राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश में 52 हजार जगहों पर अलग-अलग प्रकार की दैनिक, साप्ताहिक, मासिक गतिविधियों का संचालन करता है. पिछले एक साल में दैनिक बैठकों की संख्या में 3,000 की बढ़ोतरी हुई है. संघ का दावा है कि दैनिक गतिविधियों में हिस्सा लेने वालों में 75 फीसदी लोग 45 साल से कम आयु के थे.
लेकिन इसके बावजूद संघ अपने राजनैतिक संगठन बीजेपी के साथ संबंधों को लेकर खुद को चौराहे पर खड़ा पा रहा है. बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने को लेकर संघ में ऊहापोह जरूर है, लेकिन वह इसका फायदा पार्टी में गडकरी विरोधियों को देने के मूड में कतई नहीं है.
चेन्नै में बीते सप्ताह (2-4 नवंबर) संपन्न अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक के बाद संघ यही संदेश देता दिख रहा है. संघ प्रमुख मोहन मधुकर राव भागवत संघ की छवि को बीजेपी से जोड़कर देखते हैं, क्योंकि यह परिवार का एकमात्र राजनैतिक चेहरा है. इसलिए जब उन्होंने संघ की कमान संभाली तो सबसे पहले दिल्ली में बैठे नेताओं को ‘डी-4’ की संज्ञा देकर अध्यक्ष की दौड़ से बाहर कर दिया. इतना ही नहीं, भागवत ने पार्टी में जूनियर और राष्ट्रीय छवि नहीं रखने वाले महाराष्ट्र के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष गडकरी को दिल्ली भेजकर साफ संदेश दिया था कि नेता नहीं, संगठन बड़ा है.
लेकिन गडकरी को दूसरा कार्यकाल नहीं दिए जाने को लेकर पार्टी के भीतर चल रही मुहिम से संघ को आशंका है कि वर्तमान अध्यक्ष के हटने से दिल्ली में बैठे नेता या किसी अन्य नाम पर सहमति नहीं बनने की स्थिति में लालकृष्ण आडवाणी खुद आगे आ सकते हैं, जबकि संघ किसी भी सूरत में पार्टी की कमान को दोबारा उनके हाथ सौंपने के मूड में नहीं है और उसने 6 नवंबर को बीजेपी कोर ग्रुप मीटिंग के फैसले से अपनी इस रणनीति का इजहार करवा दिया है.
गडकरी के स्वामी विवेकानंद और दाऊद इब्राहिम की आइक्यू की तुलना वाले विवादास्पद बयान और उनकी कंपनी पूर्ति पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद राम जेठमलानी सरीखे नेताओं ने सार्वजनिक तौर से मोर्चा खोल दिया, तो ऐेसा माहौल बनाया गया कि गडकरी इस्तीफा देने को बाध्य हो जाएं.
लेकिन सूत्रों के मुताबिक गडकरी ने संघ प्रमुख भागवत के निर्देश पर पहले बयान के लिए माफी मांगी. इसके बाद भागवत ने लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली और पूर्व पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को फोन कर चेतावनी दी. इस घुड़की का असर भी दिखा और गडकरी के बचाव में सुषमा-जेटली के हस्ताक्षर से साझा बयान जारी हुआ.
संघ ने दखल देकर पार्टी के भीतर चल रहे विवाद को फौरी तौर पर थामने की कोशिश की है, लेकिन चेन्नै की अनौपचारिक बैठक में संघ नेताओं का असमंजस बरकरार रहा. हालांकि संघ का मानना है कि भ्रष्टाचार के आरोपों से परेशान कांग्रेस ने साजिश करके गडकरी पर निशाना साधा है. लेकिन इसका राजनैतिक फायदा क्षेत्रीय पार्टियों को मिलेगा.
संघ के एक वरिष्ठ नेता भागवत की योजना के बारे में कहते हैं कि गडकरी को ही दूसरा कार्यकाल देने की संभावना है, लेकिन कोई परेशानी हुई तो दिल्ली में बैठे नेताओं की बजाए संघ गडकरी जैसा ही कोई तुरुप का पत्ता सामने ला सकता है.
चेन्नै बैठक के बाद संघ के सरकार्यवाह सुरेश जोशी उर्फ भैयाजी ने गडकरी की कंपनी पर लगे अनियमितताओं के आरोप पर स्पष्ट तौर पर कहा, ‘‘महज आरोपों के आधार पर हम कैसे कह सकते हैं कि वे (गडकरी) गलत हैं. निष्पक्ष जांच की जरूरत है.’’ हालांकि चेन्नै में बैठक से ठीक पहले 31 अक्तूबर और फिर 5 नवंबर को संघ के करीब दर्जनभर वरिष्ठ नेताओं ने बीजेपी में मची हलचल पर गहन विचार-विमर्श किया.
सूत्रों के मुताबिक संघ ने तय किया कि अगर गडकरी के खिलाफ कोई कानूनी अड़चन यानी मुकदमा दर्ज नहीं होता या किसी सरकारी एजेंसी की रिपोर्ट में उंगली नहीं उठाई जाती, तो उन्हें दूसरा कार्यकाल दिया जाना चाहिए. लेकिन उसने इस बारे में अभी अंतिम फैसला नहीं लिया है. दीपावली के बाद भैयाजी जोशी 19-20 नवंबर को दिल्ली में प्रवास कर बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं के साथ इस विषय पर मंथन करेंगे.
हालांकि सुषमा स्वराज ताजा विवाद में शुरू से ही गडकरी के साथ खड़ी हैं. सूत्रों के मुताबिक सुषमा ने उन्हें भरोसा दिया है, ‘‘जब तक संघ आपके साथ है, तब तक मेरा साथ रहेगा.’’ इसलिए बीते दिनों बीजेपी के चार नेताओं राजनाथ सिंह, मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा और जसवंत सिंह ने आडवाणी से अलग-अलग मुलाकात कर सुषमा को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवाने का शिगूफा छेड़ा था. इसमें राजनाथ बेहद सक्रिय थे, क्योंकि उनकी नजर लोकसभा में विपक्ष के नेता की कुर्सी पर थी और इसके जरिए उनका मकसद 2014 में पीएम की कुर्सी की दौड़ में प्रमुखता से शामिल होना था.
लेकिन बीजेपी में शीर्ष स्तर पर महत्वाकांक्षा की लड़ाई में पार्टी की फजीहत से खफा संघ ने शिकंजा कस दिया है. संघ प्रमुख मोहन भागवत, सरकार्यवाह सुरेश जोशी, चारों सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी, दत्तात्रेय होसबाले, कृष्ण गोपाल, के.सी. कन्नन, कार्यकारिणी सदस्य मधुभाई कुलकर्णी, अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य, सह प्रचार प्रमुख अरुण कुमार, कार्यकारिणी सदस्य श्रीकांत जोशी और विहिप के अशोक सिंघल जैसे नेताओं की पूरी टीम अब बीजेपी की हर गतिविधि पर नजर रखेगी. भागवत अपने विश्वस्त भैयाजी को बीजेपी का जिम्मा सौंप पार्टी के हर मामले में अपनी कमांड बनाए रखने की रणनीति बना चुके हैं.
जाहिर है कि बीजेपी में पीएम पद की लड़ाई सतह पर है और संघ की साख दांव पर.

