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हैदराबाद: शक, खौफ, जुल्म और सियासत की चारमीनार

नौजवान असंतुष्ट हैं तो बुजुर्ग निराश. प्रशासन की शक से भरी नजरें हैदराबाद शहर के पुराने इलाके के दिलो-दिमाग में धंस गई हैं. अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे नेता इस अलगाव को और हवा दे रहे हैं.

अपडेटेड 25 फ़रवरी , 2013

रविवार तीसरे पहर का वक्त हैदराबाद के सैदाबाद इलाके में ईदगाह मैदान में 25 साल का मोहतसिम बिल्ला पूरी एकाग्रता के साथ मकसूद अहमद की बॉल का सामना करने को तैयार है, जो बॉल फेंकने से पहले लंबे-लंबे डग भरता आ रहा है. अपनी कलाई के कमाल से मोहतसिम ने बॉल को स्क्वायर लेग सीमा रेखा पर पहुंचा दिया, जिसे देखकर संभवत: मोहम्मद अजहरुद्दीन को भी फख्र होता. एक-दो लोग आसपास खड़े ताक रहे हैं, लेकिन उन पर खेल में डूबे इन लड़कों के जोश का कोई असर नहीं दिखता. मोहतसिम का कहना है कि ये दर्शक सादी वर्दी में पुलिस वाले हैं जो करीब-करीब रोजाना ही उस पर और उसके दोस्तों पर नजर रखते हैं.

उसने बताया, ‘‘मेरे घर से बाहर निकलते ही निगरानी शुरू हो जाती है. ये लड़के जो मेरे साथ क्रिकेट खेल रहे हैं-रईसुद्दीन, मकसूद, अब्दुल रहीम, वाजिद, कलीम-इनमें से हर एक मेरे साथ जेल में था. ये मेरे पुराने दोस्त हैं, वरना मेरे साथ घूमने-फिरने का जोखिम मोल नहीं लेगा.’’

अगर मोहतसिम पर लगे पुलिस आरोपों की सूची देखी जाए तो पता लगता है कि सिर्फ सात साल में वह पथराव के मामूली जुर्म से भारत के खिलाफ जंग छेडऩे की हद तक पहुंच गया. पुलिस रिकॉर्ड में उसका नाम पहली बार 14 साल की उम्र में आया, जब उस पर 2001 में अफगानिस्तान की जंग को लेकर अमेरिका विरोधी प्रदर्शनों में पथराव करने का आरोप लगा. उसके बाद वह यह इकतरफा खेल शुरू हो गया. दो साल बाद वह पथराव के एक और मामले में फंसा.

2004 में जब गुजरात पुलिस ने हैदराबाद में डीजीपी के दफ्तर के सामने उसके बड़े भाई मुजाहिद को सरेआम गोली मारी, उसके बाद मोहतसिम पर जनाजे के दौरान पत्थर फेंकने का इल्जाम लगा. 2006 में उस पर आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर के भाषणों की सीडी बांटने और बीजेपी के एक नेता की हत्या की साजिश रचने के इल्जाम लगे. 2007 की मई में मक्का-मस्जिद धमाके के बाद मोहतसिम का नाम उन लोगों में शामिल था, जिन पर सरकार के खिलाफ जंग छेडऩे का आरोप है.

मोहतसिम के घर से एक गली छोड़कर 62 साल के तेज-तर्रार मौलाना नसीरुद्दीन का घर है, जिनके कानून से भिडऩे के किस्से इस इलाके में बहुत मशहूर हो चुके हैं. मौलाना ने 2004 से 2009 के बीच पांच साल गुजरात की साबरमती जेल में बिताए. उन पर बीजेपी नेता हरेन पंड्या और नरेंद्र मोदी के कत्ल की साजिश का इल्जाम था.hyderabad

मौलाना के दो बेटे, 31 साल का मोहम्मद मुकीमुद्दीन यासिर और 27 साल का मोहम्मद बलीगुद्दीन जबर, चार साल इंदौर जेल में काटने के बाद सितंबर, 2012 में लौटे थे. उन पर कर्नाटक के एक सिमी नेता की मदद का इल्जाम था. इस परिवार का कहना है कि अदालत से पूरी तरह बरी हो जाने के बावजूद उनके घावों के दाग अभी पूरी तरह नहीं मिटे हैं. यासिर का कहना है कि हमें ऐसे जुर्म की सजा मिली, जो हमने किया ही नहीं था. जबर ने बताया कि इंदौर के जेल अधीक्षक ने कहा था, ‘‘तुम देश के गद्दार हो. तुमको जीने का कोई हक नहीं है. तुमको अगर पचास बार भी फांसी दी जाए तो कम है.’’

