पिछले साल 30 दिसंबर को महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के फौरन बाद अजीत पवार ने मांग की कि मंत्रालय में उन्हें दिया गया दफ्तर बदल दिया जाए. उन्हें 602 नंबर का जो केबिन दिया गया था, उसके 'अशुभ' होने की चर्चाएं हैं. उनसे पहले इस दफ्तर में बैठने वाले तीन सत्ताधारियों—एकनाथ खड़से, पांडुरंग फंडकर और अनिल बोंडे—को राजनैतिक गर्त में जाना पड़ा. (हालांकि पवार ने अंधविश्वास की बात से इनकार किया और कहा, मैंने मुख्य सचिव के केबिन के करीब दूसरा केबिन इसलिए चुना कि अगर मुख्यमंत्री बैठक बुलाएं तो उसमें भाग लेना ज्यादा आसान हो जाए.'')
माना जा रहा है कि पवार समावेशी नेता और कठोर प्रशासक के तौर पर अपनी नई छवि गढऩे की कोशिश कर रहे हैं. मराठा वर्चस्व के हिमायती होने के बावजूद सबसे पहले 1 जनवरी को उन्होंने कोरगांव-भीमा जाना चुना जहां उन्होंने इस टकराव की वर्षगांठ पर दलित सिपाहियों को श्रद्धांजलि अर्पित की. अगले दिन वे डॉ. बी.आर. आंबेडकर के स्मारक पहुंचे और वहां चल रहे काम का जायजा लिया. फिर खम ठोकते हुए 16 जनवरी को पवार ने अपने विश्वासपात्र और सामाजिक न्याय मंत्री धनंजय मुंडे को प्रोजेक्ट की निगरानी में शामिल करवाया. इससे पहले 3,000 करोड़ रुपए का यह प्रोजेक्ट पूरी तरह उस विभाग की जिम्मेदारी थी जिसकी कमान शहरी विकास मंत्री और शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे के हाथ में है.
एक प्रेस रिलीज में कहा गया, ''स्मारक का डिजाइन तैयार है. सामाजिक न्याय विभाग प्रगति की निगरानी करेगा.'' पवार ने और भी एकतरफा फैसले लिए, जिन्होंने अफसरशाहों और गठबंधन के भागीदारों को चौंका दिया. इनमें यह घोषणा भी शामिल थी कि मराठी को स्कूलों में कक्षा 10 तक अनिवार्य भाषा बनाए जाने की संभावना है (स्कूल शिक्षा मंत्री और कांग्रेस नेता वर्षा गायकवाड को इसके बारे में पता ही नहीं था) और यह फैसला भी कि मुंबई ईस्टर्न फ्रीवे का नाम बदलकर पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय विलासराव देशमुख के नाम पर रख दिया गया है (शिंदे की इच्छा को ताक पर रखते हुए).
इसी तर्ज पर 17 जनवरी को पवार ने ऐलान किया कि पुणे मेट्रो के एक हिस्से का नाम बदलकर पुणे-पिंपरी-चिंचवाड मेट्रो किया जाएगा. पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह सब सरकार में दबदबा बनाए रखने की पवार की कोशिशों का हिस्सा है, ताकि वे पार्टी में अपने प्रतिद्वंद्वियों- जयंत पाटील, छगन भुजबल, दिलीप वाल्से-पाटील और हसन मुशरीफ (सभी मंत्री) पर वर्चस्व कायम रख सकें. साथ ही वे 'अनुभवहीन' मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को भी मात देने की कोशिशें कर रहे हैं. इसी कोशिश में आर्थिक संकट झेल रहे मुंबई के बाई जेरबाई वाडिया बाल अस्पताल को पवार ने 16 जनवरी को 46 करोड़ रु. की सहायता की घोषणा कर दी. कुछ ही घंटों बाद ठाकरे ने सहायता की रकम को घटाकर 24 करोड़ रुपए कर दिया.
मुख्यमंत्री ने पवार को अभी तक खुली छूट दी है. उनके दफ्तर के एक अफसर का कहना है कि सीएम कैबिनेट में सौहार्द बनाए रखना चाहते हैं. अलबत्ता उनका यह रुख बदल सकता है, खासकर तब जब पवार लगातार अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा लांघ रहे हैं. पवार के दफ्तर के एक अधिकारी का कहना है कि अभी वे राज्य का बजट तैयार करने के लिए, जो फरवरी के तीसरे हफ्ते में पेश होगा, सरकार के विभागों की समीक्षा कर रहे हैं. होता यह है कि वित्त मंत्री वित्तीय जरूरतों के बारे में मंत्री से चर्चा करते हैं, विभाग के काम की समीक्षा नहीं.
राजनैतिक विश्लेषक हेमंत देसाई का कहना है कि पवार ने राज्य की अगुआई करने की महत्वाकांक्षा छिपाई नहीं है. वे कहते हैं, ''यह साफ है कि वे दबदबा कायम करने की कोशिश कर रहे हैं.'' इसकी तस्दीक तब भी हुई जब पवार ने 19 जनवरी को पुणे की एक रैली में अपनी तुलना एनसीपी के सुप्रीमो शरद पवार से की. उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, ''अगर साहेब (शरद पवार) चार बार मुख्यमंत्री बन सकते हैं, तो मैं इतनी बार उपमुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता?'' यह देखना दिलचस्प होगा कि एनसीपी प्रमुख इस बयान पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं.
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