हर दौर में साइंस फिक्शन फिल्मों की अपनी एक पहचान रही है. पर्दे पर कभी अंतरिक्ष का अर्थ रोमांच था, फिर आगे चलकर उसकी जगह भय ने ले ली और अब दौर जंग का है. इस दशक की साइंस फिक्शन फिल्मों में मशीन और इंसान एक दूसरे को निगलते रहे, एलियन्स धरती पर कब्जा करने आते रहे, सरकारें टूटती रहीं या दुनिया ही खत्म होने के कगार पर खड़ी रही.
पर्दे के इस युद्ध काल में कोई फिल्म यदि मानव के मूल गुण की बात करे तो बड़ी उम्मीद जगती है. प्रोजेक्ट हेल मेरी बात करती है स्मृति और कल्पना की, जिनके सहारे मानव आज पृथ्वी पर निर्भय होकर सर्वशक्तिमान होने की ताल ठोंकता है.
ज्यादातर मेगा बजट साइंस फिक्शन फिल्मों में हथियार ही नायक होते आए हैं. स्टार वॉर्स से लेकर ड्यून और इंडिपेंडेन्स डे तक कथानक के केंद्र में हिंसा बनी रही. लेकिन द मार्शियन ने बुद्धि को केंद्र में रखने की जो परंपरा शुरू की थी उसे प्रोजेक्ट हेल मेरी बड़ी नफासत से आगे बढ़ाती है.
फिल्म का नायक रायलेंड ग्रेस है एक मामूली साइंस टीचर है. अंतरिक्ष में ग्रेस की दिलचस्पी उसके नाम एक ऐसी खोज दर्ज करती है कि अचानक वह खुद को धरती के एकमात्र रक्षक की भूमिका में पाता है.
रायन गोस्लिंग के करिअर के सबसे शानदार किरदारों में से एक ग्रेस कोई पारंपरिक हीरो या जीनियस नहीं है. डूबती मानवता की अंतिम आशा बन सकने भर के नायकत्व से पूरी तरह दूर ग्रेस अपनी सहज स्मृति और कल्पना के कारण अंतरिक्ष के असीम सन्नाटे में भेजा गया है.
यहां फिल्म उस क्लासिक लोनली एस्ट्रोनॉट इन स्पेस टूल का इस्तेमाल तो करती है लेकिन इतनी कसी हुई कहानी के साथ कि आप अधिकतर समय ग्रेस का एकल अभिनय देखते हुए भी उससे पर्याप्त और आवश्यक एका अनुभव करते हैं.
अंतरिक्ष में अंधेरा निहारता ग्रेस कई बार दफ्तरों से अपनी ऊब में लौटते आधुनिक कारिंदों-सा लगता है, जो धरती से धरती पर ही लौट रहे होते हैं. अपने अक्ष पर एक पूरा चक्कर लगाती धरती के अगले सूर्योदय के साथ फिर से दफ्तरों की मेज पर लौटने के लिए तैयार हम कारिंदे. जैसे-जैसे ग्रेस अपनी याददाश्त वापस पाता है, दर्शक भी कहानी को समझता जाता है.
सूरज की ऊर्जा को निगलने वाले सूक्ष्म जीव 'एस्ट्रोफेज’ पृथ्वी को धीरे-धीरे बर्फीले अंत की ओर धकेल रहे हैं. मानव सभ्यता खत्म होने के कगार पर है, और यह मिशन आखिरी उम्मीद है. लेकिन इस उम्मीद में केवल ग्रेस ही ब्रह्मांड में नहीं गया है. एक और ग्रह ने अपनी आखिरी उम्मीद भेजी हुई है. पत्थर की बेढब कटान-सा दिखता रॉकी और धरती से गया ग्रेस साथ मिलकर इस मिशन को अंजाम देने वाले हैं.
इस फिल्म को साधारण साइंस-फिक्शन से उठाकर खास बना देने वाला यही एलियन किरदार है. अजीब बनावट, समझ से परे ध्वनियां, इंसानों से बिल्कुल अलग शरीर, लेकिन धीरे-धीरे रॉकी फिल्म का सबसे मानवीय चरित्र बन जाता है. ग्रेस और रॉकी के बीच दोस्ती फिल्म का भावनात्मक केंद्र है.
दिलचस्प है कि यह रिश्ता किसी बड़े मेलोड्रामा से नहीं बल्कि जिज्ञासा, सहयोग और सीखने की इच्छा से बनता है. दो प्रजातियां, दो ग्रह, दो भाषाएं. फिर भी इनके बीच हुआ संवाद अद्भुत है.
ठीक इसी समय जब धरती पर कहने सुनने वालों के बीच भाषाएं अपना अर्थ खो रही हैं, अंतरिक्ष में अपने-अपने ग्रह की आशा बनकर गए दो जीव संवाद के मूल तत्वों को फिर से परिभाषित करते हुए कमाल का अनुभव उपजाती हैं.
