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पूर्वोत्तर का रागरंग

नगालैंड की राजधानी कोहिमा से यही कोई 12 किलोमीटर की दूरी पर बसा किशामा गांव, 1 से 10 दिसंबर तक यह हेरिटेज गांव देश और दुनिया भर के सैलानियों के भारी जमावड़े का गवाह बना

यशस्विनी पांडेय
यशस्विनी पांडेय
अपडेटेड 20 दिसंबर , 2017

नगालैंड की राजधानी कोहिमा से यही कोई 12 किलोमीटर की दूरी पर बसा है किशामा गांव. 1 से 10 दिसंबर तक यह हेरिटेज गांव देश और दुनिया भर के सैलानियों के भारी जमावड़े का गवाह बना. उत्सव प्रधान इस राज्य में 17 प्रमुख जनजातियां हैं और सबके अपने-अपने उत्सव हैं. इन सबमें समन्वय के साथ राज्य की सांस्कृतिक विरासत का एक फ्रेम देश-दुनिया के सामने पेश करने की मंशा से सन् 2000 में हॉर्नबिल फेस्टिवल शुरू किया गया. पहले यह हर साल 1-7 दिसंबर तक होता था लेकिन इसकी लोकप्रियता के चलते इसे 10 दिसंबर तक किया जाने लगा. अबकी बार इसका आगाज करने खुद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद आए और बतौर गृह मंत्री पहली दफा नगालैंड प्रवास पर पहुंचे राजनाथ सिंह भी यहां आने से खुद को रोक न पाए. इसे सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने की बुनावट को उभारने-निखारने का औजार बनाने पर इसके आयोजकों की उन्होंने पीठ भी ठोंकी. साफ हो गया कि इसे फेस्टिवल ऑफ फेस्टिवल्स यूं ही नहीं कहा जाता.

इस जलसे में सारी जनजातियों के लोग किशामा हेरिटेज विलेज में जुटते हैं और अपने-अपने लोकनृत्य, नाट्य और दूसरी कलाएं पेश करते हैं. यहां आपको इनकी जीवनशैली, गांव में होने वाले छोटे-बड़े आयोजन, विवाहोत्सव, फसल की अच्छी पैदावार होने पर सामूहिक भोज, छोटे-बड़े लड़ाई-झगड़े निबटाने के आसान तरीके भी यहां नाट्य रूपांतरण के जरिए पेश किए जाते हैं. सांस्कृतिक कार्यक्रम दिन में सुबह 9 से 11 बजे और फिर 1 से 3 बजे तक चले. बीच में 2 घंटे के मध्यांतर में आप गांव के किसी भी ट्राइब के घर जाकर उनके साथ समय बिता सकते हैं और उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन सकते हैं. यहां घरों को मोरुंग कहते हैं. सैलानियों को इनकी चावल से तैयार स्थानीय शराब बहुत भाती है, जिसे बांस के बने ग्लास और बांस के ही स्ट्रा में पेश किया जाता है.

हर जनजाति का अपना विशेष खानपान और उसे बनाने की विविध विधि होती है. हां, अगर आप शाकाहारी हैं तो विविधता से भरे इन व्यंजनों का लुत्फ लेने से पहले जरूर जांच लें क्योंकि यहां वेज फूड के बारे में पूछिए तो आपको बताया जाएगा ''चिकेन". ऐसा नहीं कि यहां शाकाहारी व्यंजन नहीं मिलते. कुछ शाकाहारी डिशेज तो मैंने पहली बार खाईं. इनमें कोनियाक जनजाति का एक व्यंजन है रेड राइस विद येम, यानी कि जिमीकंद की स्वादिष्ट सब्जी के साथ नागा रेड राइस, अकुनि यानी सोयाबीन की सब्जी, तमाम प्रकार के अचार, चटनी और सलाद जो आपको और कहीं नहीं मिल सकते.

इसके अलावा यहां के सीधे-सादे लोगों में व्यवहार में अपने प्रति ''अतिथि देवो भव" के भाव को आप साफ तौर पर महसूस कर सकते हैं. इनके मोरुंग में जाकर इनके साथ आग सेंकते हुए बातें करना, लांग ड्रम बजाना, इनके लोकनृत्य में शामिल होना, इससे बेहतर कोई तरीका नहीं किसी भी तहजीब को नजदीक से जानने के लिए.

पूरे उत्सव में जो बात हर पल आपका ध्यान खींचती रहती है, वह है इन आदिवासियों का बहुरंगी पहनावा और उनके चेहरे पर हर पल तैरती सकारात्मक मुस्कान. अपने कपड़े ये लोग खुद अपने हाथों से बनाते हैं, जिसमें रेशम, कपास, तमाम तरह के जीवों के पंख, नाख़ून, दांत हड्डियाँ और चमड़े वगैरह का इस्तेमाल होता है. पशु संरक्षण की वकालत करने वाले समुदाय भी इसका बुरा नहीं मान सकते क्योंकि ये बिना जरूरत किसी भी जीव को हानि नहीं पहुंचाते. इनके विशिष्ट पहनावे, आभूषण, नाट्य, गीत या हाव-भाव को किसी भी भाषा में बयां कर पाना मुश्किल है. बस आप सामने देखकर ही असली आनंद पा सकते हैं. तभी तो दूर-दूर से सैलानी इस उत्सव में आ पहुंचते हैं. इस दफा यहां पहुंचे करीब ढाई लाख सैलानियों में ढाई हजार विदेशी थे. ऊबड़-खाबड़ और संकरे रास्ते तय करने के बाद किशामा के प्रांगण में प्रवेश करते ही आप तरोताजा हो जाते हैं.

देश-विदेश के फोटोग्राफर यहां पहुंचकर जैसे पागल हो जाते हैं. सुबह से शाम तक इतने कोणों से इतने एक्जोटिक दृश्य, कहीं कोई छूट न जाए. आपमें फोटोग्राफी का हुनर नहीं भी है तो भी उसे तराशने का इससे अच्छा मौका और कोई नहीं. कलाप्रेमियों के लिए प्राकृतिक चीजों से बनी कलाकृतियां, रंगीन आभूषण, स्थानीय आचार व खाने-सजाने की तमाम वस्तुएं जिन्हें आप लादकर घर ले जाना चाहेंगे. यहां की सब्जियों का आकार और ताजगी आपको हैरत में डाल देगी.

इस साल प्रतियोगिताओं में पाइनएपल और नगा मिर्ची खाने का आयोजन था. तमाम सैलानी नगा मिर्ची की एक बाइट भी लेने से कतरा रहे थे, पर कइयों ने प्लेट भर मिर्ची उड़ाई. हालांकि बाद में उनकी हालत पीछे लगे मेडिकल कैंप में देखने लायक थी. स्थिति को भांपकर ही एंबुलेंस और दूसरे इंतजाम करके रखे गए थे.

आखिरी दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद होर्नबिल के रिवाज के अनुसार खूबसूरत मिस नगालैंड ने कैंप फायर में आग लगाई. इसके चारों ओर ट्राइबल्स और सैलानियों ने जश्न मनाना शुरू ही किया था कि बारिश की झडिय़ों ने उसे आगे बढऩे देने से इनकार कर दिया. कैंपफायर की आग लेकिन फिर भी जलती रही, मानो अगले साल के हॉर्नबिल को मशाल थमाने के इंतजार में.

—यशस्विनी पांडेय

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