वर्तिका नंदा मीडियाकर्मी और शिक्षक के अलावा संवेदनशील कवयित्री भी हैं. आज के दौर की सामाजिक विसंगतियां उन्हें लगातार परेशान करती रही हैं. वे क्राइम रिपोर्टिंग भी कर चुकी हैं. इन तथ्यों का जिक्र इसलिए क्योंकि उनकी नई किताब तिनका तिनका डासना में उनकी शख्सियत के ये सभी शेड आपको मिल जाएंगे. यह किताब असल में एक दिलचस्प सिलसिले की दूसरी कड़ी है. तिहाड़ के बाद देश की दूसरी सबसे चर्चित डासना जेल के भीतर के जीवन को उन्होंने करीब से जाकर देखा. इतना ही नहीं, सजायाफ्ता कैदियों से उन्होंने कविताएं लिखवाईं, पेंटिंग बनवाई और खुद एक गाना लिखकर कैदियों से गवाया जो अब जेल का परिचय गान हो गया है और रोज सुबह-शाम वहां गाया जाता है. तिनका तिनका के सिलसिले को वे अब आगरा और फिर गुजरात की किसी जेल तक ले जाने को तैयार हैं. खैर, डासना जेल के उम्रकैदियों में से जिन पांच के बदलते जीवन की झलक किताब में है, उनमें आरुषि हत्याकांड के अभियुक्त तलवार दंपती (राजेश-नूपुर) और निठारी कांड का अभियुक्त सुरिंदर कोली भी है. इनके अलावा उम्रकैदियों की ही गायन मंडली और एक चित्रकार विवेक भी है, जिसकी प्रतिभा वहां निखरी. पुस्तक के इन्हीं से जुड़े अंश हम यहां दे रहे हैः
जेल में तलवार
आरुषि एम्स में पढऩा चाहती थी. वह डॉक्टर होना चाहती थी. नूपुर और राजेश के जितने भी साथी थे, उन सबके बच्चे या तो अब डेंटिस्ट बन चुके हैं या फिर बनने वाले हैं. कुछ दिन पहले राजेश बीमार हुए तो उन्हें एम्स ले जाया गया. पूरे रास्ते और फिर वहां जाकर वे इस सोच की चुभन से उबर नहीं पाए कि यही वह जगह है जहां आज आरुषि शायद मेडिसिन पढ़ रही होती. वह डॉक्टर बनने की तैयारी में होती. लेकिन समय ऐसा पलटा कि वे आज यहां एक आरोपी के तौर पर बैठे हैं. पर समय बता कर कब पलटा है.
दोनों की जिंदगी अब वह नहीं है. सब कुछ बदला है. हां, एक चीज अब राजेश नहीं करते. वे बाहर की तरफ नहीं देखते...यहां आने के बाद महीनों वे बाहर के दरवाजे की तरफ इस आस से देखते थे कि सीबीआइ की टीम आएगी और कहेगी कि डॉक्टर साहब, हम से गलती हो गई. अब यह साबित हो गया है कि आप दोनों बेकसूर हैं. हफ्ते में एक बार राजेश के भाई आते हैं. वे आंखों के डॉक्टर हैं. वे हर हक्रते यहां पर बंदियों की आंखों की जांच का मुफ्त कैंप लगाते हैं. राजेश की भाभी वंदना भी संपर्क में रहती हैं और डॉक्टरी के अपने पेशे के बाद उनके पास जितना भी समय बचता है, वह राजेश और नूपुर के लिए ही रहता है...वंदना को कचोटता है कि लोगों को यह कहां याद कि सरकार ने भी मीडिया के एक हिस्से को गैर-जिम्मेदाराना माना था. लोगों को शायद सिर्फ वही याद है जो उन्हें परोसा गया था. तस्वीरों से जुड़ी याददाश्त कब और कैसे मिटेगी, इसकी चुभन उन्हें चैन नहीं लेने देती.
