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डार्क मोड

कॉस्मेटिक सर्जरी: मुझे छील-काटकर वैसा बना दो!

ह्रितिक रोशन के हाइ चीकबोन्स. जॉन अब्राहम-सा सीना... परफेक्ट लुक के लिए कॉस्मेटिक सर्जरी की राह अपना रहे युवा. पूर्णता की चाहत पाल रहे युवकों को सर्जन की छूरी से कोई परहेज नहीं है. वे महशूर हस्तियों की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं.

अपडेटेड 5 अगस्त , 2013
इस साल मई में अपने 21वें जन्मदिन से कुछ दिन पहले करण थडाणी जब मुंबई के एक उपनगरीय अस्पताल से बाहर आए तो उनका चेहरा उनकी कल्पना के अनुरूप तराशा जा चुका था. उनकी नाक पहले से पतली और तराशी हुई थी; उनकी जॉलाइन (जबड़ा) बॉलीवुड अभिनेता हिृतिक रोशन जैसी और उनके गालों में जॉन अब्राहम की तरह गड्ढे पड़ रहे थे. यह सब डेढ़ लाख रु. के खर्च और तीन महीनों में आठ दौर में चले प्रोसीजर से संभव हुआ था.

कॉमर्स ग्रेजुएट और ऐक्टर बनने का सपना संजोए करण कहते हैं, ''लड़कियां डिंपल वाले लड़कों को पसंद करती हैं. कॉलेज के दौरान मेरी कोई गर्लफ्रेंड नहीं थी. लेकिन अब लड़कियां मुझे देखती हैं—मानो मैं अचानक आकर्षक और मशहूर हो गया हूं.” अब उनका अगला लक्ष्य स्किन लाइटनिंग सेशन (गोरा बनने के लिए इलाज) है. वे गोरा रंग पाने के लिए 1 लाख रु. की लागत वाला तीन महीने का ट्रीटमेंट लेने जा रहे हैं.

उन्हीं की तरह कई युवा पुरुषों में ही नहीं, बल्कि किशोरों में भी विभिन्न उपायों से अपने चेहरे को नया और मनचाहा रूप देने की ललक जाग रही है. मोटे होंठों को सर्जरी से सही आकार देना और बड़ी नाक को तराश कर आकर्षक बना देना कुछ घंटों का काम है और गालों को भरा हुआ बनाने और युवा रूप देने के लिए बस एक दिन की छुट्टी काफी है. चेहरे की झुर्रियों को झटपट दूर करने के लिए फेसलिफ्ट और जुवेडर्म इंजेक्शन से लेकर पेट को तराशने और गाइनोकोमेस्टिया सर्जरी तक आम बातचीत का हिस्सा बन गए हैं.

इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ  ऐस्थेटिक प्लास्टिक सर्जरी के 2010 में कराए गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि कॉस्मेटिक सर्जरी के सालाना आंकड़ों में भारत चौथे पायदान पर है और यह दुनियाभर में होने वाली सभी सर्जरी का 5.2 फीसदी है. सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि भारत में होने वाली 10 में से तीन सर्जरी युवक करा रहे हैं.

कॉस्मेटिक डर्मेटोलॉजी  सोसाइटी ऑफ इंडिया की वाइस प्रेसिडेंट जयश्री शरद कहती हैं, ''जिनकी हम बात कर रहे हैं वे मेट्रोसेक्सुअल पुरुष हैं जो अपनी सुंदरता और अपने व्यक्तित्व पर औरतों से ज्यादा ध्यान देते हैं.” उन्होंने पिछले पांच साल में सर्जरी के लिए आने वाले युवकों की संख्या में 60 फीसदी की वृद्धि देखी है.

