
महाराष्ट्र होमगार्ड के महानिदेशक (डीजी) परमबीर सिंह 231 दिनों तक लापता रहने के बाद 25 नवंबर को चंडीगढ़ से उड़कर मुंबई पहुंचे. तब तक शायद वे अपने खिलाफ अवैध उगाही के मामले में जांच का सामना करने का मन बना चुके थे. वे दक्षिण मुंबई के मालाबार स्थित अपने घर पहुंचे, कपड़े बदले और मुंबई पुलिस की अपराध शाखा की कांदिवली इकाई की ओर बढ़ चले. वहां पुलिस उपायुक्त नीलोत्पल मिश्र और एक पुलिस इंस्पेक्टर ने उनसे छह घंटे पूछताछ की. मुंबई पुलिस के मुखिया के पद से 20 मार्च को बेआबरू विदाई के पहले तक ये जूनियर अधिकारी उनको ही रिपोर्ट किया करते थे.
वैसे परमबीर स्वेच्छा से सामने नहीं आए. 18 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने 1988 बैच के इस आइपीएस अधिकारी के वकील से कहा था कि वे मुंबई पुलिस की गिरफ्तारी से बचने की याचिका पर सुनवाई चाहते हैं तो यह बताएं कि वे हैं कहां. इसके एक दिन पहले मुंबई की एक अदालत ने परमबीर को उगाही के मामले में 'घोषित अपराधी' बताने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी. 22 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर 6 दिसंबर तक रोक लगा दी और उन्हें जांच में मदद करने का निर्देश दिया.
परमबीर का दावा है कि मुंबई से गैर-मौजूदगी के दौरान वे चंडीगढ़ में थे. कुछ मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि वे अमेरिका, नेपाल या स्विट्जरलैंड में थे, जबकि चंडीगढ़ में रहने वाले परमबीर के भाई मनबीर सिंह भडाना का कहना है कि परमबीर उनके साथ तीन महीने तक रहे थे. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस से भडाना ने कहा, ''फिर वे चले गए; हम नहीं जानते कहां गए. हम अब करीब तीन महीने से उनके संपर्क में नहीं हैं.''

परमबीर के खिलाफ उगाही के मामले मुंबई और ठाणे के हैं. अगस्त 2021 में एक रियल एस्टेट डेवलपर बिमल अग्रवाल ने परमबीर, सचिन वाजे (परमबीर के करीबी माने जाने वाले निलंबित असिस्टेट पुलिस इंस्पेक्टर) और अन्य चार—सुमित सिंह उर्फ चिंटू, अल्पेश पटेल, विनय सिंह और रियाज भाटी के खिलाफ जबरन वसूली की शिकायत दर्ज कराई. अग्रवाल का आरोप है कि 2020 में मुंबई के उपनगरीय इलाके गोरेगांव में उनके दो बार और रेस्तरां में छापों से बचाने के एवज में इन लोगों ने 9 लाख रुपए की उगाही की.
अग्रवाल ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें 2.9 लाख रुपए के महंगे स्मार्टफोन मुहैया कराने के लिए मजबूर किया गया. ठाणे के एक अन्य बिल्डर केतन तन्ना ने इस साल अप्रैल में शिकायत दर्ज कराई थी कि परमबीर और सेवानिवृत्त सहायक पुलिस कमिशनर प्रदीप शर्मा ने 2018 में उनसे और उनके दोस्त सोनू जालान से करोड़ों की जबरन वसूली की थी, जब परमबीर और शर्मा दोनों ठाणे में तैनात थे.
सोची-समझी चाल?
परमबीर ने इस मामले में टिप्पणी करने से इनकार किया और न्यायपालिका में भरोसा जताया. उन्होंने इंडिया टुडे टीवी से कहा, ''मैं सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जांच में शामिल होने आया हूं. मैं अपनी बात अदालत में रखूंगा.''
अपनी वापसी से पहले, परमबीर ने महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार से खराब रिश्तों को सुधारने की दिशा में कोशिशें करनी शुरू कर दी थी. उन्होंने राज्य के पूर्व गृह मंत्री तथा राकांपा (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) के नेता अनिल देशमुख के खिलाफ जबरन वसूली के अपने आरोपों पर अक्तूबर में एक न्यायिक आयोग के समक्ष दायर हलफनामे कहा कि उनके पास इस दावे के पक्ष में कोई सबूत नहीं है कि देशमुख ने उन्हें मुंबई के बार और रेस्तरां से हर महीने 100 करोड़ रुपए इकट्ठा करने के लिए कहा था. सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति के.यू. चांदीवाल की अध्यक्षता में यह न्यायिक आयोग इस बात की जांच कर रहा है कि क्या देशमुख ने अपने मंत्री पद का दुरुपयोग किया था. हलफनामे में कहा गया है, ''मैंने मुख्यमंत्री (उद्धव ठाकरे) को खत में जो लिखा है, उसके अलावा मैं कुछ और नहीं कहना चाहता हूं.'' 17 मार्च को ठाकरे को लिखी चिट्ठी में परमबीर ने देशमुख पर आरोप लगाए थे.