तलवार फिल्म आई लेकिन राजेश और नूपुर उसे देखने से बचते रहे हैं. फिल्मों में जेलें भले ही दिखाई जाती हों लेकिन जेल में फिल्मों की मौजूदगी आज भी हकीकत नहीं है. इसलिए खुद तलवार अपने पर ही बनी तलवार को कब देख सकेंगे, कौन जाने. राजेश की आंखें भीगी हैं. नूपुर नीचे देख रही हैं. राजेश कह रहे हैं कि हमारे सभी साथी बहुत आगे निकल गए और हम जहां थे, वहां से बहुत पीछे आ गए. नहीं जानते, वे कब बाहर होंगे और जब भी होंगे तो समाज उन्हें कैसे स्वीकारेगा. जेल की हदें सब बातें कहां तय कर पाती हैं. डेंटिस्ट की जो पढ़ाई उन्होंने की थी, वह एक दिन जेल के अंदर उनका सबसे बड़ा सहारा बनेगी, इसका उन्हें इल्म तक न था. रोज दोनों का कुछ समय पढऩे में बीतता था. इन दिनों नूपुर ऑल द लाइट दैट वी कैन नाट सी पढ़ रही हैं. राजेश ने उनसे कहा था कि वे इसे पढ़ें. वे आत्मकथा लिखना चाहती हैं लेकिन दिल और दिमाग आपस में बात नहीं कर पाते. इतनी परतें उधडऩे लगती हैं कि शब्द भीगने लगते हैं, कागज पिघल जाता है.
मैं जब बात करती हूं तो कभी राजेश कुछ कहते हैं, कभी नूपुर. मैं सवाल नहीं करती. मैं कम बोलती हूं. मैं सिर्फ आखें उठा कर देखती हूं और हर बार पाती हूं कि दोनों एक दूसरे के शब्दों के पूरक बनते चलते हैं. जब राजेश की आवाज डूबने लगती है तो नूपुर उन वाक्यों को पूरा कर देती हैं और जब नूपुर के पास हिम्मत नहीं रहती तो राजेश के पास बात कहने का सरोकार आ जाता है. जेल ने इन दोनों को पहले से भी ज्यादा करीब ला दिया है. दोनों एक दूसरे के साथी, सहपाठी, हमसफर, प्रेमी हैं. जेल के जिस भी बंदी से बात हुई, उसने यही कहा कि किसी ने कभी भी इन दोनों को आपस में झगड़ते, यहां तक कि रूठते तक नहीं देखा. दोनों की सांसें आपस में जुड़ी हैं. कमाल की तारतम्यता. दोनों एक ही जेल में हैं पर मुलाकात रोज नहीं होती. जेल के अपने कायदे हैं, इसलिए दूरी है. पर दूरी के बावजूद आपसी सम्मान है, आत्मीयता है.
एक दिन मैं जेल में गई तो मैंने बंदियों को राजेश के लिए चिंतित पाया. उन्हें तीन दिन तेज बुखार रहा. राजेश से कहीं ज्यादा वे बंदी मुझे विचलित दिखे...ऐसे ही एक और दिन राजेश तलवार बहुत बीमार थे. जेल में उन्हें ड्रिप लगी थी. नूपुर उन्हें देखने के लिए कुछ बेचैन थीं पर वे उस बेचैनी का इजहार नहीं करना चाहती थीं. कुछ कदमों की ही दूरी पर बंद अपने पति को न मिल पाने की तकलीफ साफ दिख रही थी. उस दिन उन्होंने सीसीटीवी पर राजेश को अस्पताल से बाहर आते देखा और वे चुप रह गईं.
