हिंदी मेरा देश है, भोजपुरी मेरा घर्य, ऐसा कहने वाले हम सबके प्रिय कवि केदारनाथ सिंह चले गए. इस एक वाक्य ने साहित्य की दुनिया में बड़ा सन्नाटा पैदा कर दिया है. यह हिंदी कविता के अभिभावक का प्रस्थान है. महज चार महीने पहले इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी में उनके संग-साथ के 25 वर्षों की यात्रा करते हुए मैंने लिखा था, ''कल जब वे नहीं होंगे तो विश्वास करना कठिन होगा कि हिंदी कविता की धरती पर कोई ऐसा आदमी भी चलता था."
केदार जी अजातशत्रु थे. अपार अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बावजूद आप कभी भी उनसे मिल सकते थे और घंटों उनसे बतिया सकते थे. छंदबद्ध कविता के बाद यानी छायावादोत्तर दौर में यदि किसी एक आधुनिक कवि की कविताओं की सबसे अधिक पंक्तियां लोगों की जबान पर हैं तो केदार जी की.
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गांव से बनारस, पडरौना, दिल्ली होते हुए पेरिस, मॉस्को, लंदन, न्यूयॉर्क, बर्लिन, रोम सहित पूरी दुनिया की यात्रा करते हुए भी उनकी आत्मा अपने गांव के लोगों में बसती थी. अपने अंतिम कविता संग्रह सृष्टि पर पहरा (2014) में उनके समर्पण का अंदाज देखें जराः ''अपने गांव के लोगों को, जिन तक यह किताब कभी नहीं पहुंचेगी."
आखिर ऐसा क्या रहा है उनकी कविताओं में, जो शब्दबंध तोड़कर हमारी आत्मा तक पहुंचता है और हमें हमारी सामूहिक जातीय स्मृति से जोड़ देता है. उनके यहां टूटा हुआ ट्रक पचखियां फेंकता है तो उनके शब्दों को ठंड लगती है. वे चींटियों का रुदन भी सुन सकते थे और कवि से कबूतर का रिश्ता तलाश सकते थे. उनकी चिंता थी कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आभिजात्य माहौल में कुदाल कहां रखी जाए, या कि अंगौछा लपेटे किसान को कोई रास्ता क्यों नहीं बताता.
पेरिस में ज्यां पॉल सात्र्र की कब्र हो या कुशीनगर में बौद्ध स्तूप, वे भाषा में समय का अनुवाद करते रहे. उनके यहां तोल्स्तोय साइकिल से गिर सकते थे और बर्लिन की टूटी दीवार को देखते हुए, विलुप्तप्राय कौओं की याद आ जाती.
वे भिखारी ठाकुर को याद करते तो बिदेसिया की लय राष्ट्रगान से टकराती दिखती, वे बनारस की ओर नजर डालते तो वह एक शहर से निकलकर चरित्र में बदल जाता, जो आधा है और आधा नहीं है. वे परिंदों से बात कर लेते और मकबूल फिदा हुसेन के घोड़ों का दुख बयान कर पाते.
वे हमारे सामने निष्पाप शिशु की तरह सभ्यता के रहस्य खोलते और हम चमत्कृत रह जाते. कई बार वे खुद की लिखी पंक्तियों में खो जाते और खुद से पूछते, ''तुम चुप क्यों हो केदारनाथ सिंह, क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?" या वे पिता को याद करते हुए कहते कि ''एक पक्षी से बतियाते हुए पिता को टोकना सुंदरता के खिलाफ होगा/और इसलिए इस घूमती हुई पृथ्वी के खिलाफ भी."
अब वे अपनी कविताओं के रूप में हमारे बीच उपस्थित रहेंगे और भारतीय कविता में इस समय उससे बड़ी कोई उपस्थिति नहीं. सोशल मीडिया पर दुनिया भर के हजारों लोगों ने उनकी कविताएं पोस्ट कर/उन पर टिप्पणियां कर अपने प्रिय कवि को श्रद्धांजलि दी.
यह इस लिहाज से खास है क्योंकि वे कहा करते थे कि जब तक कोई रचनाकार लोक चेतना में जगह नहीं बना लेता, तब तक वह लोगों की स्मृति में नहीं बस सकता. ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी समेत सभी महत्वपूर्ण पुरस्कार तो खैर उन्हें मिले ही, पर ऐसे समय में जब कहा जा रहा हो कि साहित्य हाशिए पर चला गया, सोशल मीडिया लोगों का उनकी कविताओं के साथ इस तरह याद करना सुखद है.
उन्होंने 84 वर्ष का भरा-पूरा जीवन जिया. फिर भी लगता है, हिंदी समाज उनका ठीक से ख्याल न रख सका. अंतिम दिनों की उनकी बेचैनी हम ठीक से सुन न पाए. आखिरी दिनों की उनकी कविताओं का संग्रह जल्द आने वाला है, विमोचन भी भव्य होगा ही, पर उसमें न होंगे तो सिर्फ केदार जी. हे हिंदी कविता के अभिभावक! विदा.
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