संदेह और अविश्वास दोनों तरफ से है और इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं. मोहतसिम को लगता है कि पुलिस के दखल की वजह से कॉलेज ने 2008 में हैदराबाद जेल में रहते हुए उसे दूसरे सेमेस्टर के इम्तहान में बैठने के लिए हॉल टिकट देने से इनकार कर दिया था. इस समय वह डेक्कन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से एम.टेक सिविल की डिग्री के लिए पढ़ाई कर रहा है. उसका कहना है कि 2010 तक तमाम मुकदमों से बरी हो जाने के बावजूद उसके अतीत का साया कभी साथ नहीं छोड़ेगा, ‘‘नौकरी मिलना तो नामुमकिन है, क्योंकि पुलिस मुझ पर आतंकवादी का ठप्पा लगा चुकी है. मुझे पासपोर्ट भी नहीं मिलेगा. इसलिए मैं गल्फ में काम करने भी नहीं जा सकता.’’

नफरत की फसल
संदेह और अविश्वास का यही एहसास दिसंबर, 2012 में आदिलाबाद जिले में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के नेता अकबरुद्दीन ओवैसी की नफरत भरी तकरीर में फूट पड़ा. ओवैसी ने इस बात पर जोर दिया कि मुसलमानों को हिंदुस्तान में कभी न्याय

नहीं मिलता. ओवैसी ने पुलिस को चुनौती दी कि वह 15 मिनट के लिए अलग हट जाए ताकि 25 करोड़ मुसलमान सौ करोड़ हिंदुओं से मामला बराबर कर सकें. डर इस बात का है कि भारत की न्याय व्यवस्था के हाथों तकलीफ पाने वाले कमजोर दिमाग लोग ओवैसी की इस बांटने वाली तकरीर से गुमराह हो सकते हैं. ओवैसी को गिरफ्तार करके 8 जनवरी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया, लेकिन उनकी पार्टी आज भी मुसलमानों की भावनाओं को भुनाने की कोशिश में दलीलें दे रही है कि भारत में सिर्फ मुसलमान ही निशाने पर रहते हैं.

2007 में मक्का मस्जिद धमाके के बाद हैदराबाद पुलिस ने जिन लोगों की हाजिरी लगवाई, उनमें मोहतसिम, यासिर और जबर शामिल थे. पुलिस को पक्का यकीन था कि इस धमाके के पीछे पुराने शहर के मुसलमानों का हाथ है. उसने इनमें से 100 से ज्यादा को धर-दबोचा, जिससे शोर मच गया. आंध्र प्रदेश के अल्पसंख्यक आयोग ने सच्चाई का पता लगाने के लिए एक वकील एल. रविचंद्र की समिति बनाई. उन्होंने न्यायिक हिरासत में बंद 20 से ज्यादा नौजवानों से बात की और पूछताछ की. रविचंद्र का कहना है, ‘‘उन सबको पकडऩे का तरीका एक जैसा था: रात में दरवाजे पर दस्तक, आंखों पर पट्टी और थर्ड डिग्री का जोर-जुल्म और 10 दिन बाद रात में एक मजिस्ट्रेट के सामने पेशी. सबको बाद में छोड़ दिया गया.’’

नवंबर, 2010 में हैदराबाद जेल में शेख अब्दुल कलीम और स्वामी असीमानंद के बीच अचानक हुई एक मुलाकात के बाद पुलिस का बनाया साजिश का किला ताश के पत्तों की तरह ढह गया. कलीम पर इल्जाम था कि उसने आरडीएक्स लाया था और उन आतंकवादियों को सिम कार्ड मुहैया कराए थे, जिन्होंने मक्का मस्जिद में बम लगाया था. कलीम ने अपनी कहानी सुनाई तब उसने पाया कि पछतावे से भरे स्वामी असीमानंद ने इस आतंकवादी हमले में अपना हाथ होने की बात कबूल कर ली थी.

