आखिर एक लंबे इंतजार के बाद तीन अंतिम उम्मीदवारों में से वामन केंद्रे को राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का नया निदेशक चुन लिया गया. 27 साल पहले 1984 में वामन इसी विद्यालय से स्नातक होकर निकले थे. पास होते ही उनके सामने दो ऑफर आए. पहला, एक थिएटर ग्रुप के साथ विदेश जाने का और दूसरा केरल की लोकनाट्य शैलियों पर एक वर्कशॉप के आयोजन का. उन्होंने दूसरे ऑफर का चुनाव किया.
मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ईदगाह के नायक हामिद की तरह उन्हें पता था कि विदेश यात्रा तो शीशे के टूट जाने वाले खिलौने की तरह है, लेकिन अपनी धरती की कलाओं में हासिल की गई निपुणता का चिमटा हमेशा उनके काम आएगा. नतीजा सामने है. आज उन्हें देश में नाट्य प्रशिक्षण की शीर्ष संस्था के शीर्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
विदर्भ के एक दूरस्थ गांव के साधारण परिवार में पैदा हुए वामन केंद्रे ब.व. कारंत के बाद उन गिने-चुने रंगकर्मियों में हैं, जिन्होंने अपनी एक पुख्ता द्विभाषी पहचान बनाई है. मराठी में झुलवा और रणांगन जैसी उनकी सुपरहिट नाट्य प्रस्तुतियों के समांतर हिंदी में गधे की बारात और करीब एक दशक पहले की प्रस्तुति जानेमन तक उनकी निर्देशित प्रस्तुतियों का एक लंबा सिलसिला है. अभी डेढ़ महीने पहले मंचित उनकी बिल्कुल ताजा प्रस्तुति नो सेक्स प्लीज एक हिंदी प्रहसन ही है. भास के संस्कृत नाटक मध्यमव्यायोग पर आधारित उनकी प्रस्तुति पिया बावरी तो एक दिन में एक साथ तीन भाषाओं—हिंदी, अंग्रेजी और मराठी—में मंचित होने का कीर्तिमान बना चुकी है.
पचपन वर्षीय वामन के नाट्य कर्म की विशेषता है उसका अनुशासन और उसकी संपूर्णता. कहना चाहिए कि उनका नाटक चाक्षुष ध्वनियों में आकार लेता है. उनकी नाट्य प्रस्तुतियां मंच के एक साफ-सुथरे व्याकरण से बनती हैं. किन्नरों के जीवन पर आधारित नाटक जानेमन में वे इस अनजानी दुनिया के संवेदनशील पहलुओं को इस शिद्दत से उकेरते हैं कि देखने वाला इस उपेक्षित समुदाय के लोगों के भीषण यथार्थ को मानवीय ढंग से महसूस कर पाता है. प्रस्तुति के दौरान दृश्यों के बीच के अंतराल में भी झींगुरों की ध्वनि सुनाई देती रहती है. ऐसी बहुतेरी युक्तियों और अवयवों का कल्पनाशील इस्तेमाल करने वाले वामन के कुल रंगकर्म में भी यह विविधता दिखाई देती है. वे अपनी प्रस्तुतियों में भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के सूत्रों से लेकर आधुनिक थिएटर की तरकीबों तक का इस्तेमाल करते रहे हैं.
मसलन, पिया बावरी में नाट्यशास्त्र महज सांकेतिक रूप में ही दिखता है. उनके मुताबिक, इस संस्कृत नाटक में संस्कृत सौंदर्यशास्त्र की महज गंध भर है और उन्होंने परंपरा, संरचना, भंगिमाओं, लय आदि के मूल रूप को एक बिल्कुल नए तरह से इस प्रस्तुति में बरता है. ऐसा करने की वजह हैः उन्होंने भास की नायिका हिडिम्बा को अपने रूपांतरित नाट्यालेख में एक बिल्कुल अलग विचार बिंदु से पेश किया. वह प्रेम की राजनीति, परिवार और संबंधों को एक आधुनिक स्त्री के नजरिए से देख पाती है. वामन के रंगकर्म की विविधता के इसी क्रम में देवदासियों के जीवन पर उनकी प्रस्तुति झुलवा और ग्रीक क्लासिक इडिपस आदि को भी याद किया जा सकता है.
नाटक जानेमन से हिंदी में पुनर्वापसी करने वाले वामन पहले रंगकर्मी हैं जिन्हें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का मनोहर सिंह सम्मान दिया गया. उनकी उपलब्धियों के सिलसिले में उन्हें इसी साल दिया गया वर्ष 2012 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी जुड़ गया है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में आने तक वे मुंबई विश्वविद्यालय के थिएटर डिपार्टमेंट के मुखिया के रूप में कार्य करते रहे हैं, जिसके वे संस्थापक भी हैं. अपनी कुशलता से उन्होंने आज इसे देश के चुनिंदा नाट्य पाठ्यक्रमों में ला खड़ा किया है.
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अगर वामन के आगमन को भविष्य की ओर एक नए प्रस्थान की तरह देखा जा रहा है तो इसकी कुछ वजहें हैं. एक वजह यह है कि रामगोपाल बजाज के निदेशकत्व के बाद से विद्यालय अपनी दशा और दिशा में एक निरंतर ह्रासोन्मुख और भ्रम का शिकार होता गया है और वामन थिएटर के एक ऐसे विजनरी हैं, जिनमें खुद से इतर शैलियों के महत्व को पहचानने की एक स्पष्ट दृष्टि रही है. वे समकालीन थिएटर के राष्ट्रीय परिदृश्य में न सिर्फ नियमित चहलकदमी करते रहे हैं, बल्कि उनके पास एक समुचित राष्ट्रीय दृष्टि भी है, जो जानती है कि इस राष्ट्र की शुरुआत वास्तव में गांव से होती है.
मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ईदगाह के नायक हामिद की तरह उन्हें पता था कि विदेश यात्रा तो शीशे के टूट जाने वाले खिलौने की तरह है, लेकिन अपनी धरती की कलाओं में हासिल की गई निपुणता का चिमटा हमेशा उनके काम आएगा. नतीजा सामने है. आज उन्हें देश में नाट्य प्रशिक्षण की शीर्ष संस्था के शीर्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
विदर्भ के एक दूरस्थ गांव के साधारण परिवार में पैदा हुए वामन केंद्रे ब.व. कारंत के बाद उन गिने-चुने रंगकर्मियों में हैं, जिन्होंने अपनी एक पुख्ता द्विभाषी पहचान बनाई है. मराठी में झुलवा और रणांगन जैसी उनकी सुपरहिट नाट्य प्रस्तुतियों के समांतर हिंदी में गधे की बारात और करीब एक दशक पहले की प्रस्तुति जानेमन तक उनकी निर्देशित प्रस्तुतियों का एक लंबा सिलसिला है. अभी डेढ़ महीने पहले मंचित उनकी बिल्कुल ताजा प्रस्तुति नो सेक्स प्लीज एक हिंदी प्रहसन ही है. भास के संस्कृत नाटक मध्यमव्यायोग पर आधारित उनकी प्रस्तुति पिया बावरी तो एक दिन में एक साथ तीन भाषाओं—हिंदी, अंग्रेजी और मराठी—में मंचित होने का कीर्तिमान बना चुकी है.
पचपन वर्षीय वामन के नाट्य कर्म की विशेषता है उसका अनुशासन और उसकी संपूर्णता. कहना चाहिए कि उनका नाटक चाक्षुष ध्वनियों में आकार लेता है. उनकी नाट्य प्रस्तुतियां मंच के एक साफ-सुथरे व्याकरण से बनती हैं. किन्नरों के जीवन पर आधारित नाटक जानेमन में वे इस अनजानी दुनिया के संवेदनशील पहलुओं को इस शिद्दत से उकेरते हैं कि देखने वाला इस उपेक्षित समुदाय के लोगों के भीषण यथार्थ को मानवीय ढंग से महसूस कर पाता है. प्रस्तुति के दौरान दृश्यों के बीच के अंतराल में भी झींगुरों की ध्वनि सुनाई देती रहती है. ऐसी बहुतेरी युक्तियों और अवयवों का कल्पनाशील इस्तेमाल करने वाले वामन के कुल रंगकर्म में भी यह विविधता दिखाई देती है. वे अपनी प्रस्तुतियों में भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के सूत्रों से लेकर आधुनिक थिएटर की तरकीबों तक का इस्तेमाल करते रहे हैं.
मसलन, पिया बावरी में नाट्यशास्त्र महज सांकेतिक रूप में ही दिखता है. उनके मुताबिक, इस संस्कृत नाटक में संस्कृत सौंदर्यशास्त्र की महज गंध भर है और उन्होंने परंपरा, संरचना, भंगिमाओं, लय आदि के मूल रूप को एक बिल्कुल नए तरह से इस प्रस्तुति में बरता है. ऐसा करने की वजह हैः उन्होंने भास की नायिका हिडिम्बा को अपने रूपांतरित नाट्यालेख में एक बिल्कुल अलग विचार बिंदु से पेश किया. वह प्रेम की राजनीति, परिवार और संबंधों को एक आधुनिक स्त्री के नजरिए से देख पाती है. वामन के रंगकर्म की विविधता के इसी क्रम में देवदासियों के जीवन पर उनकी प्रस्तुति झुलवा और ग्रीक क्लासिक इडिपस आदि को भी याद किया जा सकता है.
नाटक जानेमन से हिंदी में पुनर्वापसी करने वाले वामन पहले रंगकर्मी हैं जिन्हें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का मनोहर सिंह सम्मान दिया गया. उनकी उपलब्धियों के सिलसिले में उन्हें इसी साल दिया गया वर्ष 2012 का संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी जुड़ गया है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में आने तक वे मुंबई विश्वविद्यालय के थिएटर डिपार्टमेंट के मुखिया के रूप में कार्य करते रहे हैं, जिसके वे संस्थापक भी हैं. अपनी कुशलता से उन्होंने आज इसे देश के चुनिंदा नाट्य पाठ्यक्रमों में ला खड़ा किया है.
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अगर वामन के आगमन को भविष्य की ओर एक नए प्रस्थान की तरह देखा जा रहा है तो इसकी कुछ वजहें हैं. एक वजह यह है कि रामगोपाल बजाज के निदेशकत्व के बाद से विद्यालय अपनी दशा और दिशा में एक निरंतर ह्रासोन्मुख और भ्रम का शिकार होता गया है और वामन थिएटर के एक ऐसे विजनरी हैं, जिनमें खुद से इतर शैलियों के महत्व को पहचानने की एक स्पष्ट दृष्टि रही है. वे समकालीन थिएटर के राष्ट्रीय परिदृश्य में न सिर्फ नियमित चहलकदमी करते रहे हैं, बल्कि उनके पास एक समुचित राष्ट्रीय दृष्टि भी है, जो जानती है कि इस राष्ट्र की शुरुआत वास्तव में गांव से होती है.

