पल्लव
कथेतर विधाओं में संस्मरणों के साथ यात्रा आख्यान लिखने का आकर्षण इधर तेजी से बढ़ा है और अनेक नए लेखकों ने भी इस क्षेत्र में रुचि दर्शाई है. इसके सामाजिक—सांस्कृतिक कारणों में संभवत: एक यह भी हो कि कविता और कहानी रचने सरीखे कौशल का दबाव यहां दिखाई नहीं देता.
यह भिन्न बात है कि यात्रा आख्यान और संस्मरण भी अंतत: कला की कसौटी पर ही कसे जाएंगे. यही कारण है कि नवाचारों के जैसे प्रयोग कथेतर विधाओं में देखने में आ रहे हैं वैसे कहानी-उपन्यास में भी नहीं.
हाल में आई कुछ नई यात्रा पुस्तकों के माध्यम से इस बात को समझा जा सकता है. कवि अंबिकादत्त का सियाराम का गांव, रंगकर्मी दिनेश शर्मा का फिर चल दिये, कवि और एक्टिविस्ट गीता गैरोला का ये मन बंजारा रे, अरुण कुकसाल का चले साथ पहाड़ तथा विज्ञान लेखक देवेंद्र मेवाड़ी का कथा कहो यायावर जैसे यात्रा आख्यानों का एक साथ प्रकाशन हिंदी में दुर्लभ घटना है और पाठकों के बदलते मिजाज का प्रमाण भी.
इनमें सबसे पहले ध्यान जाता है सियाराम का गांव पर. पर्यटन स्थलों, ऐतिहासिक भू भागों और सुरम्य स्थानों की यात्राएं करना और उन्हें लिखना सामान्य है किन्तु क्या अपने आसपास का जीवन, परिवेश और भूगोल भी इतना रोचक हो सकता है कि वहां की यात्राओं को दर्ज किया जाए? अंबिकादत्त यही करते हैं.
वे अपने शहर कोटा के आसपास के छोटे छोटे गांवों, नदियों और स्थलों की यात्राएं करते हैं, वहां के साधारण लोगों से मिलते हैं और उन्हें बेहद रोचक ढंग से दर्ज भी करते हैं. रोजमर्रा का जीवन सरीखा लगने पर उनकी किताब के डायरी होने का भ्रम भी होता है पर यहां डायरी जैसा एकांत और आत्मचिंतन उनका लक्ष्य नहीं.
अम्बिकादत्त अपने आसपास के साधारण और मामूली जीवन को ध्यान से देखने और उसे महसूस करने का जोखिम सफलतापूर्वक निभाते करते हैं. वे लिखते हैं, ''मैं सियाराम के गांव जरूर जाऊंगा—एक तो कालीसिंध नदी के किनारे स्थित भटेड़ी के बालाजी के दर्शन करने और दूसरे सियाराम के पिताजी से मिलने.
मैं अब तक कई सारे शिक्षित, पढ़े-लिखे, अध्यापकों, अफसरों, डॉक्टरों, वकीलों, व्यापारियों, साहित्यकारों और पता नहीं किन-किन से मिला-लेकिन एक ऐसा आदमी जो साठ साल से गायें चरा रहा हो—ऐसे आदमी से मैं आज तक नहीं मिला.’’ सही है कि कथा के सांचे में आने से रह गए कोनों-अंतरों में झांकने और उन्हें भी प्रकाशित करने का नया माध्यम है कथेतर.
दिनेश शर्मा का यात्रा आख्यान फिर चल दिये देश और अधिकांश विदेश की यात्राओं से बना है. वे यूरोप, एशिया और अमेरिका के अनेक छोटे-बड़े देशों-शहरों की यात्राएं करते हैं. एक यात्री के रूप में उनकी सफलता जीवन के सौंदर्य की तलाश करना है जिसके लिए भटकना और नए-नए स्थान देखना उन्हें प्रिय है.
पुस्तक की शुरुआत 1973 में की गई एक यात्रा से होती है जो हंगरी, फ्रांस, आस्ट्रिया, बेल्जियम, इथोपिया, टर्की, वियतनाम और मैक्सिको तक जाती है. अपने देश में भी वे केदारनाथ, पांडिचेरी जैसी जगहों पर लिखते हैं. वे क्रोएशिया में एक ऐसे दुकानदार से मिलते हैं जिसकी चिंताएं विचित्र लग सकती हैं.