सीबीआइ की जांच ने भी शुरुआती धारणा को उलटा साबित कर दिया और उससे पता लगा कि इसमें मुस्लिम नौजवानों का हाथ नहीं था. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को यकीन हो गया था कि नौजवानों को सांप्रदायिक आधार पर निशाना बनाया गया था. आयोग ने एक अभूतपूर्व आदेश में दिसंबर, 2011 में सिफारिश की कि जांच करने वाले अधिकारियों की तनख्वाह में से इन नौजवानों को मुआवजा दिया जाए और कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए.hyderabad

कुछ वरिष्ठ आइपीएस अधिकारियों का कहना है कि पिछले दो दशक में भारत में शहरी आतंकवाद के इतिहास में सारी कडिय़ां अधिकतर एक खास समुदाय से जुड़ी मिली हैं. इसलिए छानबीन प्रक्रिया का रुख पहले से जाने-पहचाने मॉड्यूल्स और स्लीपर सेल्स की तरफ मुड़ जाता है. आंध्र प्रदेश के पूर्व डीजीपी एम.वी. भास्कर राव का कहना है कि जब तक कोई गलत इरादा न हो, तब तक सरकारी कर्मचारी और उसकी छवि को संरक्षण मिलना चाहिए, ‘‘अगर आप इस विश्वसनीयता और तटस्थता की छवि में सुराख करेंगे तो पुलिस तंत्र का कामकाज ठप्प हो जाएगा और संस्थाएं ढह जाएंगी.’’ पुलिस अधिकारियों की नजर में ‘‘नागरिक संगठनों, मीडिया, अल्पसंख्यक गुटों और राजनैतिक संस्थाओं के एक हिस्से की तरफ से लगातार पुलिस विरोधी प्रचार्य्य ने पुलिस का काम बहुत मुश्किल कर दिया है.

जहां तक मुस्लिम समुदाय का सवाल है, मक्का-मस्जिद धमाके की छानबीन का रुख पलटने और मुस्लिम नौजवानों को बरी किए जाने से उन्हें एकजुट खड़े होने और दक्षिणपंथी गुटों के इस प्रचार पर सवाल उठाने की वजह मिल गई कि ‘‘सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं. लेकिन सारे आतंकवादी मुसलमान लगते हैं.’’ इससे समुदाय की भावना को ठेस लगी है और वह अपने बचाव पर उतर आया है.

जब किसी मोहम्मद रईसुद्दीन पर मक्का-मस्जिद धमाके में इल्जाम लगता है और वह बाद में बरी हो जाता है, तो इस बीच उसकी सगाई टूट चुकी होती है और वह समाज में अलग-थलग हो जाता है. इतना ही नहीं, उसके परिवार को कोई किराये पर मकान नहीं देता तो उसके समुदाय को लगता है कि पुलिस जान-बूझकर बेकसूर बच्चों की जिंदगी तबाह कर रही है. इसीलिए जब कर्नाटक पुलिस ने सितंबर, 2012 में 22 साल के ओबेदुर्रहमान को हैदराबाद में उसके घर के करीब से गिरफ्तार किया तो उसका परिवार सड़कों पर उतर आया ताकि पुलिस को पीछे हटने पर मजबूर किया जा सके. रहमान के एक बूढ़े दादा मोहम्मद रफीउल्लाह के शब्दों में, ‘‘अब लोगों की सोच बदल गई है. अब सिर्फ पुलिस के कह देने भर से वे किसी को आतंकवादी नहीं मान लेते. 2007 से उन्होंने सबक सीख लिया.’’

सितंबर, 2011 में गुजरात पुलिस से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पुलिस अल्पसंख्यक समुदाय के मासूम लोगों पर आतंक का ठप्पा नहीं लगा सकती. चारमीनार के इस शहर में यह धारणा जोर पकड़ती जा रही है कि ‘मेरा नाम खान है’ कहने का मतलब पुलिस की जुबान में यह है कि ‘मैं आतंकवादी हूं.’

