प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यूयॉर्क में 26 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र टिकाऊ विकास सम्मेलन में जब दीनदयाल उपाध्याय को “महान विचारक” की संज्ञा दी थी, उसके कुछ घंटे पहले ही दिल्ली की नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी में जनसंघ के इस महापुरुष का जन्मशताब्दी महोत्सव शुरू हो चुका था. उस कार्यक्रम में मोदी के प्रमुख सहयोगी, वित्त मंत्री अरुण जेटली, गृह मंत्री राजनाथ सिंह और लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन मौजूद थीं.
पिछले साल जब से बीजेपी सत्ता में आई है, मोदी कई बार दीनदयाल उपाध्याय के नाम का उल्लेख कर चुके हैं. 20 मई, 2014 को जिस दिन संसद के सेंट्रल हॉल में उन्होंने प्रवेश किया और घोषणा की कि “अंत्योदय पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मिशन था... हमें उनके सपनों को पूरा करने का प्रयास करना होगा,” तभी से प्रधानमंत्री ने अपने वादे को पूरा करने की कोशिश की है.
मोदी सरकार की सबसे प्रमुख जनसेवा योजनाओं को उपाध्याय के नाम पर रखा गया है. इसमें सबसे आगे मेक इन इंडिया है, जिसे पिछले साल 25 सितंबर को “उनके चरणों में अर्पित” किया गया था. उसके बाद से उनके नाम पर कई योजनाएं शुरू की गईं, जैसे आजीविका और कौशल विकास का कार्यक्रम दीनदयाल अंत्योदय योजना, गांवों में विद्युतीकरण का कार्यक्रम दीनदयाल उपाध्याय ग्रामज्योति योजना, कौशल विकास का कार्यक्रम दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना और पर्यटन मंत्रालय के नए कार्यालय का नाम दीनदयाल उपाध्याय पर्यटन भवन रखा गया.
इसी तरह लोकसभा टीवी ने उनके जीवन पर 13 भाग वाले एक वृत्त चित्र का प्रसारण शुरू कर दिया है और दूरदर्शन ने उनकी जीवनी पर फिल्म बनाने का वादा किया है तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग ने उनकी कृतियों को फिर से प्रकाशित करने और उनका प्रचार करने की बात कही है. बीजेपी के उपाध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे बताते हैं कि जल्द ही उनके नाम पर स्कूलों और कॉलेजों में निबंध प्रतियोगिताओं तथा प्रदर्शनियों के अलावा कुछ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में उनके नाम पर पीठों की स्थापना की घोषणा भी की जाएगी. वे कहते हैं, “पहला एजेंडा यह है कि दीनदयाल उपाध्याय के बारे में पूरे देश को बताया जाए.”
लेकिन दीनदयाल उपाध्याय हैं कौन? वे जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के महासचिव थे. आरएसएस की राजनैतिक शाखा जनसंघ की स्थापना 1951 में की गई थी. यही जनसंघ बीजेपी का संगठनात्मक आधार भी है. मुखर्जी ने एक बार कहा था, “अगर मेरे पास दो दीनदयाल होते तो मैं भारत का राजनैतिक नक्शा बदल देता.”
1953 में मुखर्जी की मृत्यु के बाद जब उपाध्याय जनसंघ के अध्यक्ष बने और जमीन पर पार्टी को संगठित करने का काम शुरू किया तो वह भविष्यवाणी जैसे सच साबित हो गई. 1962 में 14 सीटें जीतने के बाद 1967 के आम चुनावों में पार्टी ने 35 सीटें जीतीं. देश भर में अपना प्रभाव बढ़ाने और कांग्रेस के मुकाबले में एक “राष्ट्रीय लोकतांत्रिक विकल्प” विकसित करने के प्रयास में तब जनसंघ ने फर्रूखाबाद से राममनोहर लोहिया, अमरोहा से आचार्य कृपलानी और राजकोट से स्वतंत्र पार्टी के मीनू मसानी का समर्थन किया था.
म गर यह सफर लंबा नहीं रहा और 1968 में उपाध्याय की आकस्मिक मौत के साथ ही उनका उत्थान और पार्टी में बढ़ता उनका कद अचानक ही थम गया. मुगलसराय स्टेशन के पास उनका शव रेल की पटरियों पर पड़ा मिला था. बीजेपी के कुछ लोगों का अब भी मानना है कि उनकी हत्या की गई थी. पंडित दीनदयाल उपाध्याय उस समय तक हिंदुत्व में निहित एकता के दर्शन “एकात्म मानववाद” पर चार व्याख्यान दे चुके थे. दरअसल, उनके ये व्याख्यान मार्क्सवादी और इसके महान भारतीय विचारक एम.एन. रॉय के “गहरे अमानवीय यांत्रिकवाद” का उत्तर थे. रॉय के दर्शन को “रैडिकल ह्यूमनिज्म” के नाम से जाना जाता है.
जनसंघ और उसकी विरासत वाली पार्टी बीजेपी को निश्चित रूप से उपाध्याय ने ही सांचे में ढाला था. लेकिन पार्टी के पितामह लालकृष्ण आडवाणी, जो उपाध्याय को अपना राजनैतिक गुरु मानते हैं और जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर बीजेपी को एक ताकतवर पार्टी के रूप में विकसित किया, को उपाध्याय केनेहरू मेमोरियल में आयोजित जन्मशती महोत्सव में नहीं बुलाया गया था.
