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डार्क मोड

मोहब्बत में गणित मुमकिन नहींः इरशाद कामिल

गीतकार इरशाद कामिल अपने इंक बैंड के नए चैप्टर खोलने, सिनेमा से इतर लिखने की वजह, महामारी में संगीत जगत की कशमकश और लव जेहाद जैसे सवालों पर

गीतकार इरशाद कामिल
गीतकार इरशाद कामिल
अपडेटेड 9 दिसंबर , 2020

गीतकार इरशाद कामिल अपने इंक बैंड के नए चैप्टर खोलने, सिनेमा से इतर लिखने की वजह, महामारी में संगीत जगत की कशमकश और लव जेहाद जैसे सवालों पर

●आपने इंक बैंड नाम से देश का पहला पोएट्री बैंड बनाया था. लॉकडाउन की वजह से अरसे बाद इसका नया वीडियो खूबसूरत खयाल आया, जिसमें टीम के लोग अपने-अपने घरों से परफॉर्र्म कर रहे हैं.
जी, हमारे म्युजिक डायरेक्टर शोलापुर में थे, बाकी सदस्य भी दूर-दूर. हमने जैमिंग करते हुए यह वीडियो बनाया क्योंकि एक जगह आ पाना मुमकिन न था. लॉकडाउन के दौरान अवसाद भरे हालात को देखकर मैंने इसे लिखा था: जो किसी के आंसू पोंछ दे, मेरी बात में वो कमाल दे.

जहां तक बैंड की बात है तो अब जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, केरल वगैरह से वहां इसके चैप्टर खोलने के ऑफर आ रहे हैं. मैं इसे करूंगा क्योंकि इसके पीछे मकसद पैसे उगाहना नहीं बल्कि कविता को बढ़ावा देना था और यूथ बड़े पैमाने पर इससे जुड़ रहा है.

● लव जेहाद को लेकर इन दिनों खासी सियासी सरगर्मी है. एक गीतकार इसके भीतर के द्वंद्व को किस तरह से देखता है?
देखिए, योजनाबद्ध सिर्फ युद्ध होता है, प्रेम नहीं. वेद, शास्त्र या कि दूसरे धर्मग्रंथ यही कहते आए हैं कि मोहब्बत किसी बैरियर को देखके न तो रुकती है, न उसे देखके होती है. मोहब्बत गणित नहीं हो सकती.

● साहिर, मजरूह, गुलजार...पाए के गीतकार परदे और मंच पर अपनी समान मौजूदगी रखते आए हैं. बीच में यह सिलसिला टूटा. आप सिनेमा से इतर लिखने की क्या वजह पाते हैं?
फिल्मों में गानों की स्थितियां बहुत सीमित होती हैं: लगभग हर कहानी रोमांटिक, लड़के-लड़की का प्यार, झगड़ा, फिर मिलन. ऐसे में मेरे कलमकार के लिए यह फलक अक्सर पूरा नहीं पड़ता. उसी बची तड़प से कविताएं, गजलें-नज्में निकलती हैं, जिन्हें मुशायरों या बैंड के जरिए जगह मिलती है. और यह बात मैं फख्र से कह सकता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री का अकेला गीतकार हूं, जिसकी कविताएं प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका पहल में भी छपती हैं और सलमान-शाहरुख भी गाते हैं.

● महामारी के दौरान सिनेमा में म्युजिक डिपार्टमेंट के लोगों की क्या कशमकश थी?
सारे दोस्त (कला के) अपने-अपने जोन में चले गए थे. वह भी बहुत जरूरी होता है क्योंकि न चाहते हुए भी जिंदगी ने सबको एक अजीब-सी दौड़ में लगाया हुआ है. अब बोल दिया गया विश्राम!!!

ऐसे में स्वाभाविक प्रक्रिया है कि बाहर न निकलने पर आदमी अपने अंदर जाना शुरू करता है. तो मैंने कविताएं लिखीं. एक म्युजिक डायरेक्टर ने फोन करके बताया कि पिछले दिनों बड़ी अच्छी धुनें बनाई हैं, आना, सुनाऊंगा. मैंने कहा, मैं गजलें सुनाऊंगा. तो महामारी समाप्त होने पर गीत-संगीत में बहुत-सा एकदम नया सुनने को मिलेगा, जो शायद अन्यथा संभव न होता.

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