इस दुनिया को उन्होंने अपना लिया है. चुप्पी के साथ. यहां सबके पास अपना कोई दुख है और दुख ही का नाता है. सब किसी सफर में हैं. किस का सफर कब खत्म होगा, कोई नहीं जानता. जेल आज में जीना सिखाती है. उम्मीद के फटे पहलू भी देती है. तलवार दंपती ने जेल को और जेल ने उन्हें अपना लिया है. वह मीडिया रात भर की टूटती-कराहती नींद के बीच दिखता है जिसने अदालत की पहली सुनवाई से पहले ही उन्हें दरिंदा और कातिल करार दे दिया था. वे मानते हैं कि दैविक सुनवाई होनी अभी बाकी है. उन्हें उम्मीद है कि वह फैसला जब होगा, तब आरुषि शायद वहीं कहीं होगी. इस 24 मई को उसकी 21वीं सालगिरह थी. जेल की बैरक में इत्तफाक से उस दिन वही गाना चल रहा था जिसे आरुषि हर रोज पढ़ाई के दौरान 10 मिनट का ब्रेक लेते हुए पूरे जोर से स्पीकर पर सुनती थी—पहली नजर में कैसा जादू कर दिया, तेरा बन बैठा है मेरा जिया, जाने क्या होगा, क्या होगा क्या पता, इस पल को मिलके, आ जी ले जरा.
मैंने चलते हुए आखिर में पूछा है—कभी अपनी पसंद का कुछ खाने का मन होता हो तो? जेल पसंद से थोड़े ही न चलती है.
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सुरिंदर कोलीः अब कानून का विशेषज्ञ
यह है सुरिंदर कोली. निठारी कांड इसका एक परिचय है. फांसी की सजा हुई पर फिल्मी स्टाइल में फांसी होते-होते टल गई. सजा होने से कुछ दिन पहले उसे मेरठ जेल भेज दिया गया था क्योंकि फांसी घर वहीं पर है. सजा की एक रात पहले मेरठ और गाजियाबाद की जेल के आला अधिकारी जागते रहे क्योंकि ऐन वक्त पर उसकी सजा को मुल्तवी करने का आदेश आया था. सजा टल गई. कोली को वापस गाजियाबाद लाया गया. अबकी बार जो कोली लौटा, वह पहले से भी ज्यादा आश्वस्त था.
कोली को जेल ने बदला. तकरीबन अनपढ़ कोली के जेल के शुरुआती दिन दुविधा के थे. उसे कानूनी भाषा समझ में नहीं आती थी. न ही तकनीक. उसके दो वकील इस केस को मिल रही मीडिया की रौशनी में गुलजार थे. उसमें कोली अंधेरे में था. कोली ने कैद में पढऩा-लिखना सीखा...शुरू के कुछ दिन तो अपने मालिक पंधेर के साथ यहां बंद था. तब मामलों को समझने के लिए पंधेर का यही नौकर कोली उससे अंग्रेजी पढऩे लगा. कुछ समय बाद पंधेर रिहा हो गया. अब रह गया अकेला कोली. लेकिन कोली हारा नहीं. उसने जेल से कागज लिए, जेल से ही कलम ली, नई-पुरानी किताबों का ढेर लगाया और काले अक्षरों से जूझने लगा. सबसे पहले उसने हिंदी और उर्दू सीखी. साक्षर होने की ऐसी तल्लीनता अब तक डासना के किसी भी बंदी में नहीं देखी गई. अपनी जान बचाने के लिए कोली ने किताबों और कागजों को अपने बिस्तर के पास टिकाया और लग गया डूब कर पढऩे. अक्षर उसका ओढऩा-बिछौना हो गए. आज कोली कानून की भाषा का महारथी है. कानूनी पेचीदगियां, उसकी भाषा और उसका ढर्रा उसे भरपूर समझ में आ गया है. वह आरटीआइ का एक्सपर्ट है. अपनी जान बचाने के लिए उसने ऐसी-ऐसी आरटीआइ लगाई हैं कि कोई भी हैरत में पड़ जाए. एक आरटीआइ तो यह भी लगाई कि जिस नाली में बच्चों के इतने शव मिले थे, वह आखिरी बार साफ कब हुई थी. सरकारी तयशुदा जवाब में से अपने काम के मायने निकालने में कोली का कोई जवाब नहीं.