हम और वह का खुला विभाजन
2008 में ‘‘आतंकवाद से लडऩे के नाम पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ किए गए अत्याचार’’ के बारे में पीपल्स ट्रिब्यूनल ने एक रिपोर्ट तैयार की थी, ‘‘ह्वाट इट मीन्स टू बी अ मुस्लिम इन इंडिया टुडे. (वर्तमान भारत में मुसलमान होने का मतलब)’’ इस रिपोर्ट में कहा गया, ‘‘आतंकवादी अपराधों की छानबीन की आड़ में मुसलमानों को सताए और बदनाम किए जाने से उनमें असुरक्षा और अलगाव की जबरदस्त भावना पनप रही है, जिसके खौफनाक परिणाम हो सकते हैं.’’

सामाजिक कार्यकर्ता मजहर हुसैन को लगता है कि हाल की घटनाओं का संकेत यह है कि मुसलमान अपना हक मांगने लगे हैं, ‘‘मेरे पिता की पीढ़ी के मुसलमान खुद को दोयम दर्जे का नागरिक मानते थे क्योंकि विभाजन का अपराध बोध उनमें ठूंस दिया गया था. उन्हें समझाया गया था कि मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बन जाने के बावजूद ‘तुम लोग’ वहां नहीं गए. लेकिन आज के मुसलमान का विभाजन से कोई लेना-देना नहीं है. उसका देश भारत है.’’

इस सबका सामाजिक असर पुराने शहर में सांप्रदायिक आधार पर बस्तियों के अपने में सिमट जाने के रूप में सामने आया है. शहर अब ‘हमारे’ इलाके और ‘तुम्हारे’ इलाके में बंट गया है. सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान बताने वाले भगवा या हरे झ्ंडे जैसे प्रतीक बताते हैं कि कौन कहां, हावी है. पुराने शहर से बहुत-से लोग नए हैदराबाद में जाकर बस गए हैं. लेखक आनंद राज वर्मा ने हैदराबाद पर मोहल्ला, गली और कूचे नामक किताब लिखी है. उन्होंने जिंदगी के शुरुआती 27 साल पुराने शहर के चंद्रायनगुट्टा में गुजारे और अगले 37 साल नए हैदराबाद में. उनका कहना है कि कई इलाकों में आबादी का स्वरूप बदल गया है.

वे कहते हैं, ‘‘बंदलागुड़ा जैसे एक इलाके में 1980 और 1990 के दशक में 95 प्रतिशत हिंदू रहा करते थे, लेकिन आज 95 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है. पुराने शहर में सूखे तालाबों पर कई बस्तियां बस गई हैं, जिनमें 100 फीसदी मुसलमान रहते हैं. इसी तरह से 1980 के दशक में जिस अनवार-उल-उलूम कॉलेज में मैं पढ़ाता था, वहां कोई लड़की बुर्का नहीं पहनती थी, लेकिन आज 90 फीसदी लड़कियां बुर्का पहनती हैं. धार्मिक पहचान को जोर से बताना आज आम बात हो गई है.’’

लेकिन यह मानना भूल होगी कि यह संप्रदाय सिर्फ भौगोलिक सीमाओं में सिमटा है. राजनैतिक, कारोबारी, मीडिया और सांस्कृतिक हलकों में भी सांप्रदायिकता की झलक मिलती है और मुस्लिम समुदाय इनमें से अधिकतर के दायरे से खुद को बाहर खड़ा महसूस करता है. उर्दू अखबारों में पुलिस की पूछताछ का पूरा ब्यौरा देने के लिए बहुत जगह दी जाती है, जिससे सताए जाने का एहसास और मजबूत हो जाए और इसमें यही भावना छिपी रहती है कि बेकार में बच्चों को उठा लिया. इससे अकसर उन लोगों के बीच भी नई दरारें खिंच जाती हैं, जिनकी अमूमन कोई खास राय नहीं होती.

खुफिया विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि यह एक खास किस्म का माइनॉरिटी सिंड्रोम हो गया है, ‘‘खुद को बहुत ज्यादा सिकोडऩे की प्रवृत्ति पैदा हो गई है. मतलब अपनी गलती कभी नहीं माननी ताकि आपको दोषी होने या बचाव की मुद्रा में खड़े होने का एहसास ही न रहे. यह स्थिति खतरनाक हो सकती है.’’ हिंदूवादी गुट, जाहिर है, इस बात से सहमत हैं.

