गुजरात की कहानी को उसके अलग-अलग अध्यायों में देखते हैं. गुजरात की तरक्की को स्वीकार करने में लोगों को संकोच होता था, इसे 'अतिरंजित’ करार देकर खारिज किया जाता रहा. जब आंकड़ों में भी तरक्की की यही कहानी दिखी, तब से इसे कोई चुनौती नहीं देता. जाहिर है, तथ्य 'अतिरंजित’ नहीं हो सकते. दसवीं योजना (2002-2007) के बाद से गुजरात ने दो अंकों में तरक्की की है. बड़े राज्यों में यही स्थिति बिहार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु की है. बिहार के मामले में यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि अपेक्षाकृत ज्यादा बड़े राज्यों को तरक्की के संसाधन जुटाने में दिक्कत भी होती है.
यदि ऐतिहासिक कारकों ने साथ दिया होता, तो कर्नाटक की तरक्की और तेज रहनी चाहिए थी. तरक्की में निरंतर परिवर्तनशीलता की शिकायत भी गुजरात ने दूर की है और यह वहां कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन को दिखाता है. वहां सड़क, बिजली (ज्योतिग्राम योजना) और पानी (नदी घाटियों के बीच पानी का ट्रांसफर) के क्षेत्र में जो काम हुआ, उसने ऐतिहासिक रूप से वंचित कई जिलों में कई तरह की खेती और उसके व्यवसायीकरण का रास्ता खोला.
डेयरी, पशुपालन और बागवानी इसका उदाहरण हैं. दूसरे, गुजरात की तरक्की की कहानी को अब भी गलत तरीके से समझ जाता है. आम धारणा यह है कि इसके पीछे बड़े उद्योगों का हाथ है, हालांकि यहां छोटे कारखानों और एमएसएमई (अतिलघु, लघु और मझेले उद्यम) क्लस्टर्स की संख्या में तरक्की हुई है. राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में मैनुफैक्चरिंग की हिस्सेदारी घटी है और उसके बरक्स नॉन-मैनुफैक्चरिंग क्षेत्र व सेवा क्षेत्र में तरक्की हुई है. इसलिए गुजरात की तरक्की की दास्तान कृषि, एमएसएमई, नॉन-मैनुफैक्चरिंग उद्योग और सेवाओं से कहीं ज्यादा ताल्लुक रखती है.
अब सामाजिक क्षेत्र पर आते हैं. कहा जाता है कि गुजरात ने सामाजिक क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया. ग्रामीण गरीबी के मामले में गरीबी के अनुपात में 2004-05 और 2009-10 के बीच तेजी से गिरावट आई है. शहरी गरीबी भले कम न हुई हो, लेकिन यदि ग्रामीण गरीबी में कमी आई तो इसका अर्थ यह हुआ कि वृद्धि समावेशी रही है. ऐसा कोई सबूत भी नहीं जो यह बताए कि यहां असमानता बढ़ी है.
सामाजिक क्षेत्रों में आंकड़ों की टाइमलाइन अहम है क्योंकि सामाजिक क्षेत्र पर खास जोर दिया जाना ग्यारहवीं योजना (2007-12) में ही शुरू हुआ. गुजरात ने सामाजिक क्षेत्रों में भले बढिय़ा प्रदर्शन न किया हो, लेकिन सवाल है कि क्या समय के साथ मामूली सुधार भी हुए हैं और क्या समाधान के उपाय किए गए हैं? एक उदाहरण लें, मसलन 2006 से 2011 के बीच स्कूल से बीच में पढ़ाई छोड़ देने वाले बच्चों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में डॉक्टरी देखरेख में प्रसव की दर 2003-04 के 55.87 फीसदी से बढ़ कर 2011-12 में 93.5 फीसदी हो गई है. टीकाकरण का कवरेज बढ़ा है. अतिवादी हिंसा पर लगाम कसी गई है. उद्योगीकरण, रिफाइनरी और तटवर्ती क्षेत्र केंद्रित विकास पर जोर के बावजूद तटवर्ती क्षेत्रों में या कहीं भी कोई बड़ा हादसा नहीं हुआ है.
इसके बावजूद गुजरात के मामले में तरक्की को लोग सकुचाते हुए मानते हैं, विकास की दास्तान को शायद ही कोई मानता हो और प्रशासनिक कामयाबी पर तो कोई भरोसा ही नहीं करता. अब जरा गुजरात के प्रशासनिक पक्ष को भी देख लें. कहानी का यह अध्याय आंशिक तौर पर वित्तीय प्रबंधन और केंद्रीय तथा केंद्र प्रायोजित योजनाओं में कमियों को राज्यस्तरीय योजनाओं के सहारे पाटने पर आधारित है. यहां मामला सरकारी खर्च को बढ़ाने का नहीं है, बल्कि प्राइवेट इन्वेस्टमेंट के लिए माहौल पैदा करने का ज्यादा है. शिक्षा और स्वास्थ्य, दोनों ही क्षेत्रों में आप पारंपरिक सरकारी एकाधिकार के टूटने के लक्षण देख सकते हैं.
इसके अलावा सरकारी खर्च को असरदार बनाना प्रशासन का एक पहलू है. इसमें ई-प्रशासन का भी एक अहम घटक शामिल है, जिसकी मदद से सरकारी मनमर्जी को दूर किया गया है. 2003 के बाद चले चिंतन शिविरों के जरिए यह सुनिश्चित किया गया कि सरकार का काम विभागों की भुलभुलैया में न फंसा रहे, बल्कि योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के लिए तमाम ह्नेत्रों से विचार लिया जाए. अब ट्रांसफर, पोस्टिंग और योजना क्रियान्वयन राजनैतिक दखलंदाजी से काफी हद तक मुक्त हो चुके हैं. गुजरात में प्रशासन की कहानी विकास की एक मानक इबारत है जो दूसरे राज्यों के लिए अनुकरणीय है.
तरक्की, विकास और प्रशासन की इस कहानी को सुनिश्चित करने वाले तत्वों को अकसर अलग-अलग करके आंक पाना हमेशा कठिन होता है. फिर भी हम कह सकते हैं कि अव्वल तो गुजरात के साथ एक विरासत जुड़ी हुई है चूंकि 2002 से पहले की सभी सरकारों ने सकारात्मक असर ही छोड़ा था.
दूसरे, गुजरात में निजी उद्यमिता और सरकार के प्रति आलोचना के मिजाज की स्वस्थ परंपरा रही है. तीसरे, पानी और सड़क परिवहन जैसे क्षेत्रों के मामले में गुजरात को हमेशा बाहरी दुनिया से संपर्क का लाभ मिलता रहा है. राज्य में ऑटोमोबाइल और ऑटो क्षेत्र के कलपुर्जों के कारखाने इसका एक उदाहरण हैं.
राज्य की विकास की परंपरा और विरासत के बारे में इतना कुछ गिनाने के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की भूमिका को आप नकार नहीं सकते. उनके नेतृत्व की निजी मुहर जिन चीजों पर लगी है, उनमें सामाजिक क्षेत्र पर जोर, नौकरशाही का सशक्तीकरण, राजनैतिक दखलंदाजी से उसकी मुक्ति, भ्रष्टाचार पर कड़ी नजर, विकेंद्रीकरण, निजी क्षेत्र पर जोर तथा गुजरात की वृद्धि और विकास में एक आत्मप्रतिष्ठा का संदेश जैसी कुछ अहम चीजें हैं. इसका श्रेय व्यवस्था को नहीं, एक व्यक्ति को है. वस्तुपरक विश्लेषण करते वक्त श्रेय देना सीखें.