मैंने कोली से जानना चाहा—वह जेल में समय कैसे काटता है. उसका जवाब था—वह सारा दिन अपने केस से जुड़े दस्तावेज, किताबें और दलीलें पढ़ता है. वह बहुत व्यस्त रहता है. उसके पास बर्बाद करने का समय नहीं. मैंने कहा कि क्या तुम किताब के लिए अपनी कोई कविता दोगे तो उसका जवाब था कि उसे कविता नहीं, सिर्फ कानून समझ में आता है. फिर वह रोने लगा. जेल के अपने प्रवास में पहली बार रोया. जेल के अधिकारी बताते हैं कि वह कभी बीमार नहीं हुआ. कभी रोया नहीं. अवसाद में घिरने के बजाए वह फाइलों में घिरे रहना बेहतर समझता है और पक्के तौर पर मानता है कि उसका बचाव अगर कोई कर सकता है तो वह खुद.
उसके घर से कोई मिलने नहीं आता. किसी की कोई खबर उसके पास नहीं और अब किसी पर भरोसा भी नहीं. वह जानता है कि मीडिया में उसके बारे में क्या लिखा गया है. लेकिन अब उसे किसी बात से फर्क नहीं पड़ता. जेल ने कोली को हालात के सामने चट्टान बना दिया है. अपने अपराध की बात वह नहीं करता. वह बचाव की बात करता है. अपनी हर सुनवाई से पहले वह खुद से जिरह करता है. खुद ही से सवाल. खुद ही से जवाब. वह खुद ही जज बनता है, खुद ही पुलिस. जेल ने उसे कानून की उन गलियों से परिचित करवा दिया है जो उसके लिए अनजान थीं. सबसे बड़ी बात—आज वह साक्षर है.
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एक रंगरेज, रंग कर चला गया
32 साल का विवेक विशाखापत्तनम का रहने वाला है. करीब 8 महीने की यहां की रिहाइश के दौरान विवेक ने शिवाजी यादव (डिप्टी जेलर) को बताया कि उसे पेंटिंग का शौक है...कुछ ही दिनों में विवेक ने जो बनाया, उसने सभी को चौंका दिया. उसने एक दीवार में सड़क बनाई और दोनों तरफ पेड़. पेंटिंग पूरी तरह से 3-डी के कॉन्सेप्ट पर बनाई गई—कुछ इस अंदाज में कि जब भी पेंटिंग की तरफ देखा जाता है तो लगता है कि जैसे जेल की दीवार पर सचमुच की ही एक सड़क बना दी गई है...
पहली बार जब विवेक से मेरी मुलाकात हुई तो उसने बताया कि कुछ समय पहले जब वह विशाखापत्तनम से अपने भाई से मिलने दिल्ली आया था तो उसने तिहाड़ जेल के बाहर तिनका तिनका तिहाड़ की तर्ज पर बनी म्यूरल पेंटिंग को देखा था और उसकी तमन्ना वैसी ही किसी बड़ी दीवार पर अपने अंदाज से रंग करने की थी. तब उसे क्या पता था कि अगली बार जब वह विशाखापत्तनम से गाजियाबाद आएगा तो हालात उसे जेल में ले आएंगे. मैंने विवेक से डासना जेल की ही एक दीवार पर तिनका तिनका डासना की 3-डी पेंटिंग बनाने के लिए कहा. जेल के आला अधिकारियों ने विवेक के कहने पर सभी रंग मंगवा दिए, नए ब्रश और सीढ़ी भी...चार महीने की मेहनत के बाद तैयार हुई तिनका तिनका डासना की यह दीवार. विवेक विचाराधीन बंदी था. जिस दिन दीवार पर आखिरी कूची लगी, विवेक की रिहाई आ गई. मानो यह दीवार बनाने ही यहां आया हो. जब तक जेल मे रहा, जेल स्टूडियो बन गई. अब खुला आकाश उसका स्टूडियो होगा.
