कानून व्यवस्था संभालने वाली पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्रालय अब आमने-सामने है. राज्य सरकारों, अर्द्धसैनिक बलों, सेना और संघ लोक सेवा आयोग की गंभीर आपत्तियों को नजरअंदाज कर केंद्र सरकार ने सीमित सेवा प्रतियोगिता परीक्षा के जरिए आइपीएस अधिकारियों की भर्ती की प्रक्रिया शुरू की थी, लेकिन लिखित परीक्षा के परिणाम आ जाने के बाद केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्युनल (कैट) की गुवाहटी बेंच ने 14 सितंबर को केंद्र सरकार के नोटिफिकेशन को ही रद्द कर दिया.
केंद्रीय गृह मंत्रालय अब कैट के आदेश को गुवाहटी हाइकोर्ट में चुनौती देने जा रहा है, तो जवाब में असम पुलिस सर्विस के छह अधिकारियों ने 25 सितंबर को अपना पक्ष रखने के लिए अर्जी (कैविएट) दाखिल कर दी. गुवाहाटी सिटी के एडिशनल एसपी और याचिकाकर्ता स्वप्ननील डेका इंडिया टुडे से कहते हैं, ‘‘कैट के फैसले से हम बेहद खुश हैं.
केंद्र सरकार को अगर आइपीएस अधिकारियों की कमी पूरी करनी है तो राज्य कैडर से प्रमोशन के लिए निर्धारित 33 फीसदी कोटे को ही बढ़ाया जाना चाहिए, अलग से पैरामिलिट्री के लोगों को लाने का कोई मतलब नहीं है.’’ डेका पुलिस संघों को ‘‘एकजुट कर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ेंगे.’’ दूसरी तरफ गृह मंत्रालय ने भी असम से डेपुटेशन पर मंत्रालय में संयुक्त सचिव पद पर तैनात अधिकारी के.के. मित्तल को केंद्र सरकार की ओर से गुवाहाटी हाइकोर्ट में इस मामले में अपील दायर करने के लिए तैनात किया है.
26/11 के आतंकी हमले के बाद तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने देश में खाली पड़े आइपीएस के पदों को भरने के लिए सेवानिवृत्त आइपीएस अधिकारी कमल कुमार के नेतृत्व में एक कमेटी गठित की थी, जिसकी सिफारिश के आधार पर सीधी भर्ती और पदोन्नति के अलावा तीसरी प्रक्रिया के तौर पर सीमित सेवा प्रतियोगिता को अपनाया गया, जिसमें डीएसपी के तौर पर पांच साल सेवा देने वाले राज्य पुलिस के अधिकारी, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सीमा सुरक्षा बल, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल और सेना के कैप्टन-मेजर रैंक के अधिकारी परीक्षा देने के पात्र थे.
3 सितंबर, 2011 को इसके लिए नोटिफिकेशन जारी किया गया था. भर्ती की पहली परीक्षा 20-24 मई को हो चुकी है और लिखित परीक्षा के नतीजे भी घोषित हो चुके हैं. हालांकि सरकार की इस नई भर्ती प्रक्रिया का देश के आधे से ज्यादा राज्यों ने विरोध किया था.
मध्य प्रदेश राज्य पुलिस संघ के उपाध्यक्ष धर्मवीर यादव कहते हैं, ‘‘सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की एक याचिका पर कैट जाने की सलाह दी थी. अब देश की 32 जगहों पर दाखिल याचिकाएं कैट की प्रिंसिपल बेंच में पहुंच गई हैं और गुवाहटी कैट की तरह ही वहां से भी हमें ऐसे ही फैसले की अपेक्षा है.’’