पूर्णता की चाहत पाल रहे युवकों को सर्जन की छुरी से कोई परहेज नहीं है. सिल्वर स्क्रीन के सितारे शर्ट उतारकर अपने गठीले शरीर का प्रदर्शन कर रहे हैं, इसलिए अब बाल मर्दाना खूबसूरती की निशानी नहीं रहे. आज युवक शेविंग से बाल हटाने के रोज-रोज के झंझट से छुटकारा पाने के लिए लेजर जैसे स्थायी ट्रीटमेंट अपना रहे हैं और जब सर्जन की छुरी का कमाल घंटेभर के भीतर सिक्स पैक थमा सकता है तो जिम में घंटों पसीना बहाने की जरूरत ही क्या है? दिल्ली के फोर्टिस ला फेम में कॉस्मेटिक सर्जन चारू शर्मा कहती हैं, ''जिनका वजन मेडिकली सही है वे भी अपनी मांसपेशियों और पेट को कम करने की खातिर लाइपोसक्शन कराने आते हैं.”

मशहूर हस्तियों की नकल
इलाज के लिए आने वाले लोग अक्सर अपने पसंदीदा हीरो की तस्वीर साथ लाते हैं और अपनी नाक या जॉलाइन अपने पसंदीदा हीरो जैसे बनवाना चाहते हैं. बंगलुरू में कॉस्मोडर्मा क्लीनिक की सीईओ चैत्रा आनंद कहती हैं, ''युवकों में जॉन अब्राहम जैसी बॉडी, ह्रितिक रोशन और ह्यु जैकमैन (ऑस्ट्रेलियाई ऐक्टर) जैसा चेहरा पाने की चाहत सबसे ज्यादा दिखाई देती है. नाक को थोड़ा ऊपर उठाने की मांग मॉडलिंग इंडस्ट्री के युवकों में ज्यादा है, क्योंकि इससे चेहरा ज्यादा फोटोजेनिक हो जाता है.”

हर कॉस्मेटिक सर्जन के क्लीनिक में हिृतिक रोशन की तस्वीर जरूर टंगी हुई नजर आ जाती है क्योंकि ज्यादातर नौजवान उनकी तरह चेहरा और जॉलाइन बनवाना चाहते हैं. उन्हें राइनोप्लास्टी के लिए 1 लाख रु. खर्च करने से भी कोई गुरेज नहीं है. इस तरह की मांग को पूरा करने के लिए डॉक्टरों ने एक प्रभावी उपाय ढूंढ़ लिया है. स्थायी सर्जरी की बजाए वे जबड़े के कोनों और ठोड़ी के नजदीक डर्मा फिलर इंजेक्ट करते हैं जिससे वह ज्यादा नुकीली नजर आने लगती है.

नाक में भी बगैर सर्जरी के बदलाव लाया जा सकता है. मोटी नाक को खूबसूरत आकार देने के लिए उसके किनारों से लेकर भौंहों के कोनों तक डर्मा फिलर इंजेक्ट किया जाता है जिससे नाक तराशी हुई नजर आती है. आनंद कहते हैं, ''इस प्रोसीजर का फायदा यह है कि अगर व्यक्ति इसके नतीजों से खुश नहीं है तो पहले वाली स्थिति में लौटने की पूरी गुंजाइश रहती है.”
खूबसूरत बनने की बढ़ती मांग को भुनाने के लिए कई क्लीनिक इनवेसिव सर्जरी का 'जल्द और दर्द रहित’ विकल्प लेकर आए हैं.

लोगों के बीच मशहूर 'लंच टाइम नॉन-सर्जिकल डिंपल क्रिएशन’ (बिना सर्जरी गालों में डिंपल बनवाना) से लेकर '20 मिनट हैंड रेजुवनेशन’ (हाथ को 20 मिनट के भीतर सुंदर बनवाना) तक के नॉन-इनवेसिव सर्जरी के ढेरों विकल्प मौजूद हैं. वीएलसीसी हेल्थकेयर के मैनेजिंग डायरेक्टर संदीप आहूजा कहते हैं, ''कई क्लाइंट दर्द वाले प्रोसीजर से गुजरे बिना सुंदर दिखना चाहते हैं. इसलिए हम चेहरे को संवारने-चमकाने के लिए ऑर्गेनिक फेशियल हेयर ग्लेजिंग ट्रीटमेंट, आयुर्वेदिक तरीकों से सांवलेपन को हटाना, दाग-धब्बों और झाइयों के लिए लाइकोरिस ट्रीटमेंट या मुंहासे हटाने के लिए नौ अलग तरह के एसिड लेकर आए हैं.”