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सलाखों में सरगम
मंडली में कुल 9 लोग हैं. सब सुरों के जानकार. एक हारमोनियम, एक तबला, एक ढोलक. मजीरा भी है यहां पर. यह जेल की गायन मंडली है. रोज सुबह जब ये मिलते हैं तो पहले यह पूछते हैं कि किसके केस का क्या हुआ...(फिर) महफिल आगे बढ़ती है...जो नए लोग आते हैं, उनसे भी पहला परिचय यहीं से शुरू होता है...मंडली पूरे जेल के लिए एक रौशनी है.
आशाराम गिरि को पूरा जेल दीवान जी कहता है. रेलवे पुलिस फोर्स के जवान आशाराम को 2008 में गांव में आपसी रंजिश के बाद हुई हत्या के चलते धारा 302 में आजीवन कारावास की सजा हो गई थी. इसी साल उन्होंने यह भजन मंडली बनाई. गांव में तीन छोटे बेटे थे और घर के हालात अच्छे नहीं थे. मन बुझा रहता था. तब गाने सहारा बने. एक दिन तत्कालीन जेलर रामजी सिंह जेल के निरीक्षण पर थे तो पाया कि...दीवान जी मस्ती में हैं और बंदी उनकी आवाज में डूबे हैं. उसी दिन जेलर ने दीवान जी की गायन मंडली के गठन की ठान ली. दीवान जी ने...बजाने वाले बंदियों की तलाश भी शुरू कर दी. सबसे पहले...हारमोनियम बजाने के लिए बृजमोहन शर्मा मिले जो दहेज हत्या के मामले में धारा 304 के तहत बंद थे...ढोलक के लिए योगेश कुमार को ढूंढ लिया जो धारा 302 के तहत आजीवन कारावास में थे. धारा 420 के तहत बंदी दिनेश चिमटा बजाने में माहिर था...उन्हें धर्मवीर जैसा भजन गायक और शायर भी मिल गया. बुलंदशहर का रहने वाला धर्मवीर धारा 302 के तहत आजीवन कारावास पर था. आज वह इस टोली की जान है.
एक दिन धर्मवीर की मुलाकात एक बंदी कुलदीप से हुई. उसकी दर्दनाक प्रेम कहानी सुनकर धर्मवीर के दिल से रागिनी की पंक्तियां निकल आईं, जिसे उन्होंने साजों के साथ तैयार किया. जब उसे बंदियों को सुनाया गया तो उसकी मांग आने लगी. अब आलम यह है कि...वह खूब लिखता है और खूब गाता है. यह मंडली मुझे बताती है कि बेहद उदास बंदियों को गाने से एक थेरेपी मिलती है. हम एक परिवार हैं...जब कोई बंदी किसी दिन खाना नहीं खाता तो हम सब मिलकर उसे खाना खिलाते हैं. हमें यह भी पता रहता है कि नशा करते रहे नए आए किस बंदी को विड्रॉल सिंप्टम हो रहा है. हम उसे भी तसल्ली देते हैं. संगीत की यह महफिल किसी धर्म से कोई सरोकार नहीं रखती...यह बात अलग है कि इस सर्वधर्म समभाव की बात बाहर की दुनिया कभी नहीं करती.
तिनका तनका डासना: सलाखों के बीच जीना सीखने का हुनर
डासना जेल में तलवार दंपती और सुरिंदर कोली जैसे उम्रकैद काट रहे कैदियों के वहां के माहौल में ढलने-घुलने की दिलचस्प कहानी.

अपडेटेड 20 सितंबर , 2016
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