर फूटे और आगाज हमसे ही हो. फिर मेरे लिए आसान क्या है? आज अपने ही बोझ तले बोझिल हो जाना और कल के बदलाव का मसीहा बन कर इतराना? जो भी हो, मैं जो कहानी लिखना चाहती हूं, वही लिखूंगी. फिल्म बने या न बने.
लेखिका ने हाल में ही फिल्म कहानी के लिए सर्वश्रेष्ठ स्टोरी का अवॉर्ड जीता है