25 नवंबर को परमबीर से पूछताछ की जानकारी रखने वाले मुंबई के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दावा किया कि परमबीर ने कथित जबरन वसूली के लिए वाजे को दोषी ठहराया और कहा कि उन्होंने कभी मुंबई के किसी भी बार या रेस्तरां में छापेमारी करने के लिए नहीं कहा. ठाणे के व्यवसायी मनसुख हीरन की हत्या के मामले में वाजे एक जून से न्यायिक हिरासत में है. मुंबई में उद्योगपति मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया के पास से विस्फोटकों से लदी एक एसयूवी की बरामदगी के कुछ दिनों के भीतर हीरन का शव 5 मार्च को ठाणे में मिला था. पुलिस की जांच में यह पता लगा कि वह एसयूवी हीरन की थी लेकिन वहां पर उसको वाजे ने पार्क किया था.
महाराष्ट्र के पूर्व डीजीपी प्रवीण दीक्षित का कहना है कि अनिल देशमुख मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआइ) का काम अभी खत्म नहीं हुआ है. दीक्षित कहते हैं, ''आरोप चाहे अफवाहों पर आधारित हों या किसी और वजह से, उसे सबूतों से साबित करने की जरूरत होती है. अब जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि न्यायिक अधिकारियों के सामने सबूत पेश किया जाए.''
महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता, भाजपा के देवेंद्र फड़नवीस का दावा है कि परमबीर के हलफनामे का देशमुख मामले पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि प्राथमिकी एक वकील जयश्री पाटिल की दायर याचिका पर आधारित है, न कि परमबीर की याचिका पर. वे कहते हैं, ''देशमुख को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने नागपुर में उनके शैक्षणिक संस्थान द्वारा प्राप्त एक निश्चित राशि के स्रोत के बारे में बता पाने में विफल रहने के बाद गिरफ्तार किया था. ईडी के मामले का परमबीर सिंह प्रकरण से कोई लेना-देना नहीं है.''
परमबीर सिंह की वापसी मुश्किल
हालांकि, परमबीर ने अपनी तरफ से सुलह-सफाई का पैगाम दिया है लेकिन ठाकरे सरकार समझौते के मूड में नहीं दिखती. 29 नवंबर को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने परमबीर के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने की दिशा में पहला कदम उठाया और उसका आधार अतिरिक्त मुख्य सचिव (योजना) देबाशीष चक्रवर्ती की अक्तूबर में फाइल की गई एक रिपोर्ट को बनाया गया है. इस रिपोर्ट में परमबीर को बतौर मुंबई पुलिस कमिशनर सेवा शर्तों के उल्लंघन का दोषी बताया गया है. कथित तौर पर चक्रवर्ती ने मुख्यमंत्री को लिखी गई चिट्ठी को सेवा शर्तों के उल्लंघन का उदाहरण बताया है.
महाराष्ट्र के गृह मंत्री दिलीप वालसे-पाटिल का कहना है कि महाराष्ट्र के कार्यवाहक डीजीपी संजय पांडे ने वरिष्ठों को सूचित किए बिना ड्यूटी से लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के लिए परमबीर को होमगार्ड के डीजी के पद से निलंबित करने की सिफारिश की और 2 दिसंबर को महाराष्ट्र सरकार ने होम गार्ड के प्रमुख परमबीर सिंह को अनियमितताओं के आरोप में निलंबित कर दिया.
परमबीर इस साल मार्च में अपने करियर में ढलाने आने से पहले तक महाराष्ट्र के सबसे प्रसिद्ध पुलिस अधिकारियों में से एक थे. उन्हें उद्धव ठाकरे की इच्छा के विरुद्ध मार्च 2020 में मुंबई पुलिस प्रमुख नियुक्त किया गया था. माना जाता है कि परमबीर ने सुशांत सिंह राजपूत मौत मामले में मुख्यमंत्री के बेटे आदित्य ठाकरे के खिलाफ असंतोष पर काबू पाकर उनका दिल जीत लिया था.
बहरहाल, यह मेल-मिलाप अस्थायी ही साबित हुआ. जबरन वसूली के मामलों की जांच तेज होने की संभावना है, जिससे यकीनन परमबीर के भविष्य पर तलवार लटक गई है. अब सवाल यह है कि क्या वे जांच की आंच से बचने में कामयाब हो सकते हैं और अपने करियर को नए सिरे से स्थापित कर सकते हैं? 6 दिसंबर के बाद जब उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ अदालती सुरक्षा खत्म हो जाएगी तब शायद यह तस्वीर साफ हो. लेकिन महाराष्ट्र की शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस गठजोड़ सरकार से केंद्र की खींचतान का भी परमबीर के मामले पर असर हो सकता है.

