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पहाड़ों पर बढ़ती धर्म की खाई

हाल की कुछ घटनाओं ने साबित किया है कि पहाड़ के सांप्रदायिक सौहार्द का ताना-बाना तेजी से चटक रहा है. प्रशासन की सख्ती के चलते भले ही पुरोला में प्रस्तावित महापंचायत स्थगित हो गई हो लेकिन पहाड़ में सब कुछ पहले जैसा शांत नहीं है

उत्तरकाशी में धारा 144: खूबसूरत नजारों के लिए मशहूर पुरोला धार्मिक तनाव की वजह से खबरों में है
उत्तरकाशी में धारा 144: खूबसूरत नजारों के लिए मशहूर पुरोला धार्मिक तनाव की वजह से खबरों में है
अपडेटेड 21 जून , 2023

उत्तरकाशी जिले के पश्चिमी छोर को पारंपरिक तौर पर रवईं घाटी के नाम से जाना जाता है. इस इलाके में यमुना की सहायक कमल नदी के किनारे बसा है छोटा-सा कस्बा पुरोला. अपने लाल चावल और खूबसूरत नजारों की वजह से मशहूर यह पहाड़ी कस्बा फिलहाल किन्हीं और वजहों से खबर में है. 

26 मई, 2023. शाम के करीब 4 बजे रहे थे. शकील ऐंड संस नाम की कपड़े की दुकान चलाने वाले सलीम अपने ग्राहकों के साथ थे. इस बीच उनके पास उनके कुछ पड़ोसियों ने आकर कहा कि उन्हें जल्द-से-जल्द दुकान बढ़ा देनी चाहिए. माहौल खराब हो रहा है. सलीम के पिता शकील अस्सी के दशक में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से पुरोला आए थे. सलीम की पैदाइश यहीं की है. उनका बचपन यहीं बीता. अचानक से माहौल खराब होने की वजह सलीम की समझ से बाहर थी. शाम ढलते-ढलते उन्हें स्थानीय न्यूज पोर्टल से खबर मिली कि तथाकथित लव जिहाद के एक मामले के चलते काफी तनाव फैल गया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 26 तारीख की दोपहर, एक 14 साल की नाबालिग लड़की को दो स्थानीय युवकों के साथ जाते हुए देखा गया. कुछ स्थानीय लोगों ने, लड़की के मामा, जो पुरोला बाजार में दुकानदार हैं, को यह सूचना दे दी. मौके पर पहुंचे मामा ने लड़की को दोनों लड़कों के साथ एक सवारी टेंपो में पाया. इसके बाद इकट्ठा हुई भीड़ ने दोनों युवकों को जमकर पीटा और पुलिस के हवाले कर दिया. पकड़े गए युवाओं का नाम उबैद खान और जीतेंद्र सैनी है. आरोप लगाया गया कि उबैद और नाबालिग लड़की के बीच प्रेम संबंध थे और वह उसे बहला-फुसलाकर भगाने की कोशिश कर रहा था. इस काम में उसका साथी जीतेंद्र उसकी मदद कर रहा था. देखते ही देखते इस मामले ने 'लव जिहाद' का रंग ले लिया. 

इसके अगले दिन, यानी शनिवार, 27 मई को हिंदुत्ववादी संगठनों के प्रदर्शन के चलते पुलिस ने मुस्लिम कारोबारियों को दुकान न खोलने की सलाह दी. इतवार को भी सैलून, जनरल स्टोर और मेडिकल स्टोर को छोड़कर बाजार बंद था. इस बीच सैलून चलाने वाले कुछ मुस्लिम कारोबारियों के साथ मारपीट की खबर सामने आई. उनकी दुकानों को जबरन बंद करवाया गया. इसी समय सब कुछ ठीक होने के इंतजार में बैठे सलीम ने अपने भाइयों के पास देहरादून जाने का फैसला कर लिया. सलीम याद करते हैं, ''28 को जब मारपीट की खबर आई तो मैं बहुत डर गया था. बीवी-बच्चों को को लेकर यहां से निकल गया... 3 जून को मेरे पास दुकान के मालिक का फोन आया. कहा कि मुझे दुकान खाली करनी पड़ेगी. मैंने उनसे कहा कि पिछले चालीस साल से हमारा परिवार यहीं है. दो-चार दिन में चीजें ठीक हो जाएंगी. लेकिन वे नहीं माने. उन्होंने मुझे 15 तारीख तक का वक्त दिया. मैं बहुत डरते-डरते पुरोला लौटा और ट्रक में सारा सामान समेटा. लोगों ने मुझसे कहा कि अच्छा है कि मैं दुकान खाली कर रहा हूं. नहीं तो मार के खाली करवा लेते.'' सलीम अभी देहरादून में रह रहे हैं. वे 15 दिन पहले तक कपड़े के कारोबारी थे. फिलहाल अपना घर चलाने के लिए कार वॉशिंग सेंटर पर नौकरी कर रहे हैं.  