आज जब लगभग हर दूसरी साइंस-फिक्शन कहानी डिस्टोपिया बेच रही है, यह फिल्म एक जरूरी रोशनी साबित होती है. प्रोजेक्ट हेल मेरी कहती है कि इंसानियत बची हुई है. कल्पना, स्मृति, सहयोग और जिज्ञासा में. यही वजह है कि फिल्म अपने समय में इतनी अलग दिखाई पड़ती है.
निर्देशक फिल लार्ड और क्रिस्टोफर मिलर की सफलता यही है कि उन्होंने फिल्म को 'साइंस लेक्चर’ बनने से बचा लिया. दर्शक और फिल्म के बीच परस्पर आशा के इस चक्र में फिल्म भी हमसे एक उम्मीद रखती है कि हम याद कर सकें ''अंतत: हम कौन थे? और अब क्या बन चुके हैं.’’
प्रोजेक्ट हेल मेरी अंत की आशंकाओं से जूझती उन मानवीय संभावनाओं की बात करती है, जिन्हें समय के साथ मानव ने अनदेखा करना सीख लिया है. वे तत्व जिन पर भरोसा करना हमने अब बंद कर दिया है.
सिने-सुझाव
द लास्ट टेनेंट 2000/2026
इरफान के बगैर हिंदी सिनेमा ने छह साल पूरे कर लिए. इस बार 29 अप्रैल को पुण्यतिथि पर उनके प्रशंसकों को एक अनूठा उपहार हाथ लगा. सन् 2000 में सार्थक दासगुप्ता की बनाई पौन घंटे की एक शॉर्ट फिल्म पहली बार देखने को मिली. एक परेशान-सा, प्रेमिका की याद में अमेरिका जा रहा स्ट्रगलर संगीतकार सागर (इरफान) मुंबई के एक पुराने, भुतहा घर में रहने जाता है.
मार डाले गए प्रेमी की याद में लापता, मकान मालिक की बेटी मारिया उसको वायलिन की अपनी धुन पूरी करती लगती है. विद्या बालन उनकी प्रेमिका के रोल में हैं. इस फिल्म का वीएचएस खोजकर इसे रेस्टोर किया गया है. फिल्म याद दिलाती है कि इरफान किस तरह से किसी लिखे हुए रोल को सोख लेते थे.
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बिन्नी ऐंड फैमिली 2024
उत्तर भारत के मध्यवर्गीय परिवारों में बदलते सांस्कृतिक मूल्यों के चलते हो रहे टकराव को सलीके से दिखाती है यह फिल्म. बिहार के विनय (राजेश कुमार)-राधिका (चारु शंकर) लंदन में क्रमश: प्रोफेसर और काउंसिलर हैं. टीनेजर बेटी बिन्नी (अंजिनी धवन) के दादा (पंकज कपूर)-दादी (हिमानी शिवपुरी) के भी पटना से लंदन आ पहुंचने पर आधुनिक-और पारंपरिक जीवनशैली को लेकर क्लेश शुरू होता है.
शराब, पहनावा, देर रात तक घूमना...उसके बाद दादा-दादी की वजह से घर में बिन्नी के लिए स्पेस कम पड़ना...आखिर में उसका फट पड़ना और दादाजी का तैश में आना. पंकज कपूर तो खैर एक पलड़ा संभालते ही हैं, अंजिनी धवन का काम भी देखते बनता है. राजेश कुमार की रेंज देखकर लगता है हिंदी सिनेमा में उनके साथ नाइंसाफी की है. संजय त्रिपाठी ने दिल से यह फिल्म लिखी और निर्देशित की है.
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बिन मां के बच्चे 1980
प्रीतीश नंदी के साथ अपने बहुचर्चित इंटरव्यू में किशोर कुमार ने अच्छे निर्देशकों के तौर पर सिर्फ दो नाम गिनाए थे: बिमल रॉय के अलावा सत्येन बोस. बोस ने बंदिश, चलती का नाम गाड़ी और दोस्ती जैसी कामयाब और सार्थक फिल्में बनाईं. वही बोस 1980 में बच्चों के लिए एक खासी भावनात्मक कहानी की यह फिल्म बनाते हैं. परिस्थितिवश अनाथ हुए दो छोटे-से भाई-बहन किस तरह बचपन में ही सौतेली मां से तंग आकर घर छोड़ते हैं और फिर सड़क पर संघर्ष करते हैं.
1980 में आई और टैक्स फ्री की गई इस फिल्म को देखने के लिए उस दौरान बड़े होते तमाम बच्चे जीवन में पहली बार सिनेमाहॉल पहुंचे थे. डॉ. श्रीराम लागू, बिंदु, मास्टर राजू का अभिनय और ओ.पी. नय्यर के संगीतबद्ध किए एस.एच. बिहारी के लिखे गाने. एक शीर्ष निर्देशक बाल संवेदनाओं की खातिर पूरी शिद्दत से एक संपूर्ण सिनेमाई कृति रच रहा था.
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