उपाध्याय को महापुरुष बनाने की इस मुहिम से दो सवाल खड़े होते हैं-बीजेपी और आरएसएस अपने दूसरे आदर्श नायकों को इस तरह का सम्मान क्यों नहीं दे रहे, जैसे कि के.बी. हेडगेवार, गुरु गोलवलकर और वीर सावरकर. और क्या उपाध्याय बीजेपी के नेहरू हैं?
सहस्रबुद्धे कहते हैं, “नेहरू के प्रति किसी तरह का अनादर न जताते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि दीनदयाल जी ने जनसंघ को खड़ा करने के लिए जो संघर्ष किया, वह कांग्रेस को बनाने में नेहरू के संघर्षों से कहीं बड़ा है.” सहस्रबुद्धे के मुताबिक, महात्मा गांधी के शिष्य के तौर पर नेहरू को “कांग्रेस पार्टी चांदी की तश्तरी में परोसी हुई मिली थी.” जबकि उपाध्याय ने एक-एक ईंट रख जनसंघ को खड़ा किया था.
सहस्रबुद्धे भले ही किसी खास मकसद से इनकार करें, लेकिन यह वास्तविकता है कि पार्टी ने उपाध्याय का जन्मशती महोत्सव मनाने के लिए बहुत सोच-समझकर नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी का चयन किया था, जबकि यह कार्यक्रम बड़े आराम से पुराने शहर में आरएसएस के मुख्यालय के पास स्थित दीनदयाल शोध संस्थान में आयोजित किया जा सकता था. 16 सितंबर को नेहरू मेमोरियल के निदेशक महेश रंगराजन को इस्तीफा देने पर मजबूर कर बीजेपी शायद यह बताना चाहती थी कि दक्षिणपंथी विचारकों को लंबे समय से राष्ट्रीय विमर्श से दूर रखा गया है और अब उन्हें राष्ट्र के निर्माण में उचित स्थान मिलना ही चाहिए. और इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर नेहरू से जुड़ी जगह से बेहतर कौन-सा स्थान हो सकता है?
उस कार्यक्रम में अरुण जेटली ने इस बात का उल्लेख किया कि नेहरू के ऊंचे कद के बावजूद उपाध्याय एक “समांतर विचार” और “विशिष्ट संगठन” तैयार करने में सफल रहे थे.
लेकिन इतिहासकारों का कहना है कि उपाध्याय का मुख्य दर्शन “एकात्म मानववाद के व्याक्चयान” सामान्य विचारों से अधिक कुछ नहीं है, उन्हें किसी भी तरह से मौलिक विचार नहीं माना जा सकता. मस्तिष्क, शरीर और आत्मा को जोडऩे के बारे में जर्मन रोमान्टिक्स में भी इसी तरह का विचार व्यक्त किया जा चुका है. रूसी स्लावोफाइल्स ने 19वीं सदी में इसका जमकर अनुसरण किया था. लेकिन उपाध्याय के विचार महत्वपूर्ण इसलिए माने गए क्योंकि वे अपने मूल श्रोताओं को संबोधित कर रहे थे.
राजनैतिक विश्लेषक प्रताप भानु मेहता कहते हैं कि बीजेपी के पास ज्यादा महापुरुष नहीं रहे हैं, इसीलिए उपाध्याय का नाम आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. इसके साथ ही वे यह भी कहते हैं, “लेकिन श्यामा प्रसाद मुखर्जी या के.एम. मुंशी जैसे अपेक्षाकृत ज्यादा प्रगतिशील व्यक्तियों को आगे बढ़ाने की बजाए बीजेपी सामाजिक रूप से अपने रुढ़िवादी दायरे में ही सिमटी हुई दिखाई देती है.”
मगर बीजेपी की सूची में उपाध्याय का नाम आखिर सावरकर, गोलवलकर या हेडगेवार जैसे आदर्शों से आगे क्यों है? इस बारे में सहस्रबुद्धे कहते हैं, “प्रेरणा के एक स्रोत से दूसरे स्रोत के बीच भेद करने का कोई सवाल नहीं है. हम तो अपने विरोधियों का भी सम्मान करते हैं. गुरु गोलवलकर एक आध्यात्मिक विचारक थे, जबकि दीनदयालजी ने हमारे सामने राजनैतिक विचार रखे थे.” लेकिन अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बीजेपी के एक सूत्र ने स्वीकार किया कि “गोलवलकर के विचारों से विवाद पैदा हो सकता है.”
निश्चित रूप से कांग्रेस ने जिस तरह से कई दशकों तक नेहरू-गांधी का महिमामंडन किया, उसकी प्रतिक्रिया होनी ही थी, हालांकि खुद नेहरू को कभी इस तरह का महिमामंडन पसंद नहीं था. लेकिन लगता है, बीजेपी अपने नायक के महिमामंडन के जरिए आधुनिक भारत के सबसे चर्चित नायक को पीछे करने के प्रयास करने में लगी है. और अपने प्रतीक पुरुष के जरिए अपनी विचारधारा को बढ़ावा देने में जुटी है.
दीनदयाल उपाध्याय: भगवा नायक को ऊंचा मुकाम
पार्टी में महापुरुषों की कमी होने के चलते मोदी सरकार और बीजेपी पूरे जोर-शोर से पंडित दीनदयाल उपाध्याय का महिमामंडन करने में जुटी.

अपडेटेड 19 अक्टूबर , 2015
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