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सेवारत उद्यमी

सारे सेवाकार्य वे अपने माता-पिता के नाम पर बने ताराचंद विमलादेवी फाउंडेशन के माध्यम से संचालित करते हैं. वैवाहिक प्रबंधन उनकी एक किताब है. बचपन के इलाके टिकरापारा के लंगोटिया मित्रों के साथ वे महीने में एक दिन मिलते-बैठते और खूब हंसी-ठहाके करते हैं.

 राजेश अग्रवाल
राजेश अग्रवाल
अपडेटेड 18 दिसंबर , 2019

राजेश गनोदवाले

रायपुर (छत्तीसगढ़) का एक मुहल्ला है टिकरापारा. राजधानी में तब्दील होने के बाद भी यहां अगर कुछ नहीं बदला है तो नंदी चौक की एक चाय बेचने वाली की कुटिया में प्रति सप्ताह रामायण गाने वाली मंडली. ग्रामीण मन वाले मुहल्ले के इस चौक में सन् 1974 से मध्यम कद-काठी का एक सुदर्शन व्यक्ति बिला नागा चौपाइयों का पाठ करने आता है. 50 पार के, फिट काया वाले इस व्यक्ति के बारे में जरा और जानें: सुबह एक कॉलेज की मीटिंग.

दोपहर अपने प्लांट की साप्ताहिक विजिट. शाम को कॉर्पोरेट दफ्तर में कर्मचारियों को कुछ टिप्स और आगंतुकों से मुलाकातें. बीच में इस्कॉन परिवार के साथ संवाद. इस बीच अनगिनत फोन, सोशल मीडिया पर एक उड़ती नजर. और हां: सभागृह लेने आने वालों के फॉर्म पर दस्तखत. फिर वृद्धाश्रम का फेरा और अपनी लाइब्रेरी की तरफ भी ध्यान. अत्यधिक भागदौड़ की इस दिनचर्या में एक मिनट की भी देरी नहीं.

ये सज्जन हैं राजेश अग्रवाल. नाम इतना सामान्य कि किसी मझोले शहर में भी पचासों मिल जाएं. पर काम थोड़ा असाधारण. छत्तीसगढ़ में वैसे तो औद्योगिक बिरादरी के लिए वे रियल इस्पात ऐंड पावर लिमिटेड के चेयरमैन हैं. लेकिन इनकी दुनिया कमाल की है. कोई शहर जिन कुछ लोगों के कामों से सुंदर नजर आता है, उनमें एक हैं वे. एक बड़े साम्राज्य के मालिक लेकिन अपनी हदों और जड़ों को पहचानने वाले. सन् 1983 में कपड़े की फुटकर दुकान से दाना-पानी की राह खोजी थी. अपने शहर के लिए उनकी तड़प और सोच ने उन्हें उस ओर प्रेरित किया जिस ओर सक्षम लोग इशारा करने के बावजूद सोच नहीं पाते. नया करना और समाज को कुछ देना उनका जुनून बनता गया है.

करोड़ों की लागत वाले सभागृह यदि आम पहुंच में नहीं हैं तो वे किस काम के. वे भी इस दर्द को महसूस कर रहे थे. परिणाम: अपनी बेशकीमती जमीन पर ऐसा सभागार खड़ा कर दिया जो आज राजधानी की रचनात्मक धकडऩ है. कल्पना करिए कि एसी, लाइट, माइक, मंच, कुर्सियां, टेबल से सुसज्जित सभागार टोकन शुल्क 1,200 रु. में गैर-राजनीतिक और व्यावसायिक कार्यक्रमों के लिए मिल सकता है (यह राशि भी क्यों ली जाए, वे संकोच में हैं)! नतीजा: वृंदावन सभागार साल में 500 से अधिक आयोजनों का गवाह बन रहा है. प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी जब मुक्तिबोध संबंधी आयोजन में आए तो कह उठे, ''निजी प्रयासों से समाज की रचनात्मक सुध लेते सभागार बनवा देना असंभव को साधने जैसा है.''

व्यावसायिक व्यस्तता और सामाजिकता दोनों को साध लिया है अग्रवाल ने. एक दिन उन्हें लगा कि विद्यार्थियों के लिए मोटिवेशनल किताबें होनी चाहिए. तुरंत उन्होंने व्यक्तित्व विकास के विषयों से घिरी निशुल्क लाइब्रेरी खोल दी. जब देखा कि पढ़ने वाले बच्चे दिन भर होते हैं तो स्टाफ से कहकर उनके नियमित चाय-पान का प्रबंध कर दिया. 'सबको अपना बनाओ-सबके अपने बन जाओ' उनका ध्येय वाक्य है.

निराश्रित बुजुर्गों की तरफ भी ध्यान देना जरूरी है, ऐसा सोचकर पैतृक मकान को 'चितवन आश्रम' में बदल दिया. उन्हीं के शब्दों में, ''वृद्धाश्रम जैसी व्यवस्था के खिलाफ हूं. लेकिन वृद्ध समाज तो है. मकान बेचना था नहीं. कॉम्प्लेक्स बनाने की बजाय इस तरह क्यों न उपयोग में लाया जाए!'' इसी विचार से उन्हें रास्ता सूझा. इन बुजुर्गों को मल्टीप्लेक्स में फिल्म दिखाने और वहां घुमाने का भी वे इंतजाम करते हैं. वे और उनके कुछ साथी वृद्धाश्रम में रहने वालों को अपने घरों में भोजन पर भी बुलाते हैं.

सारे सेवाकार्य वे अपने माता-पिता के नाम पर बने ताराचंद विमलादेवी फाउंडेशन के माध्यम से संचालित करते हैं. वैवाहिक प्रबंधन उनकी एक किताब है. बचपन के इलाके टिकरापारा के लंगोटिया मित्रों के साथ वे महीने में एक दिन मिलते-बैठते और खूब हंसी-ठहाके करते हैं. ऐसे व्यक्ति को रायपुर में केबीसी के विशेष शूट के दौरान अमिताभ बच्चन सपरिवार बुलाएं तो हैरत की बात क्या!

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