मनचाही काया
जब बात तराशी हुई काया या फिर सिक्स पैक ऐब्स वाला शरीर पाने की आती है तो इससे ज्यादा दर्दभरा और कुछ नहीं हो सकता है. बंगलुरू का रमैया मेडिकल कॉलेज हो या दिल्ली के जाने-माने क्लीनिक, पिछले कुछ साल में गाइनोकोमास्टिया या मेल ब्रेस्ट रीडक्शन 35 फीसदी की तेजी के साथ शरीर की कॉस्मेटिक सर्जरी की फेहरिस्त में सबसे ऊपर हैं. बंगलुरू में डॉ. शेट्टीज स्किन, हेयर ऐंड लेजर कॉस्मेटिक क्लीनिक के डर्मेटोलॅजिस्ट और कॉस्मेटिक लेजर फिजिशियन एम.के. शेट्टी कहते हैं, ''हालांकि मेडिकल की दृष्टि से यह चिंता का विषय नहीं है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब स्कूल में बच्चे को अन्य सहपाठी अकसर चिढ़ाते रहते हैं.” उनके पास आने वाले लोगों में एक चौथाई 25 से कम आयु के पुरुष हैं.

युवकों में गठीला बदन पाने के लिए लाइपोसक्शन काफी लोकप्रिय है. कोलकाता के कोलंबिया एशिया अस्पताल में प्लास्टिक ऐंड रिकन्सट्रक्टिव सर्जरी के कंसल्टेंट मनीष मुकुल घोष कहते हैं, ''अब युवक अपने शरीर को लेकर कुछ ज्यादा ही सजग रहते हैं और यह सिर्फ मॉडल या ऐक्टर तक ही सीमित नहीं है बल्कि आम लोगों में भी यह जागरूकता फैलती जा रही है. इनमें अधिकांश कॉलेज के छात्र हैं.”

अध्ययन बताते हैं कि करीब एक तिहाई भारतीय पुरुषों में 20 वर्ष की उम्र में ही गंजेपन के लक्षण नजर आने लगते हैं, जिसकी वजह से उन्हें हेयर ट्रांसप्लांट का विकल्प चुनना पड़ता है. लिहाजा, क्लाइंट्स की कोई कमी नहीं है. लेजर से बालों को हटाने से लेकर हेयर ट्रांसप्लांट सर्जरी तक, अब प्रकृति या वंशानुगत लक्षण आपको अपनी मनमर्जी का दिखने से नहीं रोक सकते. दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढऩे वाले 21 वर्षीय जयदीप बसु कहते हैं, ''19 साल की उम्र से ही मेरे बाल झड़ने लगे थे. यही नहीं, मेरी छाती और पीठ घने बालों से ढकी थी.

मैं लड़कियों के चिढ़ाने और उपेक्षा भरे रवैये को और ज्यादा नहीं झेल सकता था. आखिरकार मैंने मम्मी-पापा को हेयर रिप्लेसमेंट प्रोसीजर के लिए राजी कर ही लिया. दोनों प्रोसीजर दर्दभरे और मंहगे थे. पर उनसे मिली सौगात से कीमत वसूल हो गई."

हैदराबाद के सीएलएच हेयर रेस्टोरेशन क्लीनिक में हेयर ट्रांसप्लांट के लिए आने वाले युवकों की संख्या में 70 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है. हेयर ट्रांसप्लांट सर्जरी में सिर के पिछले और बगल के हिस्से से बीच के हिस्से तक स्किन की ग्राफ्टिंग की जाती है. कई बार हेयर ट्रांसप्लांट के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले बाल विशेष हेयर डोनर्स से लिए जाते हैं.