मगर कुछ लोग चीजें ठीक होने की आस में अब भी पुरोला में टिके हुए हैं. उनमें से एक हैं बाले खान जो साल 1978 में पहली बार बिजनौर से पुरोला आए थे. उस समय उनकी उम्र महज 20 साल थी. पहले उन्होंने रजाई-गद्दे का कारोबार किया और बाद में कपड़े की दुकान शुरू की. अपनी मेहनत से खुद का मकान बनाया. फिलहाल, वे और उनके बेटे अशरफ पूरा कारोबार संभालते हैं. 26 मई को माहौल खराब होने के बाद अशरफ और उनके कुछ साथी मुस्लिम व्यापारी पुरोला एसडीएम के पास सुरक्षा की गुहार लगाने गए. यहां से उन्हें कोई संतोषजनक आश्वासन नहीं मिला. इधर, मामला लगातार तूल पकड़ता रहा और हिंदू संगठनों ने एक महापंचायत बुलाने का फैसला किया.

पुरोला में तथाकथित लव जिहाद की घटना के विरोध में यमुना घाटी व्यापार मंडल ने 3 जून को बंद का आह्वान किया था. यमुना घाटी व्यापार मंडल के तहत 22 छोटे-बड़े बाजार आते हैं. पुरोला के अलावा नौगांव और बड़कोट में भी उग्र प्रदर्शन हुए. बड़कोट चार धाम यात्रा मार्ग में पड़ने वाला बजार है. यहां कुल 700 दुकान हैं. इनमें से करीब 40 दुकानें मुस्लिम समुदाय के व्यापारियों की हैं. पहले एक हलाल मीट शॉप खुलने के चलते यह कस्बा सांप्रदायिक तनाव झेल रहा था. इसके बाद पुरोला की घटना ने आग में घी का काम किया. यहां पर प्रदर्शन के दौरान कई दुकानों में तोड़-फोड़ हुई और काली स्याही से क्रॉस के निशान बना दिए गए. खुद को हिंदुत्ववादी बताने वाले राजाराम जगूड़ी इस बाजार में जनरल स्टोर चालते हैं. वे पिछले दो दशक से स्थानीय व्यापार मंडल के अध्यक्ष हैं. वे कहते हैं, ''देवभूमि में ये लोग घुसपैठ कर रहे हैं. हमारा लक्ष्य देवभूमि को मुस्लिमों से मुक्त करवाना है.'' 

जब उनसे सवाल किया गया कि हिंदू और मुस्लिम शांति से साथ-साथ क्यों नहीं रह सकते तो उनका जवाब था, ''जब हमारे हिंदू भाइयों को कश्मीर से निकाला गया तब तो किसी ने कुछ नहीं बोला. तब नहीं पूछा कि लाखों लोग कहां जाएंगे? कैसे रहेंगे? क्या खाएंगे? लेकिन यहां से पांच-दस लोग छोड़कर जा रहे हैं तो इतना हल्ला मच गया. बीजेपी सरकार भी कह रही है कि वह महापंचायत नहीं होने देगी.''

महापंचायत होने की खबरों के बीच सांप्रदायिक माहौल न बिगड़े, इसलिए 14 जून को प्रशासन ने पुरोला में धारा 144 लागू कर दी. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एएनआइ के जरिए संदेश दिया, ''हम सभी से शांति बनाए रखने की अपील करते हैं. कोई भी व्यक्ति अगर कानून अपने हाथ में लेता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी.'' 

बड़कोट के अलावा पुरोला में भी 3 जून को बड़ा प्रदर्शन हुआ. बाले खान का घर पुरोला बाजार के मुख्य मार्ग से करीब 200 मीटर दूर है. प्रदर्शनकारियों का जुलूस उनके घर के सामने आकर रुका 15 मिनट नारेबाजी की. 'मुस्लिमों पुरोला छोड़ो' और 'जय श्री राम' जैसे नारे लगाए गए. अशरफ याद करते हैं, ''पूरी घटना में मेरी गलती क्या थी? मेरे बच्चे मुझसे पूछ रहे थे कि पापा ये लोग हमें गाली क्यों दे रहे हैं. मेरे पास जवाब नहीं था.'' वे कहते हैं, ''पुरोला में कोई मस्जिद नहीं है. इसलिए ईद के रोज लोग हमारे घर पर नमाज पढ़ने आ जाते हैं. पिछले चालीस साल से आ रहे हैं. अब तक किसी ने ऐतराज नहीं जताया. लेकिन इस बार कहने लगे कि ये लोग मुसलमानों को इकट्ठा करते हैं.''

