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डार्क मोड

मर्द यही समझते हैं कि वे बच निकलेंगे

राजधानी में 23 वर्षीया लड़की के साथ हुई रेप की घटना जता रही है कि सामाजिक तौर पर हम एक ऐसे पतन की ओर बढ़ रहे हैं जहां हर आदमी अपनी खुदी में जी रहा है. जो उसके मन ने चाहा उसे चाहिए-कार, पैसा या औरत.

अपडेटेड 10 जनवरी , 2013

राजधानी में 23 वर्षीया लड़की के साथ हुई रेप की घटना जता रही है कि सामाजिक तौर पर हम एक ऐसे पतन की ओर बढ़ रहे हैं जहां हर आदमी अपनी खुदी में जी रहा है. जो उसके मन ने चाहा उसे चाहिए-कार, पैसा या औरत. अगर जायज तरीके से ये हासिल नहीं तो नाजायज तरीके से ही सही. यह एक ऐसा समाज है जहां किसी को गलत काम करने से डर नहीं लगता और मानो हमारे देश में सभी स्तरों पर सभी काम कुछ ऐसी ही प्रवृत्ति के साथ किए जा रहे हैं.

राजनीति और कॉर्पोरेट जगत के गलियारों में घूमते-टहलते सूरमा मानते हैं कि वे हमें लूटेंगे-हजारों-करोड़ों के घोटालों से. अगर आप समाज के उस तबके से हैं जिन बेचारों के पास उतना बड़ा हाथ मारने की औकात नहीं, तो कार चुराएंगे, घर में घुस कर चोरी कर लेंगे और सबसे बढ़कर मर्दानगी करेंगे कि औरत की आबरू लूट लेंगे और जब तक कानून का शिकंजा आप पर कसेगा, आप नौ दो ग्यारह हो लेंगे.

राजनैतिक व्यवस्था और इसे चलाने वालों के बीच मानो कोई संपर्क ही नहीं है. इंसाफ के लिए गुहार लगाई जा रही है और पूरी तरह कान बंद किए हुए व्यवस्था की कछुआ चाल से प्रतिक्रिया गुस्से को बढ़ाने का काम करती है. विडंबना यह है कि ढेर सारे लोगों को मुट्ठी भर लोग खामोश कर देते हैं. मैंने कुछ लोगों को कहते सुना कि ये कम पढ़े-लिखे लोगों की जमात है जिनके पास काम नहीं, उस पर आर्थिक स्तर पर बढ़ रहा अंतर उन्हें कुंठित बना रहा है, शायद वही घृणित काम के लिए उन्हें उकसा देता है. ऐसा हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है. यह तो दूसरी ही बहस का मुद्दा है, लेकिन अपराध तो अपराध है.

बेशक समाज में कुछ गड़बड़ है तभी तो यहां पुरुष को लगता है कि वे औरत के यौन उत्पीडऩ या बलात्कार करने के बाद भी बच निकलेंगे. फिल्म निर्माता होने के नाते मैं अक्सर सोचता हूं कि जिस इंडस्ट्री का मैं हिस्सा हूं, कहीं वह भी तो आंशिक तौर पर ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार सोच को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार नहीं.

मुझे यह कहते हुए अफसोस हो रहा है कि जवाब हां है. ऐसी भी फिल्में हैं जिनमें हीरोइनों को लुभाने के लिए प्यार भरी शरारतों ने उत्पीडऩ का रूप अख्तियार कर लिया है. इन फिल्मों को कुछ सभ्य समाजों में शोहदा कहा जाएगा. सोचिए जरा, वह हीरो लाखों लोगों का रोल मॉडल है...जाहिर है कि उसके फैन नहीं समझेंगे कि ऐसी हरकतों में क्या बुराई है? अब कल्पना करें कि यह हीरोइन भी लाखों लोगों की रोल मॉडल है...तो देश भर की लड़कियों में कौन-सा संदेश जाएगा? एक समय था जब विलेन हीरोइन को तंग करता था तो हीरो उसकी जमकर पिटाई करता था. आज हीरो ही हीरोइन को तंग कर रहा है और हैरानी वाली बात है कि कहानी का अंत उसी तंग करने वाले हीरो के साथ उसकी शादी से होता है.

इसलिए जरूरत इस बात की है कि लेखक, निर्देशक और निर्माता इस पर गंभीरता से विचार करें.

स्त्री को इस बात का फैसला लेने का पूरा हक है कि वह किसके साथ हमबिस्तर हो, कब हो और उन निजी क्षणों का भरपूर लुत्फ ले. उन्हें क्यों कहा जाता है कि वे मोबाइल न ले जाएं, जींस न पहनें, या लड़कों के साथ मेलजोल न करें? जो लोग यह कहते हैं कि लड़कियों/महिलाओं को अंधेरा होने के बाद बाहर नहीं निकलना चाहिए, क्योंकि समय अच्छा नहीं, उनसे मैं कहना चाहूंगा कि क्या अच्छा हो कि शाम होते ही मर्दों का बाहर निकलना बंद कर दिया जाए? क्या यह औरतों के लिए ज्यादा सुरक्षित उपाय नहीं? 

मैं बस इतिहास के दरीचों से स्त्री और उसके शरीर को अपने नियंत्रण में रखने की मर्दों की ग्रंथि को पढऩा चाहता हूं और मेरी समझ में यही आता है कि औरत के अंदर सृजन की अलौकिक क्षमता के कारण वह इतनी शक्तिसंपन्न नजर आती है कि उसके सामने खुद को बौना महसूस करते मर्द की बौखलाहट उसे कुंठित कर देती है.

आज औरतों ने साबित किया है कि वे ऑफिस में पुरुषों की बॉस की भूमिका निभा सकती हैं, कंपनियों को चला सकती हैं, सरकार चला सकती हैं और न जाने कितने काम कर सकती है. मर्द डर गया है. उसके पास अब आखिरी उपाय उसे शारीरिक रूप से निशाना बनाना ही बचा है. इससे वह यह महसूस करता है कि आज भी वह उस पर राज करता है.

लेकिन इससे मुकाबला करने की तरकीब है. हमारे मंत्री, पुलिस विभाग और हमारी न्यायपालिका को एकजुट होना होगा. हमें एक मजबूत नागरिक लॉबी तैयार करनी होगी जो फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग करे, कानून में संशोधन हो और उसे जल्द से जल्द लागू किया जाए.

चाहें वे गुवाहाटी के बदमिजाज हों, मुंबई में मेरी दोस्त और सहकर्मी पल्लवी के हत्यारे हों, दिल्ली के बलात्कारी हों या देश के किसी कोने में बैठा एसिड फेंकने वाला, अब तक किसी को भी इस तरह की सजा नहीं मिली कि अगली बार गलत कदम उठाने से पहले उनकी रूह कांप उठे. जब किए गए किसी अपराध की सजा तुरंत न मिले तो इसका भय भी नहीं रहता.

यही कारण है कि आज वंध्याकरण (कैस्ट्रेशन) और मौत की सजा देने के लिए आवाज उठ रही है. समाज उबल रहा है. लोग बेलगाम हो जाएं उससे पहले प्रशासन को अपना काम शुरू कर देना चाहिए और जब तक ऐसा नहीं होता, यह गुस्सा थमने वाला नहीं; हिंदुस्तानी औरत की पीड़ा थमने वाली नहीं और इन सबके लिए हम जिम्मेदार होंगे.

इसलिए जो करना है, आज ही करो.

फरहान अख्तर ऐक्टर, लेखक, निर्देशक, निर्माता और दो बेटियों के पिता हैं.

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