चेन्नै के अपोलो अस्पताल में ओरल और मैक्सिलोफेशियल सर्जन 30 वर्षीय निर्विकल्प नटराजन कहते हैं, ''आज के लड़के सिर्फ आकर्षक दिखने के लिए सर्जरी नहीं कराते, बल्कि खुद पर और अपनी क्षमताओं पर भरोसा करने के लिए भी इसे चुनते हैं.” क्लीनिक में आने वाले 21 साल से कम उम्र वर्ग में ज्यादातर मुंहासों से परेशान होते हैं जो इन निशानों से छुटकारा पाना चाहते हैं. पिछले एक साल से मुंहासों का इलाज करा रहे मुंबई के 17 वर्षीय छात्र हर्ष जाधव कहते हैं, ''अगर आप मुंहासों से मुक्त त्वचा हासिल कर सकते हैं, तो दाग-धब्बों के साथ क्यों रहें?”

विशेषज्ञों के मुताबिक, खुद को सुंदर दिखाने का बढ़ता जुनून सामाजिक माहौल और अपने नैन-नक्श पर ज्यादा ध्यान देने का नतीजा है. दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के प्रोफेसर अभय कुमार का मानना है, ''आइटम नंबर और विज्ञापनों में आकर्षक बदन वाले पुरुषों की तस्वीरों ने युवा वर्ग पर खास असर डाला है. आज छह साल का बच्चा आइसक्रीम खाने से परहेज करता है कि उसका वजन न बढ़ जाए या 12 साल का बच्चा चेहरे पर मुंहासे निकल आने पर स्कूल नहीं जाना चाहता.”

सोच-समझकर बढ़ाएं कदम
डॉक्टर 18 साल से कम उम्र के लोगों को अकसर इन्फेक्शन और सर्जरी के दुष्प्रभावों की आशंका जताकर टाल देते हैं. दिल्ली स्थित साइकिएट्रिस्ट और चाइल्ड थेरेपिस्ट कुंजल गणका का कहना है, ''मेरे क्लीनिक में अकसर 10 साल तक के बच्चे भी आते हैं. उन्हें सर्जरी के दुष्प्रभावों के बारे में समझना पड़ता है.” कई डॉक्टर अपने रोगियों को सर्जरी की बजाए दूसरे इलाज अपनाने की सलाह देते हैं जो कई बार सालभर लंबा चलता है लेकिन उसका कोई मनोवैज्ञानिक असर नहीं होता. कई मामलों में तो किशोर हद से गुजर जाते हैं और उनमें बॉडी डिस्मॉर्फिक डिस्ऑर्डर (शरीर को  कुरूप मानने) के लह्नण पैदा हो जाते हैं. वे अपने शरीर पर एक निशान तक बर्दाश्त नहीं करते. चैत्रा आनंद कहती हैं, ''आज के दौर में किसी भी तरह का ट्रीटमेंट करने से पहले डॉक्टर को क्लाइंट की मानसिक स्थिति का आकलन कराने की सलाह जरूर देनी चाहिए.”

लेकिन, जिस तरह बाजार में नई और किफायती ब्यूटी टेक्नोलॉजी की बाढ़ आई हुई है, उसके मद्देनजर युवकों को अब 'कुरूपता’ के बोझ तले घुटना मंजूर नहीं है. बस एक-दो घंटे का समय, एक क्रेडिट कार्ड और मम्मी-पापा की सहमति चाहिए और वे अपने चेहरे को अपनी कल्पना जैसा हसीन बनवाकर क्लीनिक से इठलाते हुए बाहर आ रहे होंगे.
—साथ में आयशा अलीम, मालिनी बनर्जी, लक्ष्मी कुमारस्वामी और देविका चतुर्वेदी
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