अज्ञात लोगों ने 5 जून की रात पुरोला में मुस्लिम समुदाय के व्यापारियों की दुकानों पर आपत्तिजनक पोस्टर चस्पां कर दिए. इन पोस्टरों का मजमून था, ''लव जिहादियों को सूचित किया जाता है कि 15 जून को होने वाली महापंचायत से पहले अपनी दुकानें खाली कर दें. अगर ऐसा नहीं किया तो मुसलमानों के लिए मुश्किल बढ़ सकती है.'' पोस्टर के नीचे 'देवभूमि रक्षा अभियान' नाम के संगठन का नाम लिखा हुआ था.

फेसबुक पर दी गई जानकारी के मुताबिक, देवभूमि रक्षा अभियान के संस्थापक स्वामी दर्शन भारती नाम के एक संन्यासी हैं. इस संगठन का उद्देश्य उत्तराखंड में हो रहे तथाकथित 'लव जिहाद, लैंड जिहाद, धर्म परिवर्तन और नशे' के खिलाफ लड़ना है. अप्रैल 2021 में दर्शन भारती लव जिहाद के खिलाफ सख्त कानून की मांग को लेकर आमरण अनशन कर चुके हैं. उनका अनशन खुलवाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत आए थे. भारती ने ही पुरोला में हिंदू महापंचायत का आह्वान किया था. 

स्वामी दर्शन भारती की तरह ही उनके निकट सहयोगी राकेश तोमर उत्तराखंडी भी 'महासू रुद्र सेना' नाम का एक संगठन चलाते हैं. वे बातचीत के दौरान बार-बार नौगांव में हुए मामले का जिक्र करते हैं. नौगांव, पुरोला से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ एक कस्बा है. यहां मार्च, 2018 में एक नौ साल की बच्ची का अपहरण हुआ था. करीब 22 घंटे बाद बच्ची कबाड़ी की दुकान के पास एक बंद पड़े कमरे से मिली. बच्ची की निशानदेही पर मूंगफली का ठेला लगाने वाले मोहम्मद अनस और उसके साथी काला को पुलिस ने प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंस (पॉक्सो) ऐक्ट के तहत गिरफ्तार किया था. 

तत्कालीन मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस घटना के बाद नौगांव सहित पूरे इलाके में उग्र प्रदर्शन हुए. नौगांव व्यापार मंडल के अध्यक्ष जगदीश असवाल बताते हैं, ''उस समय नौगांव बाजार में 15 के करीब दुकानें मुसलमानों की थीं. 3-4 दुकानों को छोड़कर बाकी लोग यहां से चले गए.'' बच्ची के पिता याद करते हैं, ''व्यापार मंडल ने हमारा खूब सहयोग किया. नौगांव को स्थानीय हिंदुत्ववादी संगठन मॉडल की तरह पेश करते हैं.'' 

26 तारीख की घटना के बाद से पुरोला में एक भी मुस्लिम दुकानदार ने अपनी दुकान नहीं खोली है. करीब 12 दुकानदार अपनी दुकान खाली करके जा चुके हैं. इसके अलावा बड़कोट से सात, आराकोट से आठ, करसौन से तीन और बरनी घाट से आठ फेरी लगाने वाले मुस्लिम व्यापारी पलायन कर चुके हैं. इससे पहले सैया से भी सभी 12 मुस्लिम व्यापारी अपनी दुकानें खाली कर चुके हैं. 

गढ़वाल हिल्स में मुस्लिम व्यापारियों के आने का इतिहास आजादी से पहले का है. आज भी पहाड़ के हर बाजार में आपको मुस्लिम व्यापारी मिल जाएंगे. लेकिन हाल ही की कुछ घटनाओं ने साबित किया है कि पहाड़ के सांप्रदायिक सौहार्द का ताना-बाना तेजी से चटक रहा है. प्रशासन की सख्ती के चलते भले ही पुरोला में प्रस्तावित महापंचायत स्थगित हो गई हो लेकिन पहाड़ में सब कुछ पहले जैसा शांत नहीं है.

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