मशहूर कवि विनोद कुमार शुक्ल की सबसे लंबी कविता रायपुर-बिलासपुर संभाग मंच पर खेली जाए तो नतीजा क्या आएगा? रायपुर (छत्तीसगढ़) में कुछ चुनिंदा दर्शकों के सामने जब इस लंबी कविता की बीहड़ता खुली तो जैसे ''वह दृश्य" पाठ से अधिक असरकारी बन गया.
निर्देशक योग मिश्र थे और उसे साकार किया था अभिनेता संजीव मुखर्जी ने. पाठ की चीज दृश्य में आई तो दृश्य-पाठ बनकर. न पाठ ने दृश्य का आधिक्य मचाया और न दृश्य ने पाठ की महत्ता धूमिल की. यह समन्वय ही इस कविता के रंग रूपांतरण का केंद्रीय सौंदर्य बना. आम तौर पर प्रगतिशीलता में डुबकी लगाकर अपना कुंभ स्नान समझने वाले निर्देशक कविता को जनगीत से ऊपर उठकर देख नहीं पाते.
योग मिश्र ने उस भ्रम को एकाएक तोड़ दिया कि प्रश्नों के घेरे तैयार करने वाली कविताएं सिर्फ बेसुरे ढंग से चीखने की वस्तु होती हैं. हालांकि उन्होंने किसी गेय या लयदार फ्रेम वाली कविता के गायन में अपनी ऊर्जा नहीं गंवाई.
कविता के प्रति उनके अनुराग ने उन्हें शुक्ल के आरंभिक कविता संग्रह वह आदमी नया गरम कोट पहनकर चला गया विचार की तरह की सबसे चर्चित कविता रायपुर बिलासपुर संभाग पर ठहरा दिया. बिना किसी छेड़छाड़ के उन्होंने इसे एक अभिनेता से तैयार भी कर लिया.
एकालाप की तरह स्वयं से संवाद करती यह कविता छत्तीसगढ़ की समूची संरचना लगती है. विस्थापन का दर्द और जड़ों से कटते छत्तीसगढिय़ा.
पूरी कविता मानो कोई बजता हुआ शोकगीत हो. आनंद इस बात का कि मंचन राजधानी में सांस्कृतिक गतिविधियों के अगुआ अफसर सुभाष मिश्र के निवास के आंगन में हो रहा था. दीवार के पीछे चारों ओर फैली हरियाली जैसे विंग्स का काम कर रही थी.
उस पर बिना किसी मेकअप और संगीत के मुखर्जी का सधा अभिनय. इतनी देह भंगिमाएं जिनसे कविता दर्शकों के करीब हो. प्रयोग पहला लेकिन पहलेपन की कोई लडख़ड़ाहट नहीं. कई नए दर्शकों के आनंद न बताया कि योग का नवाचार सार्थक रहा.
***

