शिवकेश और नवीन कुमार
हारूस मारूस नाटक में कहानी तो है दो चूहों की. लेकिन यह दिखाता है कि इनसान की जिंदगी कैसे चूहों से भी बदतर है. इसका मिजाज व्यंग्य प्रधान हास्य का है और यह प्रतीकों में पूंजीवाद के खिलाफ आवाज उठाता है. किरदारों के नाम भी इसके मिजाज की ओर इशारा करते हैं. मसलन, लंपट चूहा, ज्ञानी मुनि चूहा, चमन चूहा, निराली चुहिया, सलोनी चुहिया, सयानी चुहिया.
मुंबई के बीइंग एसोसिएशन थिएटर ग्रुप का यह नाटक पिछले साल भर में दिल्ली, जबलपुर, चंडीगढ़, अमृतसर सहित और दूसरे कई शहरों के नाट्य महोत्सवों में होता आया है. अब तक इसके 16-17 शो हो चुके हैं. इसी से नाट्यप्रेमियों के बीच इसकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है. मुंबई में तीसरी दफा इसका मंचन 11 मार्च को अंधेरी के मुक्ति ऑडिटोरियम में होने जा रहा है.
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) की स्नातक और बीइंग एसोसिएशन की प्रमुख रसिका अगाशे निर्देशित इस नाटक के लेखक हैं मनोज नेमा, जो कि एफटीआइआइ से पटकथा लेखन में स्नातक हैं. यह नाटक एक प्रतियोगिता के जरिए चुनकर आया. रसिका बताती हैं, ''नाटक का सबसे मजेदार पहलू है, अमीर होने की चाहत के साथ दौलत के पीछे भागते इनसान की लालची वृत्ति को दिलचस्प ढंग से पकडऩा. संपत्ति का समान रूप से वितरण न हो तो क्या ऑप्शन रहता है उनके पास जीने के लिए.''
यह वस्तुत: मनुष्य के चूहे में और चूहे के मनुष्य में बदलने की कहानी है. गरीबदास को चूहे मारने का जिम्मा मिलता है तो वे उन्हें मारने की बजाए दो चूहों हारूस-मारूस को घर ले आते हैं. घर पर गरीबदास की बेटी लाली से उन दोनों की दोस्ती हो जाती है. उन्हें यह भी पता चलता है कि गरीबदास का मालिक दरअसल उनका शोषण कर रहा है.
इस नाटक का संगीत आमोद भट्ट ने तैयार किया है, जो कि रंग संगीत में एक बड़ा नाम हैं और इस विधा में योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवार्ड भी मिल चुका है. संगीत इस नाटक की जान है. भट्ट अपने स्वर नियोजन से नाटक के कथ्य को और असरदार बना देते हैं.
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