इस व्यक्ति माटो के बारे में शर्मा ने लिखा है, 'वो और उसके बहुत सारे दोस्त सैलानियों की बेसाख्ता बढ़ती भीड़ से बहुत चिंतित हैं तो मुझे कुछ अजीब लगा. उसने बताया कि उसे लग रहा है कि उसका शहर जो एक शांत खूबसूरत चरित्रवान लड़की की तरह था अब भौंडी वेश्या बन रहा है जो हर वक्त बिकाऊ है.
सब लोगों ने अपने घरों में सैलानियों के लिए गेस्ट हाउस बना दिए हैं, ज्यादातर स्त्री-पुरुष कमाने की अंधी दौड़ मंं अपनी कारों को उबर टैक्सी बनाकर दिन रात दौड़ा रहे हैं. पुराने शहर में जहां सदियों से हजारों परिवार बसते थे, महज दो चार सौ लोगों को छोड़कर सबने अपने मकान और दुकान पैसे और कमाई के लालच में 'बाहर वालों’ को बेच दिए हैं.’
हमारे देश में अभी भी घुमक्कड़ी पुरुषों का विशेषाधिकार समझा जाता है. इसका कारण पितृात्तात्मक संरचना ही नहीं. इसके सामाजिक-आर्थिक कारण भी हैं. उत्तराखंड में जमीनी कार्यकर्ता के रूप में विक्चयात गीता गैरोला दुस्साहसी यात्री भी हैं. वे पहली स्त्री यात्री हैं जिन्होंने नंदा देवी राजजात यात्रा पूरी की.
इस यात्रा में एक निश्चित स्थान के बाद स्त्रियों का जाना वॢजत था जिसे गीता जैसी साहसी महिला ने तोड़ा. उनकी पुस्तक ये मन बंजारा रे पहाड़ों की दिलचस्प और सामाजिक चिंताओं से उपजी यात्राओं से बनी है. वे घुमक्कड़ी का आनंद लेना जानती हैं किंतु महिला आंदोलनों और सामाजिक चिंताओं से पृथक नहीं हो पाती.
अपनी इन यात्राओं में वे सामाजिक वर्जनाओं को लगातार प्रश्नांकित करती हैं. एक जगह उन्होंने लिखा है, ‘‘नंदा देवी स्वयं औरत होते हुए दूसरी औरतों का आना वर्जित क्यों करेंगी?.’’ कहना न होगा कि देश में सांस्कृतिक जागरूकता के लिए कितना काम किया जाना शेष है.
अरुण कुकसाल की किताब चले साथ पहाड़ जहां पहाड़ों के सौंदर्य और विषमता बोध को एक साथ लक्षित करती है तो देवेंद्र मेवाड़ी ने विज्ञान शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए की गई यात्राओं को भी रचना का रूप दे दिया.
कुकसाल वर्णन की गहराई में विश्वास रखने वाले लेखक हैं जो यात्राओं में चेहरों के साथ चित्त को भी देखने-समझने का आग्रह रखते हैं. उनकी यात्राएं बहुलांश में भीतर की खोज भी बन जाती हैं. वहीं मेवाड़ी से सीखा जा सकता है कि कैसे अनुभवों का दुहरा-तिहरा रचनात्मक उपयोग संभव है.
इन यात्रा आख्यानों को पढ़ना हिंदी संसार में हो रही नई आहटों को भी देखना-समझना है जहां विधाओं की परंपरागत चौखटों को तोड़कर कथेतर के नये रूपों के प्रकट होने की सुगबुगाहट है तो सामाजिक-सांस्कृतिक जड़ता से उपज रही बेचैनी भी इन्हें दस्तावेजी बनाती है.
इन यात्रा आख्यानों को पढऩा हिंदी संसार में हो रही नई आहटों को भी देखना-समझना है जहां विधाओं की परंपरागत चौखट को तोड़कर कथेतर के नए रूपों के प्रकट होने की सुगबुगाहट है
चले साथ पहाड़
लेखक: अरुण कुकसाल
संभावना प्रकाशन, हापुड़, यूपी
कीमत: 250 रुपए
फिर चल दिये
लेखक: दिनेश शर्मा
अनन्य प्रकाशन, दिल्ली
कीमत: 175 रुपए
सियाराम का गांव
लेखक: दत्त
प्रभाकर प्रकाशन, दिल्ली
कीमत: 150 रुपए
अंबिका
ये मन बंजारा रे
लेखक: गीता गैरोला
संभावना प्रकाशन, हापुड़, यूपी
कीमत: 250 रुपए
ये मन बंजारा रे, गीता गैरोला, सियाराम का गांव, दत्त, चले साथ पहाड़, अरुण कुकसाल