भीड़ को भड़काने वाला
विश्व हिंदू परिषद के अखिल भारतीय अध्यक्ष राघवेंद्र रेड्डी का कहना है, ‘‘ये लोग सैकड़ों आतंकी हरकतें करते हैं, लेकिन अगर हिंदुओं में से कोई एकाध कर दे तो पूरे समुदाय पर भगवा आतंकवाद का ठप्पा लगा देते हैं. मुझे तो नहीं लगता कि पुलिस मुसलमानों को निशाना बना रही है. ज्यादातर मामलों में सीधा-सीधा हाथ न हो तो भी अपराध करने वालों को किसी-न-किसी तरह की मदद तो दी ही जाती है.’’ राजनीति के अखाड़े में ओवैसी की घटना के बाद हिंदू-मुस्लिम बंटवारे का खेल जी-जान से चल रहा है.

ओवैसी की नफरत फैलाने वाली तकरीर के जवाब में विश्व हिंदू परिषद के नेता प्रवीण तोगडिय़ा ने जनवरी में एक जनसभा में आजाद भारत में नेल्ली से लेकर मेरठ और गुजरात तक हुए दंगों का बखान ऐसे किया, जिससे लगे कि हिंदुओं ने कभी मार नहीं खाई. इसमें निहित संदेश किसी से छिपा नहीं रहा और चुनाव नजदीक आने तथा बवाल फैलाने वालों को महत्व मिलने के साथ ही ये दरारें और चौड़ी ही होंगी.

ओबेदुर्रहमान, मौलाना नसीरुद्दीन का पोता है और जब से मौलाना जेल से लौटे हैं, ओबेद साये की तरह उनके साथ रहता था. मौलाना का मानना है कि ओबेद को इसीलिए उठा लिया गया. ओबेद इस समय हैदराबाद में नगर निगम के तीन सदस्यों की हत्या की साजिश रचने के इल्जाम में बंगलुरू सेंट्रल जेल में बंद है. मौलाना नसीरुद्दीन का कहना है कि ‘‘ओबेद किसी को मारने की साजिश को अंजाम नहीं दे सकता पर यह हो सकता है कि वह बहकावे में आ गया हो.’’

इसका एक दिलचस्प असर यह है कि कानून के साथ टकराव में आए हर परिवार में कम-से-कम एक सदस्य कानून पढ़ रहा है. मोहतसिम के 25 साल के दोस्त कलीम का डॉक्टर बनने का सपना तब टूटा, जब 2007 में मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने के तुरंत बाद वह गिरफ्तार हो गया. राजनैतिक दल भी पीड़ित होने के इस एहसास को हवा दे रहे हैं. मजलिस बचाव तहरीक के अमजदउल्लाह खान का कहना है, ‘‘हमें तो हथियार उठाने पर मजबूर किया जा रहा है, जबकि नेताओं के खिलाफ पुख्ता सबूत होने के बावजूद पुलिस उनका पीछा नहीं करती.’’

वकील रविचंद्र का मानना है, ‘‘अलग-अलग गुटों के दबाव में पुलिस झटपट नतीजे पर पहुंचने की भूल कर देती है. लेकिन पुलिस का काम भी आसान नहीं है, क्योंकि वहां भी कुछ खामियां तो हैं.’’

पुलिस तंत्र में सुधार करना और 41 प्रतिशत मुसलमान आबादी वाले शहर में पुलिस में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना कानून लागू करने वाले तंत्र में विश्वास फिर से पैदा करने के लिए एक और अहम सिफारिश है. इस बात का डर भी है कि मोहतसिम, कलीम या यासिर जैसे लोगों की सातों दिन और 24 घंटे निगरानी का उलटा असर भी हो सकता है. वे हदें पार करने को मजबूर हो सकते हैं.

इंदौर में शुरू में वकीलों ने आतंकवादी मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए यासिर और जबर की वकालत करने से इनकार कर दिया था. एक वकील उनसे अलग हटकर आगे आया तो उसे पीटा गया और दूसरे का मुंह काला कर दिया गया. मोहतसिम का कहना है, ‘‘इसीलिए मैं कहता हूं कि मेरा कोई भविष्य नहीं है. मेरा भविष्य सिर्फ जेल में है और मैं सिर्फ क्रिकेट के मैदान में ही जीत सकता हूं.’’ भारत के लिए यह सबसे मुश्किल मैच हो सकता है.

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