सईद मिर्जा का कहना है कि "इस वक्त पूरी दुनिया में एक गहरी साजिश-सी काम करती दिखती है. और वह यह कि आप कुछ सोचो मत. छोटे-छोटे स्वार्थ हम पर इस कदर हावी हो गए हैं कि उसमें बड़े संदर्भ खो जा रहे हैं.
यह बात व्यक्तियों और राष्ट्र दोनों पर लागू होती है.'' किसी भी विषय पर बस फौरी ध्यान जाना, किसी चीज से सहानुभूति न होना, इतिहास के सबक भूलने का खतरा. ये ही वे विषय हैं जो दिग्गज फिल्मकार, लेखक की नई किताब 'मेमोरी इन द एज ऑफ एम्नेशियाः ए पर्सनल हिस्ट्री ऑफ अवर टाइम्स' के पन्नों में फैले हैं.
मिर्जा की पिछली किताब 'अम्मी' की तरह यह भी उनके चिंतनों और छोटे-छोटे वृत्तांतों का संकलन है, जिनमें कुछ बिखरे और कुछ आपस में जुड़े हैं. तमाम शक्लों में जाहिर रहनुमाइयों और नाइंसाफियों की बात करते हुए मिर्जा बेचैनी के साथ देश और काल के चक्कर लगाते हैं.
1993 के मुंबई दंगों से लेकर आम आदमी पार्टी के उभार तक और हिंदुस्तान तथा पाकिस्तान में अंधराष्ट्रवाद से लेकर मुख्यधारा के मीडिया में भ्रष्टाचार तक सब कुछ उनके विचारों की चक्की में मानीखेज होता जाता है. गहरे वैचारिक लेख पंचतंत्र की छोटी-छोटी नीति कथाओं और मुल्ला नसीरुद्दीन के किस्सों की कतार में शुमार दिखाई देते हैं. उनका कहना है कि "लेखक के तौर पर मैं एक सीधी रेखा पर नहीं चलता.
मुझे एक से दूसरे विचार तक भटकना पसंद है, पर बात समझ में आती रहनी चाहिए. मैं इस किताब को एक भित्ति चित्र की तरह देखता हूं. मगर चूंकि यह अम्मी से कहीं ज्यादा सियासी है, इसलिए इसे ज्यादा दिलचस्प होना ही था.''
ठीक उसी तरह जैसे 1970 और 1980 के दशकों में बनी अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है और सलीम लंगड़े पे मत रो सरीखी उनकी फिल्मों में अक्सर होता था. मिर्जा साधारण लोगों की निजी जद्दोजहद को सामने लाते वक्त खूब खुलते-खिलते हैं. कुछ उसी तरह जैसे उन्होंने कभी अरविंद देसाई, अल्बर्ट पिंटो और मोहन जोशी सरीखे किरदारों के अंतर्मन को परदे पर दिखाया था.
उनकी किताब के ज्यादा मनोरंजक हिस्सों में शामिल है ग्रीनविच विलेज के एक लुहार से मुलाकात या एलोरा के मंदिर में राजस्थानी दस्तकारों से आमना-सामना (यहां फिल्मकार मिर्जा का दिलचस्प रूप भी देखने को मिलता है जिसमें वे तीर्थयात्रियों को पूजा-अर्चना जल्दी खत्म करने के लिए "निर्देशित'' करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वे शाम की झीनी रोशनी में शॉट ले सकें).
उन्होंने 1940-50 के दशकों में दूसरे समुदायों और संस्कृतियों के लोगों के साथ रह रहे मुंबई के फोनेस्का मैंशन के बाशिंदों के बारे में बड़े प्यार और लगाव के साथ लिखा है. इनमें उनकी अम्मी और वालिद भी शामिल थे. यहां साझा सुख-दुख की झलकियां हैं जो मिर्जा के सहनिर्देशित टीवी शो नुक्कड़ की याद दिलाती हैं.
मिर्जा का नैतिक आक्रोश हालांकि समझ में आता है, पर वह बेसुरापन भी पैदा कर सकता है. वे सिल्विओ बर्लुस्कोनी को सलाह देते हैं और उसे भी जिसे वे "कट्टरपंथी यहूदीवादी इज्राएली'' कहते हैं. मिर्जा आलंकारिक ढंग से इतालवी नेता से कहते हैं, "मैं जानता हूं कि आप महंगे डिजाइनर सूट और शर्ट पहनते हैं और आपके जूते शानदार क्वालिटी लेदरवेयर होते हैं.
मगर फिर भी मैं कहना चाहूंगा कि सभ्य बनने के लिए इससे ज्यादा की दरकार होती है.'' इसी लहजे में वे कट्टरपंथी को सलाह देते हैं, "एक बहुत ताकतवर देश आपका संगी-साथी है. वह तभी तक आपका दोस्त है जब तक आप उसका मकसद पूरा करते हैं—बदले में हासिल अलबत्ता वक्त के आखिर तक नहीं टिकता. कुछ भी नहीं टिकता.''
शार्ली एब्दो के कार्टूनिस्टों की हत्या पर मिर्जा भर्त्सना का जाना-पहचाना रुख लेते हैं, उसमें एक प्रतिवाद जोड़ते हुए. वे लिखते हैं, कार्टूनिस्टों को एहसास नहीं हुआ कि "जिन उसूलों (आजादी, बराबरी, भाईचारा) की उन्होंने इतनी जोरदार पैरोकारी की, वे खुद उनके आंगन में सचाई से कोसों दूर थे. व्यंगकारों ने क्या खुद अपनी सरकार के गहरे सियासी दांवपेचों पर गौर नहीं किया?''
यह अजीबोगरीब सवाल है. शार्ली एब्दो किस्म के तंज और हास-परिहास—और उससे बुनियादी तौर पर जुड़ी बेहूदगी और बेमजगी—के बारे में आप जो भी सोचते हों, उनके काम पर एक सरसरी नजर डालने से पता चलता है कि उनके कुछ सबसे तीखे तंजों का निशाना खुद उनके सियासी, और गद्दीनशीन नेता रहे हैं.
इसके बाद भी मिर्जा के अच्छे इरादों और दुनिया के हालात को लेकर उनकी तकलीफ पर कोई विवाद नहीं है. उनकी किताब के बाद के हिस्सों में अरुंधती रॉय, पी. साईनाथ और राना अय्यूब जैसे कट्टरता, अधिनायकवाद और फेक न्यूज के खिलाफ लड़ रहे लेखकों और एक्टिविस्ट के कसीदे काढ़े गए हैं.
वे कहते हैं, "मुझे वाकई नहीं पता, मैं अब बूढ़ा और लाचार हो चुका हूं. फिल्में बनाना भी मेरे लिए बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत का काम है. दुनिया को बर्बर तरीके से चलाया जा रहा है, राष्ट्रवाद का मर्दाना रूप हर जगह नमूदार है. मैं उम्मीद करता हूं कि ऐसे नौजवान खासी तादाद में होंगे जो देख सकेंगे कि गड़बड़ी कहां है और सही चुनाव कैसे करें.''
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